By सुखी भारती | Oct 19, 2021
हमने देखा कि श्रीहनुमान जी सागर पार करने हेतु ऐसी छलाँग लगाते हैं, कि उससे समस्त वानरों का उत्साह आसमाँ को छू जाता है। इस एक छलाँग ने, मानो प्रभु की सेवा में लगे प्रत्येक जीव की, मनोदशा ही बदल कर रख दी। हर वानर को यह विश्वास होने लगा था कि अब हमारा लक्ष्य दूर नहीं। सबसे बड़ी बात कि करोड़ों वानरों में एक भी वानर यह नहीं सोच रहा था, कि माता सीता जी के पास जाने का अवसर उन्हें पहले क्यों नहीं मिला। कारण कि माता सीता जी के पास जो भी वानर भेंट करके वापिस लौटेगा, वह मानो नभ में चमकते सितारों में से एक अकेला चमकता चाँद होगा। और ऐसा सम्मान पाने की चाह भला किसको न होगी। लेकिन एक भी वानर ऐसा नहीं था, जो श्रीहनुमान जी से मानसिक दुराव रखता हो। बस एक ही धुन है, कि कोई भी हो, कैसे भी हो, जैसे तैसे बस, श्रीसीता जी के पास पहुँचना चाहिए। सुंदर काण्ड की यही सुंदरता ही तो सुंदर काण्ड का सबसे सुंदर पक्ष है।
‘नाचु रे मन गुर कै आगै।
गुर कै भाणै नाचहि ता सुखु पावहि अंते तम भउ भागै।।’
श्रीराम वानरों के गुरु भी हैं, और भगवान भी। जिनके समक्ष, वानर ऐसा नाचे कि आज समस्त संसार उनके आगे नाचने में प्रसन्नता महसूस करते हैं। तभी तो श्रीहनुमान जी के समक्ष हम प्रत्येक मंगलवार को माथा टेकना नहीं भूलते। सूत्र सीधा-सा है, प्रभु के समक्ष एक बार दिल से नाचकर तो देखें, पूरा संसार आपके समक्ष नहीं नाचा, तो कह दीजिएगा। श्रीहनुमान जी का यह सौभाग्य था कि उन्होंने यह छलाँग लगा दी थी। और छलाँग लगाये अभी थोड़ी ही देर हुई थी, कि उनके समक्ष कोई आन खड़ा होता है-
‘जलनिधि रघुपति दूत बिचारी।
तैं मैनाक होहि श्रम हारी।।’
समुद्र ने देखा कि श्रीराम जी के परम दूत हमारे ऊपर से प्रस्थान कर रहे हैं, तो समुद्र ने तुरंत मैनाक पर्वत को आदेश दिया कि हे मैनाक पर्वत! बड़े ही सौभाग्य का विषय है, कि श्रीराम जी के महान दूत आज हमारे क्षेत्र से लाँघ रहे हैं। जाओ, और उन्हें विश्राम के लिए, अपनी सेवा प्रदान करो। स्वर्ण का वह पर्वत तत्काल ही श्रीहनुमान जी के मार्ग में सेवा हेतु उपस्थित हो जाता है। और विनय पूर्वक श्रीहनुमान जी से आराम करने हेतु निवेदन करता है। श्रीहनुमान जी मैनाक पर्वत का यह सुंदर निवेदन सुन ऐसा नहीं कहते, कि हे मैनाक पर्वत तुम इतना भी नहीं समझते, कि हम कौन-सी यात्रा पर निकले हैं। तुम्हारी हमारे रास्ते में आने की जुर्रत कैसे हुई? यह हम इसलिए कह रहे हैं, क्योंकि जैसी छलाँग श्रीहनुमान जी ने लगाई है, वैसी छलाँग लगाने के बाद तो किसी भी व्यक्ति की चाल ढाल ही बदल जाती है। कारण कि उसमें मद का संचार हो जाता है। लेकिन श्रीहनुमान जी ने यहां कैसा सुंदर समन्वय बनाया। उन्होंने मैनाक पर्वत के आग्रह का किसी भी प्रकार से कोई तिरस्कार नहीं किया। अपितु मैनाक पर्वत पर जाकर अपने चरण टिकाकर वापिस लौट आये। और कहा कि हे मैनाक पर्वत आपका आग्रह निःसंदेह सम्मानीय व मन को मोह लेने वाला है। लेकिन बात यह है, कि जब तक मैं श्रीराम काज न कर लूं, तब तक आराम मेरे लिए हराम है-
‘हनुमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम।।’
श्रीहनुमान जी के इन शब्दों के और भी आध्यात्मिक मायने हैं। जिन्हें हम जानेंगे अगले अंक में...(क्रमशः)...जय श्रीराम...!
-सुखी भारती