प्रेम का लाइसेंस– एक राष्ट्रीय योजना (व्यंग्य)

By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा 'उरतृप्त' | Sep 02, 2025

देश में समस्याएँ बहुत हैं— बेरोज़गारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, और अब एक नई राष्ट्रीय आपदा: आधुनिक प्रेम, जिसे आजकल की भाषा में ‘डेटिंग’ कहा जाता है। यह संकट कोई महामारी नहीं है, न ही कोई युद्ध, लेकिन इसका असर उतना ही विनाशकारी है। हमारे देश के युवा, विशेषकर 16 से 23 वर्ष की आयु के बीच, अपने जीवन के सबसे उपजाऊ वर्ष एक ऐसी गतिविधि में बर्बाद कर रहे हैं, जिसका न कोई परिणाम है, न कोई उद्देश्य। वे डिजिटल प्रेम के जाल में फँसे हैं— चैटिंग, इमोजी, और ‘सीन’ का इंतज़ार करते हुए। यह एक ऐसा भावनात्मक निवेश है, जिसमें न ब्याज मिलता है, न मूलधन लौटता है।

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इस स्थिति को देखकर मैंने कुछ समाजशास्त्रियों, नैतिक दार्शनिकों और गणितज्ञों से परामर्श किया। और अंततः एक योजना बनाई— एक ऐसी योजना जो सरल है, व्यावहारिक है, और देशहित में है। मेरा प्रस्ताव है कि प्रेम को एक व्यवस्थित, राज्य-नियंत्रित प्रणाली में बदल दिया जाए। जैसे ड्राइविंग लाइसेंस होता है, वैसे ही कोर्टशिप लाइसेंस हो। हर युवक को 18 वर्ष की आयु में यह लाइसेंस मिले, जिसमें उसके प्रेम संबंधों का रिकॉर्ड हो। वहीं, हर युवती को एक सोशल क्रेडिट अकाउंट दिया जाए, जिसमें उसके व्यवहार और जवाबदेही का हिसाब रखा जाए।

इस योजना के तहत, प्रेम की शुरुआत एक निर्धारित शुल्क से होगी। पहला संदेश भेजने के लिए रु. 50— लड़की को तीन घंटे में जवाब देना होगा: "हाँ" या "ना"। अगर बात आगे बढ़े, तो रु. 200 में एक कॉफी डेट तय होगी। अगर लड़की बीच में उठकर चली जाए, तो रु.100 वापस। इस तरह, हर चरण एक अनुबंध होगा— भावनाओं का नहीं, व्यवहार का। ‘टॉकिंग स्टेज’ जैसी अनिश्चित अवस्था को समाप्त कर दिया जाएगा। अब प्रेम एक प्रक्रिया होगी— चरणबद्ध, पारदर्शी और लाभकारी।

इससे कई लाभ होंगे। पहला, युवकों को अपने समय और भावनाओं की कीमत समझ में आएगी। वे अब बिना उद्देश्य के चैटिंग नहीं करेंगे, बल्कि सोच-समझकर निवेश करेंगे। दूसरा, युवतियाँ भी जवाबदेह होंगी — उन्हें हर बातचीत का मूल्य मिलेगा, और उनका सोशल क्रेडिट बढ़ेगा। तीसरा, देश को एक नया उद्योग मिलेगा— प्रेम उद्योग। इससे अर्थव्यवस्था में नया पूँजी प्रवाह होगा, और युवाओं को एक नई दिशा मिलेगी। सबसे सफल युवतियाँ ‘प्रीमियम लाइसेंस’ प्राप्त करेंगी— जिससे वे अपनी बातचीत की दर बढ़ा सकेंगी।

कुछ भावुक लोग कहेंगे— "प्रेम को व्यापार बना दिया?" तो उनसे मेरा उत्तर है— "जब प्रेम में खर्चा हो ही रहा है, तो रसीद क्यों नहीं?" आज का प्रेम एक लॉटरी बन चुका है— जिसमें अच्छे युवक हार जाते हैं, और स्मार्टफोन वाले जीत जाते हैं। मेरा प्रस्ताव इस लॉटरी को एक अनुबंध में बदलता है— जिसमें हर पक्ष को स्पष्टता और सुरक्षा मिले। यह प्रेम का बाज़ारीकरण नहीं, बल्कि प्रेम का प्रबंधन है। और प्रबंधन वही करता है जो भावनाओं को दिशा देता है।

जेन-ज़ी लड़की को बदलना असंभव है— वह इमोजी में जीती है, रील्स में सोचती है, और ‘घोस्ट’ करने में माहिर है। लेकिन हम उसकी प्रकृति को समझकर एक ऐसा ढाँचा बना सकते हैं, जिसमें उसकी आदतें देशहित में काम आएँ। यह योजना प्रेम को एक सेवा की तरह देखती है— जिसमें समय, ऊर्जा और पैसा सबका हिसाब रखा जाता है। इससे भावनात्मक थकावट कम होगी, और युवाओं को एक स्पष्ट मार्ग मिलेगा।

मैं यह योजना अपने लाभ के लिए नहीं दे रहा— मैं उस उम्र में हूँ जहाँ प्रेम एक पुरानी कविता की तरह याद आता है। लेकिन देश के युवाओं को देखकर मन व्यथित होता है। वे स्क्रीन पर भावनाएँ खोजते हैं, और जवाब में ‘सीन’ पाते हैं। यह योजना उन्हें दिशा देगी, सम्मान देगी, और देश को एक नई ऊर्जा देगी। आइए, हम इस योजना को अपनाएँ— और प्रेम को एक उद्देश्य दें, एक सम्मान दें, और एक भविष्य दें।

- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’,

(हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

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