कश्मीरी पंडितों की पीड़ा पर दिल्ली विधानसभा में लगे अट्टास ने चौंकाया

By राकेश सैन | Mar 31, 2022

इन्द्रप्रस्थ अभिशप्त है ‘शकुनी अट्टहासों’ के लिए। द्वापर में लाक्षाग्रह पर शकुनियों ने इसी इन्द्रप्रस्थ में अट्टहास किया था और अब कश्मीरी हिन्दुओं के नरसंहार पर दिल्ली विधानसभा में वही गान्धार नरेश का अट्टहास सुनाई पड़ा है। दिल्ली में कश्मीरी हिन्दुओं के नरसंहार पर बनी ‘दि कश्मीर फाइल्स’ फिल्म को करमुक्त करने की मांग उठी तो मुख्यमन्त्री अरविन्द केजरीवाल ने जवाब दिया कि फिल्म को सोशल मीडिया प्लेटफार्म यू-ट्यूब पर डाल दो, बिल्कुल नि:शुल्क हो जाएगी। इस हल्की-फुल्की टिप्पणी से स्वयं उनके श्रीमुख पर शकुनी अट्टहास तो पसरा ही साथ में पूरी कौरवसभा की बत्तीसी के भी दर्शन हो गए। फिल्म की करमुक्ति की मांग इसलिए की गई थी कि अधिक से अधिक लोग कश्मीर में हिन्दुओं के साथ हुए अत्याचारों को पर्दे पर देख सकें व अतीत से सबक सीख सकें। लेकिन संवैधानिक पद पर विराजमान केजरीवाल ने जिस संवेदनहीनता का परिचय दिया वह लम्बे समय तक मानवता को शर्मसार करता रहेगा।

चाहे अट्टहासों का इतिहास पुराना है परन्तु दुनिया के वामपन्थियों ने इसका प्रयोग अपना विमर्श स्थापित करने व सच्चाई को हवा में उड़ाने की तकनीक के रूप में भी किया है। अमेरिका में यथार्थवादी कट्टरपन्थियों के लिए एक व्यावहारिक संग्रहक वामपन्थी विचारक साउल डी. एलिंस्की ने अपनी पुस्तक ‘रूल्स फॉर रेडिकल्स’ में विरोधी विमर्श (नैरेटिव) को ध्वस्त करने के लिए जिन 13 नियमों का उल्लेख किया है उसमें केजरीवाल मार्का अट्टहास भी शामिल है। क्योंकि तर्कों का जवाब दिया जा सकता है परन्तु उपहास का नहीं। इसमें सामने वाला अपने आप को अपमानित महसूस करता है। उपहास सबसे बड़ा हथियार है जो सामने वाले को नि:शस्त्र कर देता है। वामपन्थी चाहे दास कैपिटल को सिद्धान्तिक तौर पर अपना साहित्य बताते हैं परन्तु ‘रूल्स फॉर रेडिकल्स’ पुस्तक वामपन्थियों की हदीस मानी जाती है। वामपन्थियों द्वारा अपने विरोधियों विशेषकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी जैसों के खिलाफ काफी लम्बे समय से इसी शस्त्र का प्रयोग करते रहे हैं। आज भी सोशल मीडिया में कार्टून, मीम्स, टैक्सट मैसेज, कविताओं, चुटकुलों आदि के सहारे गम्भीर विमर्श को हल्का कर उसे झुठलाने व अपने विचार थोपने का प्रयास होता है। फिल्म के बाद छद्म उदारवादियों व धर्मनिरपेक्षतावादियों की लाख आलोचनाएं कश्मीरी हिन्दुओं की पीड़ा झुठलाने में असफल रहीं परन्तु दिल्ली की निर्मम अट्टहास ने मानो यह कार्य क्षणों में कर दिया।

अपनी पुस्तक ‘विषैला वामपन्थ’ में डॉ. राजीव मिश्रा कहते हैं कि बंगाल, त्रिपुरा में राजनीतिक पराजय के बाद पूरे वामपन्थ को पराजित मान लेना बड़ी भूल है, क्योंकि यह रूप बदल-बदल कर सामने आता है। वामपन्थी अपने जन्म से ही जिहादियों की ढाल रहे हैं। वे इस्लाम के खिलाफ कुछ नहीं बोलते। कम्युनिस्ट कुटुम्ब अकसर पंक्तियां गाते मिलता है कि ‘सब ताज उछाले जाएंगे और तख्त गिराए जाएंगे।’ फिल्म ‘दि कश्मीर फाइल्स’ में भी वाममार्गी फैज अहमद फैज की इस कविता को लिया गया है जो यूं है ...

हम देखेंगे, लाजिम है कि हम भी देखेंगे।

वो दिन कि जिसका वादा है।

जो लौह-ए-अजल में लिक्खा है।

जब अर्ज-ए-खुदा के काबे से।

सब बुत उठवाए जाएँगे।

हर अहल-ए-सफा, मरदूद-ए-हरम।

मसनद पे बिठाए जाएँगे।

सब ताज उछाले जाएँगे।

सब तख्त गिराए जाएँगे।

बस नाम रहेगा अल्लाह का।

जो गायब भी है हाजिर भी।

जो मंजर भी है नाजिर भी।

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ब्रिटिश सेना के पूर्व अधिकारी फैज ने विभाजन के समय पाकिस्तान चुना। वहाँ सेना से निकल कर वह ‘पाकिस्तान टाइम्स’ के सम्पादक बने। वह पाकिस्तान की कम्युनिस्ट पार्टी के सबसे बड़े नामों में एक थे। उनकी पत्नी एलिस जॉर्ज एक अंग्रेज महिला थी जो ब्रिटेन की कम्युनिस्ट पार्टी को सदस्य थीं। इतने समर्पित कम्युनिस्ट शायर की इस नज्म का अर्थ है कि ‘अहल-ए-सफा’ यानी आसमानी किताब कुर्रान को मानने वाले मसनद पर बिठाए जाएँगे। बस नाम रहेगा अल्लाह का यानि बाकी आस्थाएं मिटा दी जाएंगी। उनके लिए काबे के बुत हटाना ही इंकलाब है, अल्लाह का नाम ही सबसे बड़ी सत्ता है। कम्युनिस्ट पार्टी के जन्म से लेकर आज तक के इतिहास पर नजर दौड़ाई जाए तो सामने आएगा कि कट्टर इस्लाम जहां तलवार है तो वामपन्थ उसकी ढाल। मुस्लिम लीग व भारतीय वाममार्गियों का याराना कौन भूल सकता है ? कश्मीर में जिहादी संगठन इसी नज्म के अनुसार ही तो काम करते हैं, मन्दिरों में मूर्तियों को तोड़ते हैं, दूसरे धर्म के तख्त उछालते हैं। कुरान व अल्लाह को मानने वालों की ही तूती बोलती है। ‘दि कश्मीर फाइल्स’ ने एक बार फिर कट्टर इस्लाम का चेहरा दुनिया के सामने ला दिया है तो इन्हीं जाहिल शक्तियों की ढाल अगर दिल्ली की विधानसभा में अट्टहास करती है तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। रूप बदले हुए नव-वामपन्थी अपना काम ही कर रहे हैं।

-राकेश सैन

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