By नीरज कुमार दुबे | Jan 06, 2026
मद्रास हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में तिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी के दीपथून पर कार्तिगई दीपम जलाने की अनुमति को बरकरार रखा है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह परंपरा सदियों पुरानी है और इसे रोकने का कोई संवैधानिक या कानूनी आधार नहीं है। अदालत ने साथ ही राज्य सरकार द्वारा कानून व्यवस्था के नाम पर लगाए गए प्रतिबंधों को निराधार और कल्पनाजन्य करार दिया। न्यायालय ने कहा कि जिस स्थान पर दीपम जलाया जाता है वह मंदिर से जुड़ी पारंपरिक धार्मिक व्यवस्था का हिस्सा रहा है। केवल आशंका के आधार पर किसी धार्मिक परंपरा को रोका नहीं जा सकता। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि धार्मिक स्वतंत्रता केवल निजी पूजा तक सीमित नहीं है बल्कि सामूहिक और सार्वजनिक धार्मिक अभिव्यक्तियां भी इसके अंतर्गत आती हैं।
हम आपको बता दें कि इस मामले में राज्य सरकार ने दलील दी थी कि दीपम जलाने से सामाजिक तनाव और कानून व्यवस्था की समस्या उत्पन्न हो सकती है। कोर्ट ने इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि प्रशासन का दायित्व भय पैदा करना नहीं बल्कि निष्पक्ष और साहसिक ढंग से कानून व्यवस्था बनाए रखना है। अदालत ने यह भी कहा कि यदि हर परंपरा को संभावित विवाद के नाम पर रोक दिया जाए तो संविधान में प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता केवल कागज पर रह जाएगी।
हम आपको बता दें कि याचिकाकर्ताओं की ओर से यह तर्क रखा गया था कि कार्तिगई दीपम केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। इसे रोकने का प्रयास समाज में अनावश्यक विभाजन और असंतोष को जन्म देता है। कोर्ट ने इस तर्क से सहमति जताई और आदेश दिया कि परंपरागत रीति से दीपम जलाने की अनुमति दी जाए।
देखा जाये तो मद्रास हाईकोर्ट का यह निर्णय उस मानसिकता पर करारा प्रहार है जो हर हिंदू परंपरा को कानून व्यवस्था के नाम पर कटघरे में खड़ा करने की आदी हो चुकी है। आज सवाल यह नहीं है कि दीपम जलेगा या नहीं। सवाल यह है कि क्या बहुसंख्यक समाज की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को हर बार डर और शक के चश्मे से देखा जाएगा? तमिलनाडु की द्रमुक सरकार का तर्क कि दीपम जलाने से अशांति फैल सकती है, दरअसल प्रशासनिक असफलता को छिपाने का तरीका है। अगर हर धार्मिक आयोजन से पहले सरकार को डर लगने लगे तो फिर शासन चलाने का नैतिक अधिकार किस बात का रह जाता है? अदालत ने ठीक ही कहा कि कल्पित भय के आधार पर मौलिक अधिकारों को कुचला नहीं जा सकता।
देखा जाये तो यह मामला उस व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा है जहां हिंदू धार्मिक परंपराओं को बार बार रोकने और सीमित करने का प्रयास किया जाता है। कभी शोर का बहाना बनाया जाता है, कभी पर्यावरण का तो कभी कानून व्यवस्था का। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से यही तर्क अन्य समुदायों के मामलों में अचानक गायब हो जाते हैं। यह दोहरा मापदंड समाज में असंतोष और अविश्वास को जन्म देता है।
कार्तिगई दीपम का सामाजिक महत्व केवल आस्था तक सीमित नहीं है। यह पर्व सामूहिकता का प्रतीक है। पहाड़ी पर जलता दीप दूर दूर तक दिखाई देता है और समाज को जोड़ने का काम करता है। जब ऐसी परंपराओं को रोका जाता है तो संदेश जाता है कि बहुसंख्यक समाज की भावनाएं गौण हैं। यही भावना धीरे धीरे आक्रोश में बदलती है और फिर वही आक्रोश सामाजिक तनाव का रूप ले लेता है।
इस फैसले का सबसे बड़ा सामाजिक प्रभाव यह है कि लोगों का यह विश्वास और प्रबल हुआ है कि न्यायपालिका संविधान की आत्मा को समझती है। अदालत के आदेश ने यह स्पष्ट कर दिया कि धर्मनिरपेक्षता का अर्थ यह नहीं है कि राज्य केवल एक धर्म के प्रति कठोर हो जाए और बाकी के प्रति नरम। सच्ची धर्मनिरपेक्षता सभी परंपराओं के साथ समान व्यवहार की मांग करती है। यह निर्णय प्रशासन के लिए भी चेतावनी है। उसे समझना होगा कि परंपराओं को दबाने से शांति नहीं आती बल्कि असंतोष भीतर ही भीतर सुलगता रहता है।
बहरहाल, अगर आज अदालत ने दीपम जलाने के अधिकार की रक्षा नहीं की होती तो कल कोई और परंपरा इसी तरह प्रतिबंधों की भेंट चढ़ जाती। वैसे यह फैसला केवल एक धार्मिक जीत नहीं है। यह सांस्कृतिक आत्मसम्मान की पुनर्स्थापना है। यह संदेश है कि डर के नाम पर अधिकार छीने नहीं जा सकते। यह आदेश यह भी संदेश देता है कि अगर समाज चुप रहा तो उसकी परंपराएं एक एक कर खत्म कर दी जाएंगी। दीप तो अब जल जायेगा लेकिन समाज की चेतना की लौ भी जलती रहनी चाहिए क्योंकि संभव है राह में रोड़े अटकाने वाले दूसरा प्रतिबंध लगाने के लिए तैयार बैठे हों।
-नीरज कुमार दुबे