सामाजिक समरसता के प्रतीक भगवान श्रीराम

By मृत्युंजय दीक्षित | Mar 25, 2026

भारत विविधतापूर्ण भाषा संस्कृति वाला देश है। देश को एक सूत्र में पिरोकर रखने के लिए ऐसे नेतृत्व की सदैव आवश्यकता रही है जो समस्त विविधताओं में समन्वय स्थापित कर सामाजिक व्यवस्था में समरसता बनाए रख सके। इस दृष्टि से मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम सामाजिक समरसता के अग्रदूत हैं। हमारे वेद तथा धर्मशास्त्रों में धर्म के स्वरूप व आचार-विचार की विवेचना तो है किन्तु सामाजिक जीवन में उसको व्यवहार में कैसे लाया जाये, इसका आदर्श उदाहरण भगवान श्रीराम के जीवन चरित्र में ही दृष्टिगोचर होता है। समस्त लौकिक व अलौकिक गुणों का जो समावेश भगवान श्रीराम के जीवन में स्पष्ट होता है वह अन्यत्र दुर्लभ है। एक साधारण मनुष्य के रूप में समस्त सामाजिक, नैतिक और राजनैतिक मर्यादाओं का जैसा पालन श्रीराम ने किया है वैसा कोई अन्य उदाहरण विश्व साहित्य में भी उपलब्ध नहीं है। 

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ये भगवान श्रीराम ही थे जिन्होंने राज्याभिषेक के समय माता कैकेयी द्वारा चौदह वर्ष के वनवास के आदेश को न केवल सहर्ष स्वीकार किया अपितु माता कैकेयी के प्रति भी उनके मन में किंचित भी क्रोध, द्वेष या प्रतिकार की भावना उत्पन्न नहीं हुई। वे माता कौशल्या की भांति ही कैकेयी के प्रति भी आदर का भाव रखते रहे। अनुज लक्ष्मण जब कैकेयी की निंदा करते हैं तो वे तुरंत लक्ष्मण को रोकते हैं। साथ ही भाई भरत व शत्रुघ्न के प्रति लक्ष्मण के मन का संशय भी दूर करते हैं। अनुज भरत व शत्रुघ्न जब वनवास के लिए मन्थरा व कैकेयी के प्रति अपना क्रोध प्रकट करते हैं तब श्रीराम उन्हें भी शांत करते हैं। परिवार में समरसता स्थापित करने का ऐसा कोई उदाहरण नहीं है। 

श्रीराम ने वनवासी जीवन में उत्तर से दक्षिण तक विभिन्न जातियों व वर्गो के मध्य परस्पर प्रेम व विश्वास की भावना का संचार किया। निषादराज गुह के यहां रुक कर और उन्हें गले लगाकर भगवान श्रीराम ने सामाजिक समरसता का संदेश दिया। शबरी के झूठे बेर खाकर प्रेम व स्नेह का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। समाज के पिछड़े, दलित, वंचित लोग भी सम्मानपूर्ण जीवन के अधिकारी हैं इस शिक्षा के लिए श्रीराम का जीवन आदर्श है। इसी प्रकार केवट को पारिश्रमिक देने की बात भी अत्यंत महत्वपूर्ण है बिना पारिश्रमिक दिए किसी श्रमिक से कार्य करवाना भी अन्याय है, निर्धनों का शोषण है। गुणवान होने के साथ ही भगवान श्रीराम धर्म व अर्थ तत्व को भी जानते हैं। 

सामाजिक समरसता की स्थापना के लिए भगवान श्रीराम ने सदा न्याय का साथ दिया और अन्याय के विरुद्ध खड़े हुये। इसका सुंदर उदारहण बालि वध का प्रसंग है। बालि ने जब धर्म की दुहाई देते हुए श्रीरामजी के कार्य को अन्याय बताया तो उन्होंने उसकी बात का खण्डन करते हुए कहा कि -”बालि तुम्हें तुम्हारे पाप का ही दण्ड मिला है।तुमने अपने छोटे भाई की स्त्री को जो तुम्हारी कन्या के समान है बलपर्वूक रख लिया हैअतः तुम्हें दण्ड  देकर मैने राजधर्म, मित्रधर्म एवं प्रतिज्ञा का पालन किया है।“ 

अपने इन्हीं गुणों के कारण भगवान श्रीराम रीछ, भालू और वानरों की सेना संगठित करने में सफल हुए। इतना ही नहीं उन्होनें अपने शरणागत रक्षा धर्म का पालन करते हुए रावण को छोड़कर आए उसके लधुभ्राता विभीषण को अपनाने में एक क्षण भी नहीं लगाया। इसके साथ ही भगवान श्रीराम कृतज्ञ हैं। मन पर नियंत्रण होने के कारण वे दूसरों के द्वारा किये गये अपराधों को भी भुला देते हैं किन्तु यदि कोई किसी प्रकार एक बार भी उपकार कर देता है तो उसी से वे संतुष्ट रहते हैं और उसको याद रखते हैं। राज्याभिषेक के बाद हनुमान जी को विदा करते हुए कहते हैं-“ हे कपिश्रेष्ठ! मुझ पर तुम्हारे ऐसे उपकार हैं कि उनमें एक- एक के बदले अपने प्राण तक दे सकता हूं। फिर भी शेष उपकारों के लिए मुझे तुम्हारा ऋणी बनकर ही रहना होगा। कपिवर तुमने जो भी उपकार किए हैं वे सब मेरे शरीर में ही विलीन हो जाएं अर्थात तुम पर कभी कोई विपत्ति आए ही नहीं। मनुष्य विपत्तियों में पड़ने पर ही प्रत्युपकार का पात्र बनता है।” 

सामाजिक समन्वय स्थापित करते हुए श्रीरामचन्द्र जी ने राजधर्म का निर्वहन जिस परिपक्वता से किया उसके कारण ही रामराज्य आज की एक आदर्श राज्य संकल्पना है, जिसमें प्रजा में शारीरिक तथा भौतिक किसी भी प्रकार को कोई कष्ट नहीं थे। सदभाव, सद्विचार तथा सद्भावना और परमार्थ ही परम लक्ष्य होने के कारण प्रजा में परस्पर प्रेम व स्नेह था। छोटे- बड़े ऊँच-नीच का भेदभाव नहीं था। आर्थिक विषमता नहीं थी। चोरी, डकैती और दुराचार  जैसे जघन्य अपराध नहीं होते थे।अतः प्रजा सभी प्रकार से सुख का अनुभव करती हुई धर्माचरण में निमग्न थी। इसलिए मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम आज भी जन-जन के नायक व आराध्य है। जिनके चरणों में भक्त अपना तन-मन-धन समर्पित करके इहलोक और परलोक को सफल बनाते हैं। भगवान श्रीराम ही नहीं अपितु पूरे श्रीराम दरबार के सभी सदस्य मर्यादा और अनुशासन का अनुपम उदाहरण हैं। भगवान श्रीराम के जीवन को यदि आज का युवा आदर्श मान कर चले तो आज भी रामराज  स्थापित होने में कतई देर नहीं लगेगी आवश्यकता है भगवान श्रीराम के जीवन के आदर्शों को आधुनिक शैली में अपनाने की।

भगवान श्रीराम की कृपा से अयोध्या में अब उनके जन्मस्थान पर दिव्य व भव्य राम मंदिर बनकर तैयार हो चुका है तथा लाखों की संख्या में रामभक्त श्रद्धालु अयोध्या पहुंचकर भाव विभोर हो रहे हैं। अयोध्या में राम मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह मंदिर भी सामाजिक समरसता का एक बहुत बड़ा सन्देश दे रहा हे। अयोध्या की धरती पर  माता शबरी का भी मंदिर है, महर्षि वाल्मीकि, वशिष्ठ जी महर्षि वेद व्यास सहित संत रविदास जी का मंदिर भी बन चुका है। इन सभी संत पुरुषों के मंदिरों के दर्शन करके मन में सामाजिक समरसता का भाव जाग्रत होना स्वाभविक ही है।  

- मृत्युंजय दीक्षित

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