By एकता | Nov 05, 2026
देशभर में दिवाली का त्योहार बड़े ही उत्साह के साथ मनाया जाता है। आम तौर पर इस दिन हर घर में माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा होती है, लेकिन पश्चिम बंगाल में दिवाली की रात का नजारा बिल्कुल अलग होता है। बंगाल में दिवाली पर मां काली की पूजा होती है। ऐसे में अगर आप दिवाली पर कुछ नया एक्सपीरियंस लेना चाहते हैं तो बंगाल जाने का प्लान बना सकते हैं।
पूरे बंगाल में दिवाली को 'काली पूजा' या 'श्यामा पूजा' के तौर पर मनाया जाता है। कार्तिक महीने की अमावस्या की रात यहां माता लक्ष्मी की जगह मां काली की आराधना की जाती है। शहर भर में भव्य पंडाल सजते हैं और आधी रात को खास पूजा का आयोजन होता है। आइए जानते हैं कि बंगाल में दिवाली की रात मां काली की पूजा क्यों की जाती है और इसके पीछे की क्या मान्यता है।
पश्चिम बंगाल में दिवाली की रात मां काली की पूजा करने की परंपरा सदियों पुरानी है। इसे 'श्यामा पूजा' भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कार्तिक महीने की अमावस्या की रात ही मां काली ने विकराल रूप लेकर राक्षस रक्तबीज और अन्य दुष्टों का खात्मा किया था। बुराई पर अच्छाई की इस जीत और संसार की रक्षा के प्रतीक के रूप में इस रात मां काली की पूजा की जाती है।
बंगाल की संस्कृति में नारी शक्ति और मां काली के प्रति गहरा आदर और विश्वास है। उन्हें डर को दूर करने वाली और सभी मुश्किलों से बचाने वाली देवी माना जाता है। मान्यता है कि इस रात पूरी श्रद्धा से मां काली की पूजा करने से नेगेटिव एनर्जी खत्म होती है और जीवन की परेशानियां दूर होती हैं। दिवाली की रात लोग पंडालों में दर्शन के लिए उमड़ते हैं और देर रात तक विशेष अनुष्ठान चलते हैं।
काली पूजा के मौके पर मां काली की नई प्रतिमा स्थापित की जाती है। इस पूजा का मुख्य आकर्षण आधी रात को होने वाली विशेष आरती होती है। पूजा के दौरान मां की मूर्ति के सामने 'अखंड दीपक' जलाया जाता है, यानी ऐसा दीपक जो पूरी पूजा के दौरान बिना बुझे लगातार जलता रहता है। लोग दीप जलाकर मां से सुख, शांति और सुरक्षा का आशीर्वाद मांगते हैं।