रिटायरमेंट के बाद का जीना (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Apr 11, 2022

स्वास्थ्य की देखभाल बारे प्रवचन करने वाले कहते रहते हैं कि ज़िंदगी की रफ़्तार कम करने की ज़रूरत है लेकिन ज़िंदगी ठीक से गुज़ारने के लिए वास्तव में एक नहीं कई काम करने पड़ते हैं। भाग दौड़ बढ़ती ही जाती है। आराम से जीना हो तो सरकारी नौकरी बढ़िया है लेकिन सारे जहां से अच्छे हमारे देश में सरकारी नौकरी मिलना भी तो मुश्किल है और रिटायर होने के बाद आराम से रहना तो और भी। हम रिटायर होकर आए ही थे कि एक पुराने घिसे पिटे रिटायरी मिल गए बोले कहां रहते हो। मैंने कहा अब घर पर हूं। छुट्टी पर हो क्या? अब हमारी पूरी छुट्टी हो गई है, रिटायर हो गया हूं। ओहहो उनके मुंह से तपाक निकला। हमने बोला अभी तो हम स्वस्थ और जीवित हैं आप को दुख क्यों हुआ। मैंने पूछा आपको रिटायर हुए कई साल हो गए हैं, आप अपनी मर्ज़ी की ज़िंदगी के मज़े ले रहे हैं अच्छा नहीं लगता क्या। अजी क्या मज़े ले रहे हैं, कभी भूख लगे और पत्नी से कहूं, थोडा पोहा बना दो तो कहेंगी परसों का बना सूजी का हलवा खा लो, खत्म नहीं हो रहा है। चाय को कहो तो सुनाएगी, अभी थोड़ी देर पहले तो पी थी, आजकल तुम चाय बहुत पीने लग गए हो। बोलेगी मेरे कपड़े प्रैस कर दो, धनिया तोड़ दो। फिर याद भी दिलाएगी कि ठीक से करना दोनों काम। आप क्या करेंगे अब, उन्होंने मुझसे पूछा। ज़िंदगी का भरपूर मज़ा लूंगा।

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क्या करेंगे, उन्हें मेरा कहा समझ नहीं आया। मैंने कहा पत्नी का कहना ज़्यादा मानना शुरू करूंगा, घर के कामों में हाथ बटाउंगा। बोले वो तो करना ही पड़ेगा। कोई नौकरी कर लो। इतने में पत्नी का फोन आ गया, सब्जी, आलू और प्याज़ ले आना, सब्जी छांट कर लाना। प्याज़ आधे बड़े लाना आधे छोटे छोटे लाना। फोन बंद ही किया था पुराना गंजा क्लासमेट मिल गया, आ गया रिटायर होकर, फेसबुक पर तो दिखा नहीं। हमने कहा फेस बुक तो फेक न्यूज़ की तरह फेक है। हम तो फेस टू फेस हैं प्यारे। उसने कहा फेसबुक पर आजा पूरा दिन बढ़िया जाएगा। अपने गंजे सिर पर बचे लिपटे छियासी बालों पर हाथ फेरते हुए, मेरे दोस्त के चेहरे पर क्या संतुष्टि थी। हम अच्छा कहकर निकले।

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बाग़ में सुबह की सैर करते, रिटायरमेंट से जूझते एक और दोस्त मिले, बोले आ गए छूट कर। लगा जैसे सरकारी नौकरी से रिटायर होकर नहीं जेल से छूटकर आया हूं। वे बोले यार सरकारी नौकरी में बहुत इज्ज़त रहती थी। घर पर सारी चीज़ें समय पर मिलती थी, कितने लोग सलाम करते थे। आजकल क्या शगुल है मैंने कहा। बोले अब तो अच्छे से कपड़े प्रेस करना सीख लिया है। अनार के दाने निकाल निकाल निकाल कर ग़ज़ब की सहन शक्ति उग आई है। तुम्हें लिखने का शौक भी तो....?  दोस्त बोले, मुझे अच्छी तरह समझा दिया गया है कि अब न कहानियां लिखने की ज़रूरत है न कहानियां डालने की। इससे पहले कि कोई और मिले और मुझे ज़्यादा ‘टायर’ कर दे मैंने जल्दी से सब्जी मंडी का रुख किया जहां से अपनी पत्नी की पसंद की सब्जी, आलू और प्याज़ लाने थे। 


- संतोष उत्सुक

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