ममता की जिद के कारण अंधियारे की तरफ पश्चिम बंगाल

By योगेंद्र योगी | Mar 05, 2026

बंगाल में 19वीं सदी के दौरान शिक्षा के केंद्र के रूप में बंगाली पुनर्जागरण ने साहित्यिक और बौद्धिक चेतना का विकास किया, जिससे पश्चिमी शिक्षा का आगमन हुआ। पश्चिम बंगाल ऐतिहासिक रूप से भारत का एक प्रमुख शैक्षणिक और बौद्धिक केंद्र रहा है, जो बंगाली पुनर्जागरण से लेकर आधुनिक काल तक ज्ञान का गढ़ बना रहा है। कोलकाता (तत्कालीन कलकत्ता) ने आधुनिक शिक्षा प्रणाली की शुरुआत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसमें 1857 में स्थापित कलकत्ता विश्वविद्यालय, विश्व-भारती, और आईआईटी खड़गपुर जैसे प्रतिष्ठित संस्थान शामिल हैं। ऐतिहासिक दौर में शिक्षा की कीर्ति पताका फहराने वाले पश्चिम बंगाल की आज हालत यह हो गई है कि 4 हजार स्कूल राम भरोसे हैं। पश्चिम बंगाल की शिक्षा व्यवस्था वेंटिलेटर पर है। 

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शिक्षा व्यवस्था में आई यह गिरावट बताती है कि टीएमसी सरकार के राज में बच्चों के भविष्य के साथ कैसा खिलवाड़ हो रहा है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने तीखा हमला बोलते हुए कहा कि नई शिक्षा नीति मातृभाषा (बंगाली) में पढ़ाई की बात करती है, लेकिन ममता सरकार इसे लागू नहीं करना चाहती। क्या राज्य सरकार बंगाली में शिक्षा की अनुमति नहीं देना चाहती? केंद्रीय मंत्री ने साफ कर दिया कि अगर 2026 के विधानसभा चुनावों के बाद भाजपा सत्ता में आती है, तो शिक्षा क्षेत्र उनका ‘प्राइम फोकस’ होगा। उन्होंने बंगाल की जनता को संदेश दिया कि वर्तमान सरकार ने शिक्षा को बर्बाद कर दिया है और अब बदलाव ही एकमात्र रास्ता है।

इतना ही नहीं पश्चिम बंगाल सरकार ने जादवपुर विश्वविद्यालय के लिए केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित अतिरिक्त निधि को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। जहां पूरा देश डिजिटल हो रहा है, वहां बंगाल के स्कूल पाषाण युग में जी रहे हैं। राष्ट्रीय स्तर पर स्कूलों में इंटरनेट की पहुंच 70% है, लेकिन पश्चिम बंगाल के सरकारी स्कूलों में यह आंकड़ा गिरकर महज 16% रह गया है। जून 2025 में, केंद्र सरकार ने मध्याह्न भोजन योजनाओं का लाभ उठाने वाले छात्रों की संख्या में आई तीव्र गिरावट पर चिंता व्यक्त की। केंद्र सरकार के स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग ने भी इस मामले में पश्चिम बंगाल सरकार से रिपोर्ट मांगी थी, जिसमें इसे राज्य में स्कूल छोड़ने वालों की संख्या में वृद्धि का मुख्य कारण बताया गया था। 

इससे पहले, वित्तीय वर्ष 2023-24 के दौरान पश्चिम बंगाल में मध्याह्न भोजन के लिए बजटीय आवंटन 2,377 करोड़ रुपये था। हालांकि, समीक्षाधीन वित्तीय वर्ष के दौरान वास्तविक उपयोग मात्र 515.04 करोड़ रुपये (21.66 प्रतिशत) था। इसका अर्थ यह है कि तीनों वित्तीय वर्षों को मिलाकर दोपहर के भोजन के लिए आवंटित बजट का औसत उपयोग प्रतिशत मात्र 16.96 प्रतिशत है। संभवतः, कम प्रतिशत उपयोग को ध्यान में रखते हुए, पश्चिम बंगाल सरकार ने वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए इस मद के अंतर्गत बजटीय आवंटन को घटाकर 1,150.90 करोड़ रुपये कर दिया है, जो कि 2023-24, 2024-25 और 2025-26 के संबंधित आंकड़ों की तुलना में काफी कम है। 


शिक्षा के लिए बेशक धन नहीं हो किन्तु चुनाव जीतने के लिए ममता सरकार ने खजाने का मुंह खोल दिया है। वर्ष 2026 के विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बेरोजगार युवाओं के लिए राज्य के मासिक ₹1,500 भत्ते की शुरुआत 15 अगस्त से आगे बढ़ाकर 1 अप्रैल कर दी है। राज्य की महिलाओं के लिए लक्ष्मी भंडार प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण योजना के तहत मासिक भत्ते में ₹500 की वृद्धि भी की थी, जिसे पिछले सप्ताह 5 फरवरी को अंतरिम बजट पेश किए जाने के बाद फरवरी से लागू किया जा चुका है। सम्मानजनक वेतन वृद्धि की मांग को लेकर पश्चिम बंगाल के सरकारी स्कूलों के पैरा शिक्षकों विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। पैरा शिक्षकों को प्रति माह 10,000 से 13,000 रुपये के बीच वेतन मिलता है और वे संविदा आधार पर काम करते हैं। 

देश में कर्ज के बोझ तले दबे सबसे बड़े राज्यों में पश्चिम बंगाल टॉप पर है। बंगाल को अपने राजस्व का 42 फीसदी हिस्सा सिर्फ ब्याज के भुगतान में खर्च करना पड़ा है। वित्त वर्ष 2025 में पश्चिम बंगाल पर ब्याज भुगतान का बोझ अन्य राज्यों की तुलना में सबसे ज्यादा था। राज्य को टैक्स और नॉन टैक्स रेवेन्यू से 1.09 लाख करोड़ रुपए मिले थे, लेकिन सिर्फ ब्याज भुगतान पर 45 हजार करोड़ से अधिक खर्च किए गए। इसका मतलब हुआ कि उसके राजस्व का 42 फीसदी हिस्सा तो ब्याज चुकाने में ही चला गया। पश्चिम बंगाल की आर्थिक सेहत खराब होने के साथ जिद के चलते शिक्षा की व्यवस्था भी लड़खड़ा रही है। हो सकता है विधानसभा चुनाव ममता की तृणमूल कांग्रेस जीत जाए किन्तु ममता बनर्जी की जिद के कारण इससे विकास की गति को रफ्तार नहीं मिल सकेगी।

- योगेन्द्र योगी

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