लॉकडाउन से वकील बुरी तरह प्रभावित, न्याय दिलाने वाले इस वर्ग को तत्काल आर्थिक मदद मिले

By आशीष राय | Jun 12, 2020

पूरा विश्व आज वैश्विक महामारी कोरोना (कोविड-19) की चपेट में है। इस महामारी ने समाज के सभी वर्गों को प्रभावित किया है। समाज का प्रतिष्ठित सेवा क्षेत्र वकालत भी इस वैश्विक महामारी से अछूता नहीं है। कचहरी परिसर सन्नाटों के शोर में हैं तो न्यायालय शोकमग्न से। अपनी विद्वता और श्रम से याची को न्याय दिलाने में लगा रहने वाला अधिवक्ता वर्ग अर्थ के बिगड़े स्वरूप में जीवन की विषमताओं से जूझने को अभिशप्त है।


कोरोना की भयावहता को देखते हुए सरकार ने समय पर निर्णय कर इस महामारी को नियंत्रित करने का प्रयास भी किया। लेकिन परिस्थितियां इतनी प्रतिकूल रहीं कि पूरे देश में तालाबंदी करनी पड़ी। पूरा देश ठप पड़ गया। देश के निम्न और मध्यम श्रेणी के व्यवसाय, सेवा क्षेत्र और निजी क्षेत्रों में नौकरी कर लोगों में जीवन यापन का संकट भी पैदा हुआ है। आज पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था हिल गयी है। भारत में भी इस महामारी ने मजदूरों से लेकर उद्योगपतियों तक, व्यवसायियों से लेकर सेवा क्षेत्र में कार्य कर रहे सभी लोगों अर्थात् हर क्षेत्र के लोग बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। इस महामारी के कारण हुई तालाबंदी ने लोगों को शहरों से पलायन को भी विवश किया। 

 

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भारत की सरकार ने अर्थव्यवस्था की गाड़ी को पटरी पर लाने के लिए 20 लाख करोड़ रुपए के आर्थिक पैकेज की घोषणा की है परंतु तालाबंदी से सीधे-सीधे प्रभावित हुए लोगों को इस आर्थिक पैकेज से क्या लाभ होगा, यह आमजन की समझ से परे है। शहरों से गांवों की ओर पलायन करने वाले पढ़े लिखे युवा भी मनरेगा में पंजीकृत हो दिहाड़ी मजदूरी को विवश हैं।


वकालत को सेवा क्षेत्र का उत्कृष्ट कार्य माना जाता रहा है। लॉ फर्म/कंपनियों ने अच्छे वेतन का प्रस्ताव देकर इस क्षेत्र में युवाओं को बहुत आकर्षित किया है। कालांतर में युवाओं के इस क्षेत्र में झुकाव से अधिवक्ताओं की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि हुई है‌। आज देश में लगभग 25 लाख के आस-पास पंजीकृत अधिवक्ता हैं। बहुसंख्यक अधिवक्ताओं की आर्थिक स्थिति दैनिक मुकदमों की सुनवाई पर ही निर्भर रही है। सेवा क्षेत्र होने के बावजूद मुकदमों की पैरवी से मिलने वाली फीस ही अधिवक्ता परिवारों के जीविकोपार्जन का साधन है। कोरोना महामारी में तालाबंदी के कारण न्यायालय भी बंद हो गये। जनता कर्फ्यू के पहले से न्यायालयों ने सावधानी बरतनी शुरू कर दी थी। न्यायालयों में कार्य ठप होने के कारण अधिवक्ता परिवारों की स्थिति आज आर्थिक रूप से चिंतनीय हो गयी है। तालाबंदी के इस कालखंड में बहुसंख्यक अधिवक्ताओं के परिवारों की आर्थिक स्थिति इतनी दयनीय हो गई है कि संबंधित राज्य बार कौंसिल को उन परिवारों को दैनिक आवश्यकताओं के लिए भी कुछ सहायता राशि का आवंटन करना पड़ा है। परंतु यह सहायता राशि इतनी पर्याप्त नहीं है कि अधिवक्ता परिवारों की आर्थिक स्थिति ठीक हो सके। अधिवक्ताओं की सामाजिक सुरक्षा का भी विषय बार-बार उठता रहा है। कुछ राज्यों ने तो अपने अधिवक्ताओं के लिए स्वास्थ्य बीमा का प्रयोजन किया है परंतु बहुत से राज्यों में अभी भी ऐसी स्थिति नहीं है। कुछ राज्यों की बार काउंसिल ने वृद्ध अधिवक्ताओं के पेंशन की भी व्यवस्था का प्रावधान किया है। लेकिन आज आवश्यकता इस बात की है कि अधिवक्ता परिवारों के स्वास्थ्य बीमा, सावधि बीमा और पेंशन की एक केंद्रीयकृत व्यवस्था हो, जिससे अधिवक्ता परिवारों को सामाजिक सुरक्षा मिल सके। 


उच्चतम न्यायालय ने वर्चुअल कोर्ट की अवधारणा लाकर तकनीकी रूप से अक्षम, जिनकी संख्या बहुमत से भी ज्यादा है, अधिवक्ताओं को और पंगु बना दिया है। वर्चुअल कोर्ट की अवधारणा पर अपने देश में काम करना वकीलों के लिए बहुत ही दुष्कर कार्य है। बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने भी उच्चतम न्यायालय को पत्र लिखकर आग्रह किया है कि न्यायालयों को पूर्व की भांति ही खोल कर कार्य कराया जाए क्योंकि वर्चुअल कोर्ट की अवधारणा भारत में अभी संभव नहीं है। महानगरों में भी वर्चुअल कोर्ट ठीक ढंग से नहीं काम कर पा रहे हैं, इसकी भी शिकायतें लगातार आ रही हैं। वर्चुअल कोर्ट के लिए एक सामान्य अधिवक्ता को भी कंप्यूटर या लैपटॉप, इंटरनेट और एक कार्यालय की आवश्यकता होगी जोकि देश के 90 प्रतिशत अधिवक्ताओं के पास नहीं है। वर्तमान परिस्थिति में यदि उनको यह सारी व्यवस्था करनी पड़ेगी तो एक सामान्य अधिवक्ता के लिए यह बहुत कठिन होगा क्योंकि इसके लिए अतिरिक्त वित्त की आवश्यकता होगी, जो वर्तमान परिस्थितियों में संभव नहीं है। 

 

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अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद ने वर्तमान परिदृश्य में अधिवक्ताओं की आवश्यकताओं को ध्यान रखते हुए ही केंद्र सरकार को हाल ही में एक प्रतिवेदन दिया है कि अधिवक्ताओं को पांच लाख तक का ऋण सस्ती ब्याज दर पर, छह माह के लिए किस्त भुगतान स्थगित करने का प्रावधान करके, उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जाए। यदि ऐसी व्यवस्था होती है तो छोटे शहरों, जिला कचहरी स्तर तक के अधिवक्ताओं को स्वयं का कार्यालय लेने, साथ ही उसे कंप्यूटर आदि लेकर डिजिटाइज करने की व्यवस्था करने में आसानी हो सकती है। वैश्विक महामारी के चलते उपजी इस आर्थिक मंदी के दौर में ऐसी योजना से महानगरीय अधिवक्ताओं को भी लाभ होगा। 


इस देश का लोकतंत्र साक्षी है कि अंग्रेजी पराधीनता से लेकर 2020 के भारत तक अधिवक्ताओं ने अपनी भूमिका और योगदान से राष्ट्र के गौरव को बढ़ाया है। अधिवक्ता समाज सदैव देश के विभिन्न सकारात्मक आंदोलनों का नेतृत्व करता रहा है। परन्तु दुर्भाग्य है कि नेतृत्व की प्रथम पंक्ति के योद्धा अधिवक्ता आज आर्थिक समस्याओं से घिर गए हैं। आज आवश्यकता है कि कोरोना वैश्विक महामारी के कारण आर्थिक दुष्चक्र में फंसे इस वर्ग को सरकार राहत पहुंचाए।


आशीष राय

(लेखक उच्चतम न्यायालय में अधिवक्ता हैं)


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