By अभिनय आकाश | Apr 28, 2026
क्या किसी केस में आरोपी यह कह सकता है कि जज बदलो वरना पेशी के लिए नहीं आऊंगा। जज से यह कह दे कि आप केस से हट जाइए वरना ना मैं पेश होऊंगा ना मेरी तरफ से कोई वकील आएगा। अब तक शायद आपने ऐसा कोई केस देखा सुना नहीं हो। लेकिन दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने साफ कह दिया है कि दिल्ली हाईकोर्ट की जज जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा अगर आबकारी नीति केस से नहीं हटी तो ना ही वह पेश होंगे और ना ही उनके वकील। सवाल है कि क्या हमारी न्याय व्यवस्था इस बात की इजाजत देती है कि कोई वादी हाई कोर्ट के जज के खिलाफ मोर्चा खोल दे। इस तरह पेश होने से ही मना कर दे। और क्या केजरीवाल के पहले किसी और ने ऐसा किया है या केजरीवाल ही कोई नज़र पेश करने जा रहे हैं। पूरे मामले को सिलसिलेवार ढंग से समझते हैं।
दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 27 अप्रैल को दिल्ली हाईकोर्ट की जज जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के सामने पेश होने से ही मना कर दिया। जस्टिस स्वर्णकांता को चिट्ठी लिख के कह दिया कि अगर केस की सुनवाई आप करेंगी यानी वह करेंगी तो ना तो केजरीवाल खुद आएंगे ना ही उनकी ओर से कोई वकील आएगा। यह वही एक्साइज पॉलिसी वाला केस है जिसमें 27 फरवरी को अरविंद केजरीवाल को ट्रायल कोर्ट ने बरी कर दिया था। सीबीआई ने हाई कोर्ट में अपील की। मामला जस्टिस स्वर्णकांता की बेंच में पहुंचा। अब केजरीवाल कह रहे हैं कि जस्टिस स्वर्णकांता मामले की सुनवाई करेंगी तो वह कोर्ट नहीं जाएंगे, पेश भी नहीं होंगे। चार पेज के लेटर में केजरीवाल ने 25 पॉइंट्स लिखे हैं। कहा कि वह महात्मा गांधी के सत्याग्रह सिद्धांत का पालन कर रहे हैं। लेटर के दो खास पॉइंट्स आपको बताते हैं जो केजरीवाल के जस्टिस स्वर्णकांता पर आरोप हैं। चिट्ठी का पॉइंट नंबर छह केजरीवाल कहते हैं कि जब मैंने पहले भी केस में जज बदलने की मांग की थी तब भी यह चिंताएं बताई थी। पहला जस्टिस स्वर्णकांता आरएसएस के लीगल संगठन अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद से सार्वजनिक रूप से जुड़ी रही हैं। आरएसएस मौजूदा सरकार की विचारधारा से जुड़ा माना जाता है। राजनीतिक रूप से हम केंद्र की सरकार के विरोधी हैं और विचारधारा के स्तर पर मैं और मेरी पार्टी आरएसएस की सोच से सहमत नहीं है। ऐसे में जब जज साहिबा उनके कार्यक्रमों में बार-बार जाती रही हैं तो मुझे कैसे भरोसा हो कि इस अदालत से मुझे न्याय मिलेगा। पॉइंट नंबर सेवन में केजरीवाल जस्टिस स्वर्णकांता के बच्चों का मुद्दा उठाते हैं।
केजरीवाल ने कहा कि मैं जस्टिस शर्मा का सम्मान करता हूं लेकिन न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए। ऐसी दुविधा के मौके पर बापू ने हमे सत्याग्रह का रास्ता दिखाया है। केजरीवाल ने कहा कि अगर भविष्य में भी कभी जज स्वर्णकाता के सामने मेरा कोई दूसरा केस आता है जिसमे मेरे विरोध में बीजेपी, केंद्र सरकार या तुषार मेहता नहीं है तो मै उनके समक्ष जरूर पेश होऊगा। आप नेताओ ने केजरीवाल के इस कदम को साहसी कदम बताया। सासद संजय सिंह ने कहा कि आरएसएस के कार्यक्रम में जज स्वर्णकाता शर्मा का कहना कि जब यहां आती हूं, मेरा प्रमोशन हो जाता है, तो उनसे न्याय की उम्मीद क्या की जाए? आप दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने कहा कि अरविंद केजरीवाल का यह बेहद साहसी फैसला है, जो व्यवस्था को मजबूत करने में सहायक होगा। आप के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल के दिल्ली शराब नीति मामले में अदालत की कार्यवाही का बहिष्कार करने के अभूतपूर्व फैसले के बाद, देश की न्यायिक प्रणाली की पवित्रता विवादों के घेरे में आ गई है। हाल के एक फैसले को चुनौती देने के लिए सामान्य कानूनी रास्तों का पालन करने के बजाय, केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को एक निजी पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने स्पष्ट रूप से व्यक्तिगत रूप से या अपने कानूनी वकील के माध्यम से पेश होने से इनकार कर दिया है।
अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के खिलाफ मोर्चा खोला। खोला था। आपको याद होगा उनकी सिर्फ सरकार ही नहीं गई। केजरीवाल ने उन्हें नई दिल्ली सीट से हराया भी। नितिन गडकरी पर केजरीवाल ने भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगा दिए थे। दिल्ली में बीजेपी के अध्यक्ष थे सतीश उपाध्याय। उनके खिलाफ केजरीवाल ने भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे। इसे एक तरह से केजरीवाल स्टाइल ऑफ पॉलिटिक्स कहा जाने लगा था जिसमें अंधाधुंध आरोपों की फायरिंग होती थी कि बड़े लोगों से लोहा लो। लेकिन बीते कुछ समय से केजरीवाल इस स्टाइल से थोड़ा परहेज करते नजर आ रहे थे या इसका टैक्टिकल उपयोग करते नजर आ रहे थे। लेकिन लोग कह रहे हैं कि जस्टिस स्वर्णकांता पर सीधे सवाल उठाकर केजरीवाल ने अपने पुराने दिन याद दिला दिए हैं जब वो दिल्ली चुनावों से पहले प्रचार करते हुए कुछ पर्चे दिखाया करते थे।
इसका राजनीतिक प्रभाव भी उतना ही गहरा है। एकानूनी दिग्गज केजरीवाल की इस रणनीति को एक खतरनाक मिसाल बता रहे हैं। केजरीवाल पर अपनी पसंद का जज चुनने का प्रयास करने का आरोप लगाया। भले ही कोई वादी मुकदमा जीतता हो या हारता हो, किसी भी निराशाजनक आदेश के लिए एकमात्र वैध उपाय उच्च अदालत में औपचारिक चुनौती देना ही है। अदालत शक्तिहीन नहीं है, वह जमानती वारंट के माध्यम से मौजूदगी अनिवार्य कर सकती है, या बहिष्कार के बावजूद मामले की सुनवाई जारी रखने के लिए 'एमिकस क्यूरी' नियुक्त कर सकती है। यह विवाद केजरीवाल द्वारा मौजूदा बेंच पर व्यक्त किए गए अविश्वास से उपजा है। हालांकि, बार काउंसिल के नियम आम तौर पर यह अनिवार्य करते हैं कि वकील उन अदालतों में पेश न हों जहां जज के साथ उनके व्यक्तिगत संबंध हों।