By प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क | Oct 12, 2021
नयी दिल्ली। पिछले महीने जारी किये गए अपने एक गीत “ठीक नहीं लगता” के साथ एक बार फिर सुरों का जादू बिखेरने वाली लता मंगेशकर का कहना है कि सात दशक पहले जिस छोटी सी लड़की ने पेशेवर गायकी की शुरुआत की थी, वह आज भी उनके भीतर है। मंगेशकर की आवाज में गाया गया एक गीत “ठीक नहीं लगता” पिछले महीने जारी किया गया, जिसके बोल गुलजार ने लिखे हैं। इस गीत को धुन देने वाले फिल्मकार विशाल भारद्वाज ने किसी फिल्म के लिए इसे रिकॉर्ड किया था, लेकिन वह फिल्म बन नहीं पाई। ऐसा माना जा रहा था कि यह गीत खो गया है लेकिन भारद्वाज ने हाल में उसे ढूंढ निकाला और इसे जारी करने के लिए मंगेशकर की अनुमति मांगी। मंगेशकर ने मुंबई से फोन पर दिए साक्षात्कार में अपने लंबे करियर को याद किया।
गुलजार, मंगेशकर के पसंदीदा गीतकार रहे हैं। मंगेशकर ने कहा कि “किनारा” फिल्म में गुलजार द्वारा लिखे गए गीत “नाम गुम जाएगा” की पंक्ति “मेरी आवाज ही पहचान है” संगीत की दुनिया में उनकी (मंगेशकर) पहचान बन गई और उनके प्रशंसक भी यह मानते हैं। उन्होंने कहा, “देश में सब लोग जानते हैं कि गुलजार साहब बेहद खूबसूरती से लिखते हैं। वह खूबसूरती से बोलते भी हैं। मैं जब (यह गाना) गा रही थी तब वे मेरे पास आए और धीरे से कहा, ‘मेरी आवाज ही पहचान है और ये है पहचान।’ उन्होंने ऐसा ही कुछ कहा था। लेकिन बाद में, मैं भी कहने लगी कि मेरी आवाज मेरी पहचान है। और अब जो भी यह गीत गाता है और मेरे बारे में लिखता है वह यह पंक्ति कहता है।” मंगेशकर ने कहा कि “ठीक नहीं लगता” की तरह बहुत से गाने समय के साथ खो गए। यह पूछे जाने पर कि उन्हें कौन से गाने पसंद हैं, मंगेशकर ने कहा, “अगर मैं यह बता दूंगी तो गड़बड़ हो जाएगी।” उन्होंने कहा, “मुझे सज्जाद हुसैन साहब का संगीत सबसे विशिष्ट लगता है। उन्होंने जो गीत बनाये, मुझे आज भी पसंद हैं।
सज्जाद हुसैन साहब और खय्याम साहब दोनों की अपनी विशिष्ट शैली थी। सज्जाद साहब के संगीत में अरबी पुट था और वह बताते थे कि कैसे गाया जाये। मुझे आज भी याद है। मुझे आज भी उनके द्वारा रचे गए गाने पसंद हैं, वे अलग होते थे।” अब तक विभिन्न भाषाओं में 25 हजार से ज्यादा गाने गा चुकीं मंगेशकर कहती हैं कि उन्हें वह दिन याद है जब उन्होंने इस गीत की रिकॉर्डिंग की थी। मंगेशकर ने कहा कि उन्हें देशभर की विभिन्न शैलियों और भाषाओं का संगीत पसंद है। उन्होंने कहा, “मुझे नहीं पता लोग जानते हैं या नहीं, लेकिन मुझे संगीत की दक्षिण भारतीय शैली पसंद है। मुझे बांग्ला संगीत और वे बंगाली गाने पसंद हैं जो मैंने गाए हैं। हिंदी संगीत भी है, गुजराती भी है। मैंने सभी भाषाओं में गाया है।” उन्होंने शंकर जयकिशन, मदन मोहन, जयदेव, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, एस डी बर्मन, नौशाद और आर डी बर्मन से लेकर रहमान तक हर पीढ़ी के संगीतकारों को याद किया, जिनके साथ वह काम कर चुकी हैं।