By शुभा दुबे | Jan 13, 2017
खुशहाली के आगमन का प्रतीक है लोहड़ी पर्व। जनवरी माह के दूसरे सप्ताह में मनाया जाने वाला यह पर्व किसानों के लिए विशेष रूप से उत्साह लेकर आता है क्योंकि इस पर्व तक उनकी वह फसल पक कर तैयार हो चुकी होती है जिसको उन्होंने अपनी अथक मेहनत से बोया और सींचा था। इस दिन जब लोहड़ी जलाई जाती है तो उसकी पूजा गेहूं की नयी फसल की बालों से ही की जाती है। जाति बंधनों से मुक्त होकर यह पर्व समूचे उत्तर भारत खासकर पंजाब और हरियाणा में काफी धूमधाम से मनाया जाता है। राजधानी दिल्ली में भी इस पर्व की धूम खूब रहती है। मकर संक्रांति से एक दिन पहले पड़ने वाले इस पर्व पर लोग मस्ती में रहते हैं तथा नाच गाकर अपनी खुशियों का इजहार करते हैं। पंजाब में तो इस पर्व पर अलाव जलाकर भांगड़ा नृत्य किया जाता है और मूंगफली, रेवड़ी तथा गजक का प्रसाद बांटा जाता है। इस दिन पंजाबी गायकों की काफी मांग रहती है और विभिन्न इलाकों में वह अपनी गायकी से लोगों को झूमने पर मजबूर कर देते हैं।
इस दिन पंजाब में बहुएं घर घर जाकर लोकगीत गाकर लोहड़ी मांगती हैं और दुल्ला भट्टी के गीत गाती हैं। इस गीत के पीछे यह मान्यता है कि महराजा अकबर के शासन काल में दुल्ला भट्टी एक लुटेरा था लेकिन वह हिंदू लड़कियों को गुलाम के तौर पर बेचे जाने का विरोधी था। उन्हें बचा कर वह उनकी हिंदू लड़कों से शादी करा देता था। गीतों में उसके प्रति आभार व्यक्त किया जाता है। पंजाब में नई बहू और नवजात बच्चे के लिए लोहड़ी का विशेष महत्व होता है। इस दिन रेवड़ी और मूंगफली वितरण के साथ ही मक्के की रोटी और सरसों के साग का भोज भी आयोजित किया जाता है। पंजाब के गांवों में तो इस दिन इस तरह के दृश्य आम होते हैं कि परम्परागत वेशभूषा पहले सिख पुरुष और स्त्रियां ढोल की थाप पर लोकप्रिय भांगड़ा नृत्य कर खुशियां मनाते हैं। बच्चों को भी उनका साथ देते देखा जा सकता है। स्त्रियां तो इस अवसर पर अपनी हथेलियों और पांवों पर आकर्षित करने वाली आकृतियों वाली मेहंदी भी रचाती हैं।
- शुभा दुबे