जानिए उज्जैन से उपजी हिंदू कालगणना का वैश्विक महत्व नव संवत्सर पर

By प्रवीण गुगनानी | Mar 22, 2023

नववर्ष प्रतिपदा या हिंदू नववर्ष के विषय में बात करते समय हमें इसकी वैज्ञानिकता का पूर्ण आभास होना चाहिए। हमारी सनातनी कालगणना आज समूचे विश्व को हमें आदर देने को विवश करती है। उज्जैन में महाकाल की मूर्ति या विग्रह केवल धार्मिक चिन्ह नहीं अपितु समय की वैज्ञानिक गणना का एक महत्वपूर्ण केंद्र है। महाकाल मंदिर के स्थान से ही नौग्रहों की गति, चाल, घूर्णन, और परिधि को और उसके पृथ्वी पर पड़ने वाले प्रभाव को समझा जा सकता है। विश्व की सभी सभ्यताओं में स्वयं को सर्वोत्तम, सभ्यतम, प्राचीनतम बतानें में एक तथ्य का उल्लेख अवश्य किया जाता है – वह है; कैलेंडर, समय, अर्थात काल की गणना और गणना का वैज्ञानिक आधार। काल गणना की दृष्टि से हम भारतीय सौभाग्यशाली हैं कि सम्पूर्ण विश्व और प्रमुख वैश्विक वैज्ञानिक संस्थान इस संदर्भ में हमारें शास्त्रों और परम्पराओं की ओर देखते हैं। समय अर्थात काल को जिस स्थान पर महान और ईश्वर तुल्य भाव प्राप्त हुआ वह दुर्लभ स्थान है महाकालेश्वर।  स्कन्द पुराण एवं महाभारत अनुसार उज्जैन तीन हजार वर्ष पुरातन  नगर है। राजा चंद्रसेन नें इस काल तंत्रसिद्ध मंदिर का निर्माण किया। यह नगर भूगोल की दृष्टि से एक दिव्य, अद्भुत, सिद्ध और शक्तिशाली कोण से सूर्य की किरणों की गणना करता है। प्राचीन भारतीय मनीषियों, ऋषियों, तांत्रिकों और वैज्ञानिकों ने इस स्थान के भौगोलिक, ज्योतिषीय, खगोलीय महत्व को जानते थे। हमारे 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक महाकालेश्वर का देवस्थान उज्जैन में होना उसके सर्वकालिक स्वरूप को आलोकित करता है।

भारतीय काल गणना में उज्जैन के महत्त्व को इस तथ्य से भी समझा जा सकता है कि सांस्कृतिक भारत के सर्वाधिक सनातनी और धार्मिक आयोजन सिंहस्थ हेतु नियत चार स्थानों में से एक स्थान का गौरव उज्जैन को प्राप्त है। पिछले हजारों वर्षो के इतिहास में उज्जैन की इस प्रतिष्ठा को अनेक राजाओं, ऋषियों, खगोल वैज्ञानिकों और तांत्रिकों ने समय समय पर पहचाना फलस्वरुप हर कालखंड में उज्जैन में विशिष्ट शैली के विज्ञान आधारित निर्माण हुए। 

इसे भी पढ़ें: Hindu Nav Varsh: नव सम्वत् पर संस्कृति का सादर वन्दन करें

जयपुर के महाराजा जयसिंह नें 1719 में वेधशाला (प्रेक्षागृह) का निर्माण कराया। इसमें तारामंडल का सुन्दर वास्तु है एवं दूरबीन लगी है। यहां लगे उपकरण से प्रत्येक खगोलीय परिस्थिति का विषुवत रेखा से किसी भी कोण के झुकाव का माप किया जा सकता है। शेष विश्व के खगोल वैज्ञानिकों के लिए यह उस समय असंभव कार्य था। उज्जैन को स्पर्श कर निकलती देशांतर रेखा के कोण से खगोलीय प्रयोगों को सिद्द करनें हेतु यहां चार यंत्र समरात यंत्र, नाद यंत्र, लम यंत्र, दिंगारा यंत्र लगाए गए थे। पंचाग आज वैश्विक जिज्ञासा का केंद्र है और पंचाग का केंद्र और लेखनस्थल उज्जैन है।

भूमध्य रेखा पर स्थित उज्जैन के विकसित, प्रतिष्ठित स्वरुप को पुराणों, उपनिषदों, और महाभारत में आनें वाले उल्लेख से समझा जाना चाहिए। यहां विश्व के आद्य इतिहास से सम्बंधित पुरातात्विक सामग्री प्रचुर मात्रा में बहुधा ही मिलती रहती हैं। कृष्ण और बलराम को विद्यार्थी रूप में गुरु संदीपनी नें अपनें आश्रम में इस नगरी में शिक्षित किया था। इस नगरी का पुण्य प्रताप और तेजस, औरा का ही प्रभाव ही रहा कि यहां से अखिल-निखिल विश्व को अनेकों कालजयी गणितीय सूत्र मिले। गणितज्ञों की एक सुदीर्घ परम्परा और संस्थान के उत्तराधिकारी, “लीलावती” व “बीज गणित” जैसे गणितीय शास्त्रों के लेखक भास्कराचार्य उज्जैन की वेधशाला के निदेशक थे। यहीं उन्होंने “गुरुत्वाकर्षण बल” की खोज की ज्योतिष शास्त्र की अद्वितीय पुस्तक “सिद्धांत शिरोमणि” लिखी। गणितीय समीकरणों को हल करने की उनकी “चक्रवात पद्धति” को आज भी पूरे विश्व के समय वैज्ञानिक स्वीकार करते हैं। उज्जैन में रहकर ही भास्कराचार्य ने समय की सबसे छोटी इकाई “त्रुटि” और सबसे बड़ी ईकाई “कल्प” का अविष्कार किया। इस त्रुटि और कल्प की कल्पना भी पाश्चात्य देशों और उस समय की कथित विकसित सभ्यताओं को नहीं थी। शुद्धतम काल गणना की सर्वाधिक मान्य भौगोलिक स्थली महाकाल नगरी उज्जैन में ही भास्कराचार्य ने निम्नानुसार कालगणना मानव सभ्यता को प्रदान की थी–

225 त्रुटि = 1 प्रतिविपल

60 प्रतिविपल = 1 विपल (0.4 सैकण्ड)

60 विपल = 1 पल (24 सैकण्ड)

60 पल = 1 घटी (24 मिनिट)

2.5 घटी = 1 होरा (एक घण्टा)

5 घटी या 2 होरा = 1 लग्न (2 घण्टे)

60 घटी या 24 होरा या 12 लग्न = 1 दिन (24 घण्टे)

एक विपल 0.4 सैकण्ड के बराबर है तथा “त्रुटि’ का मान सैकण्ड का 33,750वां भाग है, लग्न का आधा होरा कहलाता है, होरा एक घण्टे के बराबर है। पाश्चात्य जगत इसी होरा को हावर या ऑवर कहने लगा।  सृष्टि का प्रारम्भ चैत्र शुक्ल प्रथमा, रविवार को हुआ। इस दिन के पहले होरा का स्वामी सूर्य था, उसके बाद के दिन के प्रथम होरा का स्वामी चन्द्रमा था अतः रविवार के बाद सोमवार आया। इस प्रकार सातों वारों के नाम सात ग्रहों रख कर सम्पूर्ण विश्व नें हमारी पौराणिक संगणना को मान्य किया किन्तु तत्पश्चात उसमें चतुरता पूर्वक अपनें पुट मिलाते हुए उसे अपना नाम देते और अपनाआविष्कार बताते चले गए। समय की सबसे बड़ी इकाई “कल्प’ को माना गया, एक कल्प में 432 करोड़ वर्ष होते हैं। एक हजार महायुगों का एक कल्प माना गया जो कि निम्नानुसार है–

1 कल्प = 1000 चतुर्युग या 14 मन्वन्तर

1 मन्वन्तर = 71 चतुर्युगी

1 चतुर्युग = 43,20,000वर्ष

इस प्रकार उज्जैन के महाकाल वस्तुतः उज्जैन के नहीं अपितु समूचे विश्व के हैं और संपूर्ण चराचर जगत को काल की दृष्टि, काल का महत्त्व, शुभ के मुहूर्त व अशुभ की चेतावनी देने वाले वैश्विक आराध्य हैं।

- प्रवीण गुगनानी

विदेश मंत्रालय, भारत सरकार में राजभाषा सलाहकार

प्रमुख खबरें

Hyderabad Liberation Day पर मुख्य अतिथि होंगे उपराष्ट्रपति C P Radhakrishnan, केंद्र करेगा आयोजन

Ovarian Cyst के लक्षण और कारण, ज्यादातर मामलों में बिना Surgery संभव है इलाज

Love Horoscope For 15 September 2026 | आज का प्रेम राशिफल 15 सितंबर 2026 | प्रेमियों के लिए कैसा रहेगा आज का दिन

Bigg Boss 20 में घमासान: किचन के काम और खाने को लेकर भिड़ीं Amrapali Dubey और Mahhi Vij, रोते हुए बाहर निकलीं माही