शुरु से ही विवादों में घिरे रहे हैं लोकसभा अध्यक्ष बिरला

By योगेंद्र योगी | Feb 17, 2026

देश में संसद की गरिमा में गिरावट जारी है। लोकसभा स्पीकर जैसा गरिमामय और संवैधानिक पद विवादास्पद बना हुआ है। लगभग समूचा विपक्ष लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ बांहे चढ़ाए हुए है। बिरला पर विपक्ष लंबे समय से पक्षपात करने का आरोप लगाता आ रहा है। स्पीकर बिरला पर विपक्षी सदस्य लगातार उनके संवैधानिक अधिकारों का हनन और सत्तापक्ष की खुलेआम पैरवी करने का आरोप लगाते रहे हैं। इस बार भी मुद्दा यही है। विपक्ष ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को पद से हटाने के लिए अविश्वास प्रस्ताव लाने का नोटिस दिया है। हालांकि, गणित और इतिहास को देखें तो उन्हें हटाना बेहद मुश्किल है, लेकिन यह कदम आने वाले दिनों में संसद में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच कड़वाहट को और बढ़ा सकता है। 

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जून 2024 में दूसरी बार लोकसभा स्पीकर चुने जाने के बाद भी ओम बिरला पर आरोप लगा था कि वो विपक्षी सांसदों को बोलने का मौक़ा नहीं दे रहे हैं। तब भी ओम बिरला पर ये आरोप विपक्षी दल लगाते रहे हैं कि वो सत्ता के इशारे पर काम करते हैं जबकि स्पीकर का पद संवैधानिक पद है। जून 2024 में ही नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी जब नीट परीक्षाओं के मुद्दे पर बोलने को खड़े हुए तो वो स्पीकर ओम बिरला से माइक देने (ऑन करने) की बात कहते सुनाई दिए। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि ज़रूरी मुद्दों पर माइक छीनकर युवाओं की आवाज़ को दबाया जा रहा है। हालांकि ओम बिरला ने कहा कि लोकसभा में माइक बंद नहीं करता हूं, यहां कोई बटन नहीं होता है। 

ये पहला मौक़ा नहीं है जब विपक्ष और ओम बिरला के बीच तनातनी देखी गई। इससे पहले भी ओम बिरला विवादों में रह चुके हैं और उन पर विपक्ष सत्ता पक्ष की तरफ़ झुके रहने का आरोप लगा चुका है। संसद के शीतकालीन सत्र 2023 के दौरान 141 सांसदों को निलंबित किया गया था। इनमें 95 लोकसभा और 46 राज्यसभा सांसद शामिल थे। इससे पहले इतनी बड़ी संख्या में सांसदों का निलंबन नहीं हुआ था। इस निलंबन को अभूतपूर्व कहा गया था। इससे पहले 15 मार्च, 1989 को लोकसभा से 63 सांसदों को निकाला गया था। संसद में सुरक्षा चूक को लेकर सांसद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में गृह मंत्री अमित शाह के बयान की मांग कर रहे थे, जिसके बाद निलंबन की कार्रवाई की गई थी। 

भारतीय संविधान में स्पीकर के पद को बहुत सुरक्षित रखा गया है ताकि वे बिना किसी डर या पक्षपात के काम कर सकें। अनुच्छेद 94 (c) के तहत उन्हें हटाने की प्रक्रिया कुछ इस प्रकार है। प्रस्ताव लाने से कम से कम 14 दिन पहले इसकी लिखित सूचना देनी होती है। स्पीकर को हटाने के लिए सदन के तत्कालीन कुल सदस्यों के बहुमत की आवश्यकता होती है। अर्थात उस समय जितने सदस्य पद पर हैं, उनमें से 50% से अधिक का समर्थन जरूरी है। जब प्रस्ताव पर चर्चा होती है, तब स्पीकर सदन की अध्यक्षता नहीं कर सकते, हालांकि वे सदन में मौजूद रह सकते हैं और वोट डाल सकते हैं। संविधान के अनुच्छेद 96 के तहत अध्यक्ष को अपना बचाव करने का भी अधिकार दिया गया है। 

आजाद भारत के इतिहास में ऐसे मौके बहुत कम आए हैं, जब लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया हो, लेकिन जब भी लाया गया तब विपक्ष ने संसदीय राजनीति को हिलाकर रख दिया। भारत के पहले लोकसभा स्पीकर जी.वी. मावलंकर के खिलाफ 18 दिसंबर 1954 को पहला अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था। इसे विग्नेश्वर मिश्रा और अन्य विपक्षी नेताओं ने पेश किया था। उस समय नेहरू युग था और विपक्ष का तर्क था कि स्पीकर सरकार के प्रभाव में काम कर रहे हैं। हालांकि, भारी बहस के बाद यह प्रस्ताव गिर गया और मावलंकर अपने पद पर बने रहे।

तीसरी लोकसभा के दौरान स्पीकर हुकुम सिंह पर भी पक्षपात के आरोप लगे। समाजवादी नेता मधु लिमये द्वारा ये प्रस्ताव लाया गया था। वह दौर राजनीतिक रूप से बहुत उथल-पुथल वाला था। विपक्ष ने उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठाए, लेकिन संख्या बल न होने के कारण यह प्रस्ताव भी सफल नहीं हो सका। आठवीं लोकसभा के दौरान बलराम जाखड़ के खिलाफ भी अविश्वास प्रस्ताव लाने की कोशिश हुई। इसे सीपीएम के सांसद सोमनाथ चटजी ने पेश किया था। उस समय बोफोर्स जैसे मुद्दों पर सदन में भारी गतिरोध था। लेकिन कांग्रेस के पास भारी बहुमत होने के कारण विपक्ष का यह प्रयास महज एक प्रतीकात्मक विरोध बनकर रह गया। अक्सर विपक्ष ऐसे प्रस्ताव केवल अपनी नाराजगी दर्ज कराने और जनता का ध्यान खींचने के लिए लाता है। स्पीकर हमेशा सत्ता पक्ष या गठबंधन का होता है जिसके पास बहुमत होता है। जब तक सरकार के पास नंबर हैं, स्पीकर को हटाना नामुमकिन जैसा है। 

- योगेन्द्र योगी

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