क्या चाहते हैं कश्मीरी नेता ? भारत सरकार हाथ पर हाथ धर कर बैठी रहे ?

By संतोष पाठक | Aug 05, 2019

जम्मू-कश्मीर राज्य आजकल एक बार फिर से चर्चा में है। लेकिन पिछले कई सालों में इसकी चर्चा पहली बार किसी आतंकी वारदात या पाकिस्तान की तरफ से घुसपैठ को लेकर नहीं हो रही है। बल्कि इस बार चर्चा कश्मीर भेजे जा रहे फोर्स को लेकर हो रही है। इस बार चर्चा जम्मू-कश्मीर राज्य सरकार के उस एडवाइजरी को लेकर ज्यादा हो रही है जिसमें अमरनाथ यात्रियों को अपनी यात्रा को छोड़कर वापस लौट जाने की सलाह दी गई है। जिसमें देशभर से आए पर्यटकों को कश्मीर छोड़ने की सलाह दी गई है। वैसे आपको बता दें कि इस समय कश्मीर में राज्यपाल शासन (धारा 370 की वजह से इस राज्य में लागू राष्ट्रपति शासन को राज्यपाल शासन ही कहा जाता है) लागू है। ऐसे में राज्य सरकार के इस आदेश को सीधे-सीधे केन्द्र की मोदी सरकार की नीति के साथ जोड़ा जाना तो लाजिमी है ही।

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आइए अब बात कर लेते हैं कश्मीर के एक बड़े राजनीतिक परिवार- अब्दुल्ला परिवार की। आजादी के बाद से लेकर लंबे समय तक इस परिवार के सदस्य का राज्य पर शासन रहा है लेकिन अब इस परिवार को भी जम्मू-कश्मीर के ताजा हालात को लेकर चिंता हो रही है। हाल ही में राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री फारूख अब्दुल्ला ने अपने बेटे उमर अब्दुल्ला (ये भी राज्य में मुख्यमंत्री की कमान संभाल चुके हैं) के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से दिल्ली में मुलाकात की थी। मुलाकात के बाद बकौल उमर अब्दुल्ला, वो संतुष्ट होकर निकले थे लेकिन अब वो भी सवाल उठा रहे हैं। शनिवार को उमर अब्दुल्ला ने राज्यपाल सत्यपाल मलिक से मुलाकात करने के बाद कहा कि उनकी पार्टी के सांसद सोमवार को संसद में यह मसला उठाकर केंद्र सरकार से जवाब की मांग करेंगे।

हालांकि राज्यपाल सत्यपाल मलिक महबूबा मुफ्ती, उमर अब्दुल्ला, शाह फैजल, सज्जद लोन, इमरान अंसारी समेत तमाम कश्मीरी नेताओं से मुलाकात के दौरान बार-बार यह आश्वासन देते नजर आए कि वर्तमान घटनाक्रम का धारा 370 या 35-ए से कोई लेना–देना नहीं है। उन्होंने तमाम कश्मीरी नेताओं से यह अपील भी की कि वे अफवाहें फैलाने से बचें। राज्यपाल ने कश्मीर के लोगों से अफवाहों पर ध्यान न देने और शांति बनाए रखने की अपील भी की है। इसको लेकर बाकायदा राजभवन से प्रेस रिलीज भी जारी की गई है।

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जाहिर-सी बात है कि केंद्र सरकार हो या राज्य के राज्यपाल, लगातार अपना स्टैंड साफ कर रहे हैं लेकिन कश्मीरी नेता हैं कि मानने को तैयार नहीं हैं। ऐसे में यह सवाल तो खड़ा हो ही रहा है कि आखिर ये कश्मीरी नेता चाहते क्या हैं ? क्या कश्मीर को लेकर केंद्र सरकार को हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहना चाहिए ? क्या अब तक जो होता आया है उसी तरह से होने देना चाहिए यानि आतंकी वारदात करते रहें हमारी फौज को मारते रहें और हम सिर्फ छिटपुट आधार पर जवाबी कार्रवाई करते रहें।

सवाल इन कश्मीरी नेताओं से यह भी पूछा जाना चाहिए कि लंबे समय तक शासन करने के बावजूद ये कश्मीर के हालात क्यों नहीं बदल सके ? अगर ये आरोप लगाते हैं कि कश्मीरी लोगों का भरोसा जीतना जरूरी है तो अब तक ये कश्मीरी लोगों का भरोसा क्यों नहीं जीत पाए ? बतौर मुख्यमंत्री ये क्या करते रहे ? जब तक आप सत्ता में रहो, तब तक सब कुछ ठीक होता है और सत्ता से बाहर होते ही इन्हें भारत सरकार के रवैये में खोट नजर आने लगता है। आखिर क्यों ?

आखिर क्यों इन्हें डर लगने लगा है अब भारतीय सेना से ? जनाब, ये भारत की सेना है। उस भारत की जो कश्मीर को अपना अभिन्न अंग मानती है। उस भारत की जो कश्मीर की हर विपदा के समय तन-मन-धन से उसके साथ खड़ा रहा। ये वो सेना है, जिसने बाढ़ के समय कश्मीरियों की जान-माल की सुरक्षा की थी। याद है अब्दुल्ला साहब, उस समय तो आप ही मुख्यमंत्री थे। इसलिए पूरा भारत अब आपसे कह रहा है कि राजनीति बाद में कीजिएगा, फिलहाल तो भारत के साथ खड़े रहिए। भारत सरकार और भारतीय सेना का साथ दीजिए, अफवाहें मत फैलाइए। भारत कश्मीर को केवल अपना अभिन्न अंग ही नहीं मानता बल्कि अपना माथा (सिर) मानता है तो भला हम इसका बूरा कैसे सोच सकते हैं। सारे कश्मीरी हमारे अपने हैं लेकिन आप भी जरा आगे बढ़िए और कश्मीरी पंडितों को भी अपना मानिए। याद रखिए कि सीमा उस पार के लोग कभी भी आपके अपने नहीं हो सकते। यकीन न हो तो पाकिस्तान के मुहाजिरों से पूछ लीजिए, बांग्लादेशियों से पूछ लीजिए। इसलिए वक्त आ गया है कि अब आप भी साफ-साफ स्टैंड लेकर मैदान में आइए और विधानसभा चुनाव की तैयारी कीजिए जो कुछ ही महीनों बाद होने जा रहे हैं। अब कश्मीर को आंतक मुक्त कर कश्मीरियत को जिंदा करने का समय आ गया है।

-संतोष पाठक

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