Jammu-Kashmir से आईं ये खबरें चिंता बढ़ाने वाली हैं! घुसपैठ, अवैध संचार नेटवर्क और ISI की नई साजिशों का खुलासा, सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट

By नीरज कुमार दुबे | Jun 01, 2026

जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा एजेंसियों की सतर्कता के बीच सीमा पार से घुसपैठ, अवैध संचार नेटवर्क और आतंकी तंत्र को पुनर्जीवित करने की कोशिशों से जुड़े कई महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आए हैं। सुरक्षा अधिकारियों के अनुसार, पाकिस्तान समर्थित तत्वों की गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जा रही है और हाल के अभियानों में कई महत्वपूर्ण जानकारियां तथा सफलताएं हासिल हुई हैं। हम आपको बता दें कि बारामूला जिले के उरी सेक्टर में सेना और पुलिस ने संयुक्त अभियान चलाकर तीन लोगों को पकड़ा है जो कथित रूप से पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर की ओर जाने की कोशिश कर रहे थे। खुफिया सूचना के आधार पर चलाए गए इस अभियान में सोपोर के दो व्यक्तियों और उनके एक सहयोगी गाइड को हिरासत में लिया गया। अधिकारियों ने उनकी पहचान आदिल हुसैन, इशफाक लोन और जाफर हाफिज के रूप में की है। सुरक्षा एजेंसियां मामले की विस्तृत जांच कर रही हैं और यह पता लगाने का प्रयास कर रही हैं कि उनके इरादे और संपर्क किस प्रकार के थे।

इसी बीच अधिकारियों ने एक गंभीर सुरक्षा चुनौती की ओर भी ध्यान आकर्षित किया है। उन्होंने कहा है कि पाकिस्तान सीमा पार से गैरजरूरी और अवैध दूरसंचार संकेत भेजकर अंतरराष्ट्रीय मानदंडों का उल्लंघन कर रहा है। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि इन संकेतों का उद्देश्य जम्मू-कश्मीर, विशेषकर जम्मू क्षेत्र में सक्रिय आतंकी समूहों को गुप्त संचार सुविधा उपलब्ध कराना है। अधिकारियों का कहना है कि नियंत्रण रेखा के निकट पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में दूरसंचार टावरों की संख्या में वृद्धि हुई है, जिनके संकेत भारतीय सीमा के भीतर कई संवेदनशील क्षेत्रों तक पहुंच रहे हैं।

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जानकारी के अनुसार कठुआ, राजौरी, पुंछ तथा अत्यधिक संवेदनशील कोट बलवाल जेल क्षेत्र में ऐसे संकेतों की पहचान की गई है। अधिकारियों का कहना है कि कुछ जेलों में अवैध रूप से पहुंचाए गए मोबाइल उपकरणों के जरिये इन संकेतों का दुरुपयोग होने की आशंका है। वर्तमान में लगाए गए पारंपरिक जैमर इन संकेतों को प्रभावी ढंग से रोकने में सक्षम नहीं हैं। इसी कारण सुरक्षा एजेंसियां अगली पीढ़ी की तकनीक अपनाने पर जोर दे रही हैं, जो अनधिकृत उपकरणों का पता लगाकर उन्हें निष्क्रिय कर सके।

सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार पाकिस्तान की ओर से स्थापित ये संचार तंत्र आतंकियों को सीमा पार बैठे संचालकों से जोड़े रखने में मदद कर सकते हैं। अधिकारियों ने बताया कि अतीत में भी सुरक्षा एजेंसियों ने ऐसे कई अवैध नेटवर्कों को ध्वस्त किया था और वर्तमान प्रयासों को भी विफल करने के लिए कार्रवाई जारी है। उनका यह भी कहना है कि इस प्रकार के संकेत अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार नियमों और वैश्विक मानकों का उल्लंघन करते हैं।

दूसरी ओर, सुरक्षा एजेंसियों ने पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई की कथित नई रणनीति को लेकर भी चिंता व्यक्त की है। अधिकारियों के अनुसार आईएसआई अपने पुराने ओवर ग्राउंड वर्कर नेटवर्क को मुख्यधारा की राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टियों में शामिल होने के लिए प्रेरित कर रही है, ताकि सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाई और जांच से बचा जा सके। हाल में गिरफ्तार कुछ आतंकी समर्थकों से पूछताछ के दौरान ऐसे संकेत मिले हैं कि उनमें से कुछ का संबंध मुख्यधारा की राजनीतिक गतिविधियों से भी रहा है।

अधिकारियों का मानना है कि यह रणनीति आईएसआई की बदलती परिस्थितियों के प्रति प्रतिक्रिया है। लगातार सुरक्षा अभियानों और आतंक विरोधी कार्रवाइयों के कारण उसका पारंपरिक नेटवर्क कमजोर हुआ है और स्थानीय स्तर पर समर्थन भी घटा है। ऐसे में वह राजनीतिक ढांचे में घुसपैठ कर अपने समर्थकों को संरक्षण देने तथा नई पीढ़ी को प्रभावित करने की कोशिश कर रही है।

अधिकारियों के अनुसार, जब घेराबंदी और तलाशी अभियानों के दौरान किसी आतंकी समर्थक पर शिकंजा कसता है, तो वह अक्सर बच निकलने की नाकाम कोशिश में राष्ट्रीय राजनीतिक दलों का सदस्यता कार्ड दिखाने का सहारा लेता है। सुरक्षा अधिकारियों ने बताया कि यह तरीका कई दशकों में विकसित हुआ है। 1990 के दशक के उत्तरार्ध में संदिग्ध लोग पुलिस कार्रवाई से बचने के लिए अक्सर मतदाता पहचान पत्र का सहारा लेते थे, जबकि बाद के वर्षों में उन्होंने गहन जांच से बचने के लिए आधार कार्ड का इस्तेमाल करने की कोशिश की। अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में किसी भी राजनीतिक दल के नेतृत्व ने कभी हस्तक्षेप कर संबंधित व्यक्तियों को बचाने की कोशिश नहीं की है। एक संबंधित घटनाक्रम में, ऐसे तत्वों की गतिविधियां उन आतंकी संगठनों को फिर से सक्रिय करने में देखी गई हैं, जो 1993 के बाद काफी हद तक निष्क्रिय हो चुके थे।

सुरक्षा एजेंसियां अब उन आतंकी समूहों के नामों के फिर से सामने आने पर कड़ी नजर रख रही हैं, जिन्होंने 1990 के दशक और 2000 के दशक के शुरुआती दौर में जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के शुरुआती और खूनी दौर को परिभाषित किया था। इनमें अल-उमर मुजाहिदीन, अल बदर और तहरीक-उल-मुजाहिदीन जैसे संगठन शामिल हैं। अधिकारियों के अनुसार, इन पुराने और स्थानीय स्तर पर स्थापित संगठनों को फिर से सक्रिय करने की कोशिश के जरिए आईएसआई यह दिखाना चाहती है कि जम्मू-कश्मीर में आतंकी हिंसा कोई सीमा पार से संचालित छद्म युद्ध नहीं, बल्कि आंतरिक और स्थानीय स्तर पर निर्देशित है। अधिकारियों ने बताया कि इन आतंकी संगठनों का शीर्ष नेतृत्व पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में सुरक्षित ठिकानों पर मौजूद है, जबकि उनका जमीनी स्तर का नेटवर्क प्रचार, धन जुटाने और कट्टरपंथ फैलाने की गतिविधियों को फिर से तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं।

अधिकारियों ने बताया कि केंद्रीय खुफिया एजेंसियां इन घटनाक्रम पर कड़ी नजर बनाए हुए हैं और दोबारा सक्रिय हो रहे आतंकी समर्थकों द्वारा खड़े किए जा रहे रसद एवं सहायता नेटवर्क को निष्क्रिय करने के लिए लगातार कार्रवाई कर रही हैं। अधिकारियों ने कहा कि इसके साथ ही सुरक्षा एजेंसियां आतंक समर्थकों द्वारा युवाओं को वैचारिक रूप से गुमराह करने और कट्टरपंथ की ओर धकेलने की कोशिशों का भी आक्रामक तरीके से मुकाबला कर रही हैं, क्योंकि क्षेत्र में कठिन प्रयासों से हासिल की गई शांति और स्थिरता को बनाए रखने के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण है।

बहरहाल, देखा जाये तो हाल की घटनाएं संकेत देती हैं कि जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा चुनौतियां लगातार बदलते स्वरूप में सामने आ रही हैं। सीमा पार घुसपैठ के प्रयासों से लेकर अवैध संचार नेटवर्क और आतंकी समर्थक तंत्र को पुनर्जीवित करने की कोशिशों तक, सुरक्षा एजेंसियां बहुस्तरीय रणनीति के साथ सक्रिय हैं। अधिकारियों का कहना है कि क्षेत्र में शांति, स्थिरता और सुरक्षा बनाए रखने के लिए सतर्कता, तकनीकी क्षमता और खुफिया समन्वय को और मजबूत किया जा रहा है।

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