Mamata Banerjee Vs Suvendu Adhikari : West Bengal Elections में फिर से दिखेगा हाई वोल्टेज ड्रामा, कौन जीतेगा सबसे बड़ी टक्कर?

By नीरज कुमार दुबे | Mar 17, 2026

पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर दो दिग्गज नेताओं के आमने सामने आने से बेहद दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गई है। विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच यह मुकाबला केवल चुनावी लड़ाई नहीं बल्कि राजनीतिक इतिहास, व्यक्तिगत संबंधों और सत्ता की रणनीति का गहरा टकराव बन चुका है। पश्चिम बंगाल में होने जा रहे विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने शुभेंदु अधिकारी को न केवल नंदीग्राम बल्कि भवानीपुर से भी उम्मीदवार बनाकर एक बड़ा राजनीतिक संदेश दिया है।

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भाजपा की पहली सूची में 144 उम्मीदवारों के बीच शुभेंदु अधिकारी का नाम दो सीटों पर होना यह दर्शाता है कि पार्टी उन्हें इस चुनाव का सबसे महत्वपूर्ण चेहरा मान रही है। यह कदम भाजपा के लिए असामान्य जरूर है, लेकिन इससे पहले नरेंद्र मोदी भी 2014 में दो सीटों से चुनाव लड़ चुके हैं। इससे साफ है कि पार्टी शुभेंदु को बड़े नेतृत्व के रूप में स्थापित करना चाहती है।

नंदीग्राम और भवानीपुर दोनों सीटों का महत्व अलग अलग है। नंदीग्राम ग्रामीण क्षेत्र है जहां शुभेंदु की मजबूत पकड़ मानी जाती है, जबकि भवानीपुर को ममता बनर्जी का गढ़ माना जाता है। यहां से वह लंबे समय से जीतती रही हैं। हालांकि हाल के मतदाता सूची संशोधन में बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने से यह सीट अब पहले जैसी सुरक्षित नहीं मानी जा रही है।

इस चुनावी रणनीति का एक उद्देश्य ममता बनर्जी पर दबाव बनाना भी है। भाजपा चाहती है कि वह भवानीपुर में अधिक समय दें और अन्य क्षेत्रों में उनका प्रचार सीमित हो जाए। दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस भी नंदीग्राम में मजबूत उम्मीदवार उतारकर शुभेंदु को चुनौती देने की तैयारी में है। यदि ममता बनर्जी दोनों सीटों से चुनाव लड़ती हैं तो यह मुकाबला और भी रोमांचक हो जाएगा।

हम आपको बता दें कि शुभेंदु अधिकारी और ममता बनर्जी का संबंध कभी बेहद करीबी हुआ करता था। वर्ष 2007 के नंदीग्राम आंदोलन में दोनों साथ थे, जिसने वाम मोर्चा सरकार के पतन की नींव रखी थी। उस समय शुभेंदु एक उभरते हुए नेता थे और ममता बनर्जी के भरोसेमंद सहयोगी माने जाते थे। 2011 में जब तृणमूल कांग्रेस सत्ता में आई तो शुभेंदु की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही।

शुभेंदु का राजनीतिक सफर तेजी से आगे बढ़ा। वह सांसद बने, मंत्री बने और संगठन में मजबूत पकड़ बनाई। एक समय उन्हें पार्टी का दूसरा सबसे प्रभावशाली नेता माना जाता था। लेकिन समय के साथ मतभेद बढ़े। पार्टी में अन्य नेताओं की बढ़ती भूमिका और निर्णय प्रक्रिया से असंतोष के कारण उन्होंने तृणमूल कांग्रेस छोड़ दी और भाजपा में शामिल हो गए।

यहीं से दोनों नेताओं के बीच कड़वी प्रतिद्वंद्विता की शुरुआत हुई। 2021 का नंदीग्राम चुनाव इस टकराव का पहला बड़ा उदाहरण था जिसमें शुभेंदु ने ममता को हराकर अपनी राजनीतिक ताकत साबित की। अब 2026 में वही संघर्ष एक नए रूप में सामने है, जहां एक ओर शुभेंदु अपनी जीत को दोहराने और विस्तार देने की कोशिश में हैं, वहीं ममता अपने गढ़ को बचाने के साथ-साथ राजनीतिक प्रतिष्ठा की लड़ाई लड़ रही हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, दो सीटों से चुनाव लड़ना शुभेंदु के लिए अवसर और जोखिम दोनों है। यदि वह ममता बनर्जी को फिर से पराजित करते हैं और भाजपा सत्ता में आती है, तो उन्हें मुख्यमंत्री पद का प्रमुख दावेदार माना जा सकता है। लेकिन यदि उनकी हार होती है तो इसका उनके राजनीतिक भविष्य पर नकारात्मक असर भी पड़ सकता है। दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस इसे शुभेंदु और भाजपा की कमजोरी बता रही है। उनका कहना है कि दो सीटों से चुनाव लड़ना आत्मविश्वास की कमी को दर्शाता है। हालांकि वास्तविक तस्वीर चुनाव परिणाम ही स्पष्ट करेंगे।

बहरहाल, देखा जाये तो इस पूरे घटनाक्रम ने पश्चिम बंगाल के चुनाव को बेहद रोचक बना दिया है। ग्रामीण बनाम शहरी, पुराना सहयोगी बनाम नई प्रतिद्वंद्विता और रणनीति बनाम जनाधार, इन सभी पहलुओं का संगम इस चुनाव में देखने को मिलेगा। शुभेंदु अधिकारी और ममता बनर्जी के बीच यह सीधा मुकाबला न केवल राज्य की राजनीति की दिशा तय करेगा बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी इसके गहरे संकेत देखने को मिल सकते हैं।

-नीरज कुमार दुबे

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