गिलानी की पहली बरसी पर क्यों फूट-फूट कर रोया पाकिस्तान? भारतीय राजनयिक को तलब कर क्या कहा?

By नीरज कुमार दुबे | Sep 02, 2022

पाकिस्तान समर्थक अलगाववादी नेता और जम्मू-कश्मीर में करीब तीन दशकों तक अलगाववादी मुहिम का नेतृत्व करने वाले सैयद अली शाह गिलानी की मौत का गम अभी तक पाकिस्तान भुला नहीं पाया है। पाकिस्तान इस बात से बहुत निराश है कि उसके हाथों में खेलने वाला और उसके एक इशारे पर कश्मीर में सभी गतिविधियों को बंद करवा देने वाला गिलानी इस दुनिया में नहीं है। पाकिस्तान इस बात से बहुत निराश है कि ना तो गिलानी की मौत के बाद कश्मीर में कोई प्रतिक्रिया हुई ना ही उसकी बरसी पर उसे किसी ने याद किया। कश्मीर में आज जो शांति और खुशहाली है वह पाकिस्तान को पच नहीं रही है इसलिए वह जब तब कोई ना कोई नापाक हरकत करता रहता है लेकिन हर बार उसे मुंहतोड़ जवाब मिलता है। जहां तक गिलानी की बरसी की बात है तो आपको बता दें कि बाढ़ की विभीषिका से जूझ रहे पाकिस्तान को भले अपने हजारों लोगों की मौत का कोई दुख नहीं है लेकिन गिलानी की बरसी पर पाकिस्तान सरकार और सेना गमजदा है।

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पाकिस्तान को उन खबरों पर गौर करना चाहिए जिसमें खुद गिलानी के सहयोगियों ने बताया था कि उसको उसकी इच्छा के अनुसार उसके आवास के पास स्थित एक मस्जिद में दफनाया गया था। बस प्रशासन ने उसके परिवार से एहतियाती कदम के तौर पर रात को उसे सुपुर्द-ए-खाक करने को कहा था क्योंकि खुफिया जानकारियों के अनुसार कुछ राष्ट्र विरोधी तत्व कश्मीर घाटी में कानून एवं व्यवस्था की स्थिति बिगाड़ने के लिए इस मौके का इस्तेमाल कर सकते थे। यही नहीं मस्जिद के कब्रिस्तान में रीति-रिवाजों के अनुसार गिलानी को दफनाया गया था।

देखा जाये तो गिलानी के निधन के साथ ही कश्मीर में भारत-विरोधी और अलगाववादी राजनीति के एक अध्याय का अंत हो गया था। हम आपको बता दें कि गिलानी का जन्म 29 सितंबर 1929 को बांदीपुरा जिले के एक गांव में हुआ था। उसने लाहौर के ‘ओरिएंटल कॉलेज’ से अपनी पढ़ाई पूरी की। ‘जमात-ए-इस्लामी’ का हिस्सा बनने से पहले उसने कुछ वर्ष तक एक शिक्षक के तौर पर नौकरी भी की। कश्मीर में अलगाववादी नेतृत्व का एक मजूबत स्तंभ माने जाने वाला गिलानी भूतपूर्व राज्य में सोपोर निर्वाचन क्षेत्र से तीन बार विधायक रहा। उसने 1972, 1977 और 1987 में विधानसभा चुनाव जीता हालांकि, 1990 में कश्मीर में आतंकवाद बढ़ने के बाद वह चुनाव-विरोधी अभियान का अगुवा हो गया था। वह हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के संस्थापक सदस्यों में से एक था, जो 26 पार्टियों का अलगाववादी गठबंधन था। लेकिन बाद में उन नरमपंथियों ने इस गठबंधन से नाता तोड़ लिया था, जिन्होंने कश्मीर समस्या के समाधान के लिए केन्द्र के साथ बातचीत की वकालत की थी। इसके बाद 2003 में गिलानी ने तहरीक-ए-हुर्रियत का गठन किया। हालांकि, 2020 में गिलानी ने हुर्रियत की राजनीति को पूरी तरह अलविदा कहने का फैसला किया और कहा कि 2019 में अनुच्छेद 370 के अधिकतर प्रावधानों को खत्म करने के केंद्र के फैसले के बाद दूसरे स्तर के नेतृत्व का प्रदर्शन बेहतर नहीं रहा।

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जहां तक गिलानी से जुड़े विवादों की बात है तो वह एक नहीं कई थे। भारत विरोधी गतिविधियों के लिए कुख्यात गिलानी का पासपोर्ट 1981 में जब्त कर लिया गया था और फिर पासपोर्ट केवल एक बार 2006 में हज यात्रा के लिए लौटाया गया था। गिलानी के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय, पुलिस और आयकर विभाग में कई मामले लंबित थे। गिलानी कश्मीर को बंद रखने वाले कैलेंडर निकालने के लिए जाना जाता था। वह घोषित करता था कि कब-कब कश्मीर घाटी बंद रहेगी लेकिन अनुच्छेद 370 हटाये जाने के बाद से गिलानी की भारत विरोधी गतिविधियों पर अंकुश लग गया था।

बहरहाल, जहां तक गिलानी की बरसी पर पाकिस्तान के मन में उमड़े प्रेम की बात है तो आपको बता दें कि ऐसा ही प्रेम तब भी उमड़ा था जब गिलानी की लंबी बीमारी के बाद मृत्यु हो गयी थी। पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान खान ने गिलानी के निधन पर अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल के जरिए शोक व्यक्त करते हुए ऐलान किया था कि ‘‘पाकिस्तान का ध्वज आधा झुका रहेगा और हम एक दिन का आधिकारिक शोक मनाएंगे।'' यहां यह भी उल्लेखनीय है कि गिलानी को पाकिस्तान के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘‘निशान-ए-पाकिस्तान’ से भी सम्मानित किया गया था।

-नीरज कुमार दुबे

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