पर्यावरण संरक्षण की सिर्फ बातें ही करते हैं हम, धरातल पर बहुत कुछ किया जाना बाकी है

By डॉ. प्रभात कुमार सिंघल | Jun 05, 2019

प्रकृति प्रदत्त नदियों का बहता कलछल जल, खूबसूरत झरने, हरे भरे पहाड़, रमणीक उद्यान, हरी भरी वृक्षों से आच्छादित लुभावनी वादियां, पर्वतीय क्षेत्रों का सौन्दर्य, पहाड़ों पर बर्फ का आनंद, गर्मी के मौसम में पर्वतीय स्थलों की सैर, हरे भरे जंगल, अभ्यारणयों में कुलांचे भरते हिरण, बारहसिंघा, उछल−कूद करते बन्दरों की अठखेलियां, विचरण करते शेर, पक्षियों का कलरव, नृत्य करते मयूर, कोयल की मीठी कूक, रंगबिरंगे, समुद्र की लहरें, बरसात की रिमझिम फुंवार, सावन की घटा, भला किसका मन नहीं मोह लेंगे। प्रकृति का यह सुन्दर उपहार मानव जीवन को सहज, सरल और आनंदमय बनाता है।

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पर्यावरण के इन घटकों की चर्चा करें तो हम देखते हैं कि पुराने समय से ही नदियों के किनारे सभ्यताओं का विकास हुआ। गंगा एवं यमुना आदि नदियों को सदैव से पवित्र मानकर देवी स्वरूप इनकी पूजा का विधान अविरल चल रहा है। हमारी ये पावन नदियां आज हमारे ही कारण प्रदूषित हो रही हैं। हम हैं कि मानते ही नहीं और मनुष्य के अंतिम संस्कार की रस्मों, गंदा कचरा फेंककर, नालों को नदियों में छोड़कर इन्हें आये दिन प्रदूषित करने पर लगे हैं। कई नदियां तो नक्शे से ही गायब हो गई हैं और कुछ नदियों का मार्ग संकरा हो गया हैं। 

हिमालय पर ग्लेशियर बढ़ते हुए तापमान से पिघल रहे हैं। कुछ ग्लेशियरों ने अपना स्थान बदल लिया है। ग्लेशियरों के पिघलने से सारा पानी नदियों में आता है और नदी का जीवन बनता है। यदि तापमान यूं ही बढ़ता रहा और ग्लेशियरों का अस्तित्व समाप्त हो गया तो नदियां कहां से बचेंगी। यहां हमें पानी के साथ−साथ प्रकृति के अग्नि तत्व का प्रकोप बढ़ते हुए तापमान के रूप में नजर आता है। तापमान बढ़ने का असर हमारे प्रकृति और मौसम चक्र पर पड़ा है। बरसात होने के दिनों में कमी आई है। इस पर भी हम वर्षा जल संरक्षण के प्रति उदासीनता बरत रहे हैं। परम्परागत जल स्त्रोतों बावड़ियों व तालाबों आदि के संरक्षण की भी दरकार है। पानी की कमी का असर मनुष्यों पर ही नहीं वरन् वनों में रहने वाले पशु−पक्षियों पर भी पड़ा है। पहले जब बरसात खूब होती थी तो वर्ष भर इन्हें पानी की कमी नहीं रहती थी। अब तो कई बार हालात ऐसे हो जाते हैं कि पशु−पक्षियों के लिए पीने के पानी की व्यवस्था सरकार को करनी पड़ती है। सरकार ने जल संरक्षण की मुहिम चला रखी है परन्तु हर व्यक्ति को जागरूक होकर अपने स्तर पर इस दिशा में आगे आने होगा। 

पृथ्वी के तत्वों के संयोजन को बनाये रखने के लिए एक मात्र उपाय है कटते हुए वनों को बचाया जाये और अधिक से अधिक वृक्षारोपण के लिए लोग आगे आयें। मनुष्य ने अपनी जरूरत के लिए वृक्षों की अन्धाधुन्ध कटाई की। जंगल खाली होने लगे और पशु−पक्षियों के लिए भी संकट पैदा कर दिया। वृक्षों का ही अभाव है कि आये दिन पर्वतों की चट्टानें खिसकने और गिरने की घटनायें सामने आती हैं। पृथ्वी के गर्भ में छिपे हीरे, सोना, चांदी, पीतल, लोहा, नग, विभिन्न प्रकार की खनिज सम्पदा, पत्थर आदि का बड़े पैमाने पर किया गया दोहन पृथ्वी के तत्वों के असंतुलन का बड़ा कारण बन गया है। इसी प्रकार खेती में अधिक पेस्टेसाइट डालकर व आवश्यकता से अधिक पानी डालकर जमीन का स्वास्थ्य खराब कर रहे हैं और इससे वांछित उपज भी नहीं मिल रही है। हमें जल के साथ−साथ अपनी पृथ्वी को भी बचाना होगा।

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मानव जीवन, जीवनदायनी ऑक्सीजन पर निर्भर है। प्रकृति में ऑक्सीजन पैदा करने की एक मात्र फैक्ट्री है हमारे वृक्ष। वातावरण में ऑक्सीजन की कमी हो रही है तथा कार्बनडाइक्साइड एवं अन्य जहरीली गैसें बढ़ रही हैं। एसी एवं कूलर के बढ़ते उपयोग, धुआं छोड़ते वाहन, कारखानों से निकलता धुआं और विषैली गैसें ऐसे प्रमुख कारण हैं जो वायु को प्रदूषित कर रहे हैं। प्रदूषण से वायु को बचाने के लिए एक मात्र रास्ता है अधिक से अधिक वृक्ष लगाये जायें। कारखानों में प्रदूषण रोकने के संयंत्र लगे तथा धुआं फेंकने वाले वाहनों को बंद किया जाये। 

जीवन तत्व आकाश में तापमान निरंतर बढ़ रहा है और पृथ्वी के कुछ ऊपर तक ही सांस लेने योग्य हवा उपलब्ध है। जैसे−जैसे ऊपर की ओर जाते हैं ऑक्सीजन की मात्रा कम होती जाती है। हमें इस संतुलन को भी बनाये रखना होगा।

विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर सभी को अपने आस−पास का पर्यावरण बचाने व स्वच्छ रखने का संकल्प लेना होगा। हमारा पानी प्रदूषित नहीं हो, वायु शुद्ध रहे, अधिक से अधिक पेड़ लगायें, नदियों को प्रदूषित होने से रोकें, वर्षा जल के समुचित संरक्षण के उपाय हों, जंगल कटने से बचें तथा हम स्वयं भी अच्छे पर्यावरण का निर्माण करें एवं भावी पीढ़ी को भी इसके प्रति साचेत एवं जागरूक करें।

-डॉ. प्रभात कुमार सिंघल

(लेखक एवं पत्रकार, कोटा)

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