By नीरज कुमार दुबे | Sep 08, 2025
कर्नाटक के मांड्या ज़िले में गणेश विसर्जन शोभायात्रा के दौरान हुई झड़पों ने न सिर्फ़ राज्य की कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं, बल्कि कांग्रेस सरकार की नीतियों पर भी गंभीर बहस छेड़ दी है। भाजपा नेता लगातार आरोप लगा रहे हैं कि कांग्रेस सरकार तुष्टिकरण की राजनीति कर रही है, जिसके चलते सांप्रदायिक उपद्रवियों का मनोबल बढ़ा है और हिंदू समुदाय में असुरक्षा की भावना गहरी होती जा रही है।
देखा जाये तो मांड्या की घटना ने हिंदू संगठनों और भाजपा को जनता के बीच आक्रामक नैरेटिव पेश करने का अवसर दे दिया है। ‘जय श्रीराम’ के नारों और भगवा ध्वजों के साथ हुए विरोध प्रदर्शनों ने इस विवाद को सांस्कृतिक-धार्मिक पहचान की लड़ाई का रूप दे दिया है। भाजपा इसे “हिंदुओं को दोयम दर्जे का नागरिक बनाने की साजिश” करार देकर बहुसंख्यक समाज को एकजुट करने की कोशिश कर रही है। आर अशोक और विजयेंद्र जैसे नेता इस घटना को “कर्नाटक बनाम पाकिस्तान” के रूपक से जोड़कर आक्रामक रुख अपना रहे हैं।
देखा जाये तो कांग्रेस सरकार पर तुष्टिकरण के आरोप भाजपा को 2028 के विधानसभा चुनावों तक एक मज़बूत राजनीतिक हथियार मुहैया करा सकते हैं। ग्रामीण और शहरी कर्नाटक, विशेषकर मांड्या, हुबली और शिवमोग्गा जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में हिंदूवादी ताक़तों का सामाजिक आधार और व्यापक हो सकता है। यदि सरकार लगातार कठोर कार्रवाई करने में विफल रहती है, तो यह धारणा और गहरी होगी कि कांग्रेस सिर्फ़ सत्ता बचाने के लिए वोट बैंक की राजनीति कर रही है।
देखा जाये तो मांड्या की घटना केवल एक स्थानीय सांप्रदायिक झड़प नहीं है। यह कर्नाटक की राजनीति के लिए एक बड़ा टर्निंग प्वॉइंट साबित हो सकती है। कांग्रेस सरकार को अब यह तय करना होगा कि वह कानून-व्यवस्था और धार्मिक आयोजनों की सुरक्षा को प्राथमिकता देकर तुष्टिकरण की छवि से बाहर आती है या फिर भाजपा और हिंदूवादी संगठनों के लिए एक स्थायी मुद्दा छोड़ती है। यह घटनाक्रम बताता है कि दक्षिण भारत में भी धार्मिक पहचान और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति तेज़ी से गहरी पकड़ बना रही है, और मांड्या की घटना इस दिशा में एक अहम पड़ाव हो सकती है।