By एकता | Feb 10, 2026
सभी को प्यार आसानी से नहीं मिलता। कुछ लोगों को प्यार पाने के लिए जिंदगी भर कभी खुद से, कभी किस्मत से और कभी परिवार से लड़ना पड़ता है। और अगर आप और आपका पार्टनर एक-दूसरे से सच्चा प्यार करते हैं, फिर भी दिल के किसी कोने में यह डर है कि परिवार आपकी लव मैरिज को मंजूरी नहीं देगा तो यह फरवरी आपके लिए खास सरप्राइज लेकर आया है।
वैलेंटाइन डे के ठीक अगले दिन महाशिवरात्रि आती है और महादेव के भक्त इसकी अहमियत अच्छी तरह जानते हैं। तो इस महाशिवरात्रि अपने पार्टनर के साथ उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जाएं और त्रियुगीनारायण मंदिर के दर्शन करें। यह न सिर्फ भारत के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक है, बल्कि वही पवित्र स्थान भी है जहां स्वयं महादेव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। और अगर आपको उनकी शादी की कहानी पता है, तो आप समझ जाएंगे कि हम आपको इस मंदिर में जाने की सलाह क्यों दे रहे हैं।
उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित त्रियुगीनारायण मंदिर एक बहुत पुराना और पवित्र मंदिर है। यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है, लेकिन इसे खास तौर पर भगवान शिव और माता पार्वती की शादी की जगह के रूप में जाना जाता है। कहा जाता है कि इसी स्थान पर उनका विवाह हुआ था, जिसमें भगवान विष्णु ने माता पार्वती के भाई की भूमिका निभाई थी और भगवान ब्रह्मा ने विवाह संपन्न कराया था।
उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित त्रियुगीनारायण मंदिर एक बहुत पुराना और पवित्र मंदिर है। यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है, लेकिन इसे खास तौर पर भगवान शिव और माता पार्वती की शादी की जगह के रूप में जाना जाता है।
हिमालय की पहाड़ियों में, करीब 6,000 फीट की ऊंचाई पर बने इस मंदिर में एक आग हमेशा जलती रहती है, जिसे अखंड धूनी कहा जाता है। मान्यता है कि यह वही आग है जो शिव-पार्वती की शादी के समय जलाई गई थी और तब से आज तक जल रही है। आज भी भक्त लकड़ी डालते हैं। मान्यता है कि इस आग के दर्शन करने से शादीशुदा जीवन में प्यार और समझ बनी रहती है।
मंदिर के पास तीन पवित्र कुंड रुद्र कुंड, विष्णु कुंड और ब्रह्मा कुंड हैं, कहा जाता है कि शादी से पहले देवताओं ने इन्हीं कुंडों में स्नान किया था। आज भी कई कपल्स इस मंदिर को शादी के लिए चुनते हैं और इसे हमेशा साथ निभाने वाली शादी की पवित्र जगह मानते हैं।
त्रियुगीनारायण मंदिर उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले के त्रियुगीनारायण गांव में स्थित है। यह जगह सोनप्रयाग से लगभग 12 किलोमीटर दूर है। यहां सड़क के जरिए पहुंचा जा सकता है, लेकिन सोनप्रयाग से आगे का रास्ता थोड़ा चढ़ाई वाला है और जंगलों के बीच से होकर जाता है। मंदिर पूरे साल खुला रहता है, लेकिन यहां आने का सबसे अच्छा समय फरवरी से नवंबर के बीच होता है, जब मौसम ठीक रहता है। गांव में रुकने के लिए होमस्टे और लॉज जैसी साधारण सुविधाएं मौजूद हैं।