पराक्रम और शौर्य से महाराणा प्रताप ने मुगलों के होश उड़ा दिए थे

By अमृता गोस्वामी | May 09, 2020

भारत की भूमि पर ऐसे अनेक वीर सपूतों ने जन्म लिया जो भारत की स्वाधीनता के लिए अपने प्राण तक न्योछावर करने में पीछे नहीं हटे। भारत के एक ऐसे ही वीर सपूत महान योद्धा थे मेवाड़ नरेश महाराणा प्रताप। भारत के इतिहास में महाराणा प्रताप का नाम अमिट है।

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महाराणा प्रताप के समय में दिल्ली में मुगल सम्राट अकबर का शासन था। अकबर भारत के सभी राजा-महाराजाओं को अपने अधीन कर स्वयं की सत्ता स्थापित करना चाहता था। अकबर और उसकी विशाल सेना के सामने कई राजपूत राजा-महाराजा घुटने टेक चुके थे।

महाराणा उदयसिंह ने अपनी मृत्यु से पहले हालांकि अपने छोटे पुत्र को मेवाड़ की गद्दी सौंप दी थी किन्तु राज्य में लोगों ने यह स्वीकार नहीं किया और उदयसिंह की मृत्यु के बाद महाराणा प्रताप को मेवाड़ की गद्दी पर बैठाया गया। 

महाराणा प्रताप के गद्दी सम्भालने से पहले ही मेवाड़ की राजधानी चित्तौड़ पर मुगलों का कब्जा हो चुका था। गद्दी संभालते ही राणा प्रताप ने मुगलों से संघर्ष की तैयारी शुरू कर दी। राणा प्रताप ने ऐलान किया कि जब तक उनका चित्तौड़ पर दोबारा कब्जा नहीं हो जाता वो सोने और चांदी की थाली का इस्तेमाल नहीं करेंगे और पलंग की जगह जमीन पर घास पर सोएंगे। सामन्तों की सलाह पर राणा प्रताप ने उदयपुर छोड़कर कुम्भलगढ़ और गोगुंदा की पहाड़ियों को अपना केन्द्र बनाया। सामन्तों का मानना था उदयपुर में यवन, तुर्क आसानी से आक्रमण कर सकते हैं।

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मेवाड़ में रहकर महाराणा प्रताप ने चित्तौड़ के बाहर अकबर की सेनाओं के लिए काफी दिक्कतें खड़ी कर दी थीं। 1576 में अकबर ने मेवाड़ जीतने के लिए महाराणा प्रताप से लड़ाई का फैसला किया। कई छोटे-मोटे युद्धों के बाद जून, 1576 को मुगल बादशाह अकबर और महाराणा प्रताप के बीच एक भयंकर युद्ध लड़ा गया जिसने अकबर और उसकी सेना को हिला कर रख दिया। यह युद्ध था हल्दीघाटी का ऐतिहासिक युद्ध जिसमें महाराणा प्रताप का शौर्य और पराक्रम देखते ही बनता था। यह अत्यंत विनाशकारी युद्ध था इस युद्ध के अंत तक भी कोई हार मानने को तैयार नहीं था और कहा जाता है कि यह युद्ध अनिर्णीत ही रहा। इस युद्ध की दास्तान रोंगटे खड़े करने वाली है। 

हल्दी घाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप के पास सैनिकों की संख्या जहां सिर्फ 20000 थी वहीं अकबर के पास 80000 से भी अधिक सैनिक थे किन्तु फिर भी महाराणा प्रताप सहित उनके सैनिकों का साहस और हौसला देखते बनता था। महाराणा प्रताप युद्ध में 81 किलो वजनी भाला, 72 किलो वजनी कवच, ढाल और दो तलवारें लेकर जाते थे। महाराणा प्रताप का शौर्य और पराक्रम देखकर स्वयं अकबर भी अचंभित था। अकबर ने कई बार कई योजनाओं के साथ महाराणा प्रताप के पास युद्ध को समाप्त करने के लिए शांति दूत के साथ कई प्रस्ताव भी भेजे किन्तु महाराणा प्रताप ने सभी प्रस्ताव अस्वीकार कर अपनी धरती की पूर्ण स्वतंत्रता की मांग को लेकर मरते दम तक संघर्ष किया। 

हल्दी घाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप और उनके सैनिकों की वीरता और अदम्य साहस की कहानी तो ऐतिहासिक है ही इसके साथ ही इतिहास के पन्नों पर देखा जा सकता है महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक की स्वामी भक्ति और बहादुरी को भी, जो इस युद्ध का अहम हिस्सा रही है।  

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चेतक महाराणा प्रताप का सबसे प्रिय घोड़ा था जो बहुत ही बहादुर था। महाराणा प्रताप अपने घोड़े को अपने बेटे की तरह प्यार करते थे। उन्होंने घोड़े को युद्ध के सारे कौशल सिखा दिए थे। हल्दीघाटी के युद्ध में जब महाराणा प्रताप और स्वयं चेतक बुरी तरह से घायल हो गए थे तो चेतक ने वीरता दिखाते हुए  महाराणा प्रताप को अपनी पीठ पर बैठाकर कई फीट लंबे नाले को लांघकर मुगलों को पीछे छोड़ दिया था। इस घटना के बाद गंभीर रूप से जख्मी होने की वजह से हालांकि चेतक की मृत्यु हो गई थी। चेतक की मृत्यु से महाराणा प्रताप काफी उदास हो गए थे यहां तक की उन्होंने अपने महल को त्याग कर जंगलों में रहने का निश्चय किया। उन्होंने कई वर्षो तक मेवाड़ के जंगलों में जीवन बिताया। इस बीच अकबर ने काफी प्रयास किया किन्तु वह महाराणा प्रताप को ढूंढकर बंदी नहीं बना पाया।

कहा जाता है कि जंगलों में रहकर तैयारी कर महाराणा प्रताप ने मुगलों के कब्जे वाली अपनी काफी भूमि वापस जीत ली थी। 1596 में महाराणा प्रताप को शिकार खेलते समय चोट लगी जिससे वे उबर नहीं पाए और 19 जनवरी 1597 को 57 वर्ष की उम्र में चावड़ में उनका देहांत हो गया।

अमृता गोस्वामी

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