भारतीय राजनीति में चीते और घोड़े (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Aug 21, 2023

मेहमान चीतों ने भारतीय राजनीति में, खूब ख्याति अर्जित कर ली है। लोकतान्त्रिक सुव्यवस्था का मज़ा लेते हुए, अपनी फुर्तीली ज़िंदगी की बलि आराम से दिए जा रहे हैं। राजनीति ने उनकी विवशता को खूब चर्चित कर दिया है। चर्चित होकर मरना भी तो मरने की बेहतर किस्मों में से एक है। हमारे माहिर सामाजिक, राजनीतिक नायक थकते नहीं, विदेशी मुद्दे और सर्वे कम पड़ने लगे तो चीते को ही राजनीति का विषय बना देते हैं। विदेश में पकाई कहानियां स्वदेश में परोसी और खाई जाने लगती हैं। ज़बान का क्या है, चीते सी फुर्ती से भी तेज़ चलती है। कह देते हैं राज और नीति ने चीतों को मरवा दिया। बच्चों को बचपन में ही नरक भिजवा दिया। बता रहे  हैं यदि वे अपने नानाजी के पुराने जंगल में पैदा होते तो कुछ न होता। चीते स्वभाव से नाज़ुक और संवेदनशील होते हैं। घर जैसे भारतीय माहौल में होने के बावजूद उन्हें भी तो अपनी मूल धरती, देश, रिश्तेदार और परिवेश याद तो आ ही सकता है जी।

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जानवरों का सामयिक प्रयोग तो कब से हो रहा है। गाय, राजनीति का महत्त्वपूर्ण अंग, रंग और ढंग रह चुकी है। बंदर और कुत्ते भी राजनीति का हिस्सा बनने की कोशिश करते रहते हैं जी। बंदर तो कब से धार्मिक छाया में हैं। कुत्तों ने अभी तक वफादारी नहीं छोडी है, वह बात दीगर है कि वॉच डॉग कहलाने वालों को भी घोड़ों के व्यापार का हिस्सा बना डाला है। आवारा कुत्तों के मामले में तो वन्य जीव प्रेमी और व्यवस्था की वफादारी लगभग छूमंतर है। वैसे तो भारतीय लोकतान्त्रिक राजनीति के लिए, घोड़े बहुत ज़रूरी हैं। दिलचस्प यह है कि कोई राजनीतिक दल पूर्ण बहुमत लेकर सरकार बना ले तो प्रशंसनीय, अगर ऐसा नहीं हो पाता तो घोड़ों की ज़रूरत पड़ जाती है जी। चूंकि घोड़े कम उपलब्ध हैं और एकदम मिल नहीं सकते, इसलिए बिना घोड़ों के भी, घोड़े बेच या खरीद लिए जाते हैं। इन घोड़ों को सूअर नहीं कह सकते जी। 

विदेशी नेता चाहें तो हमारे यशस्वी राजनीतिज्ञों से प्रेरणा लेकर अपनी राजनीति भी हांक सकते हैं। राज और नीति की भूमिका जब व्यापार हो जाए तो क्या क्या हो सकता है यह लिखने की नहीं समझने की बात है जी।  

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