भारतीय टीवी पर सोप ऑपेरा की शुरुआत की मनोहर श्याम जोशी ने

By प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क | Aug 09, 2017

शब्दों का विशाल भंडार और उतना ही सुंदर उनका उपयोग करके एक तिलिस्म तैयार करने में महारत रखने वाले मनोहर श्याम जोशी पत्रकारिता और भारतीय टेलीविजन के जरिये लोगों तक अपनी सोच पहुंचाने में सक्षम रचनाकार थे और उनकी लेखनी के लोग आज भी कायल हैं। उन्हें बुद्धू बक्से की दुनिया में ''सोप ऑपेरा'' की शुरुआत करने का श्रेय जाता है। जोशी की सशक्त लेखनी की देन 'हम लोग' तथा 'बुनियाद' धारावाहिकों में अभिनय कर चुके विनोद नागपाल कहते हैं, ''अब कहां रहे मनोहर श्याम जोशी− शायद यही वजह है कि आज प्रसारित होने वाले धारावाहिकों को लोग याद ही नहीं रख पाते। मैं तो कहूंगा कि जोशी जी ने एक एक चरित्र गढ़ा था और यही वजह है कि लोग इन सोप ऑपेरा को आज भी याद करते हैं।''

भारतीय टेलीविजन पर प्रसारित पहले सोप ऑपेरा 'हम लोग' में 'नन्हे' का किरदार निभाने वाले अभिनव चतुर्वेदी कहते हैं, ''बात बुनियाद की सफलता की हो या हम लोग की सफलता की, पूरा श्रेय मनोहर श्याम जोशी को जाता है। उनकी लेखनी बेहद सशक्त थी और भाषा पर उनकी गहरी पकड़ थी। चरित्र को वह विषय से भटकने नहीं देते थे। उनमें अहसास को वास्तविकता का रूप देने की क्षमता थी। यही वजह थी कि इन धारावाहिकों ने दर्शकों की नब्ज पर असर डाला।'' अभिनव कहते हैं, ''ये धारावाहिक दर्शकों को खुद से अलग नहीं लगे। एक धारावाहिक विभाजन पर आधारित था और दूसरे में निम्न मध्यम वर्ग का संघर्ष बताया गया था। जनता फ्लैट को देख कर लोग नाक मुंह सिकोड़ते हैं लेकिन जोशी जी ने इसी जनता फ्लैट में पूरी शूटिंग कर डाली। कॉन्टेन्ट वैल्यू इतनी पुख्ता थी कि 156 एपीसोड निकल गए।'' उन दिनों अभिनव की उम्र केवल 24 साल थी। वह कहते हैं, ''लगता ही नहीं था कि हम लोग सीरियल में काम कर रहे हैं। लगता था कि हम खेलने जा रहे हैं।''

जोशी ने अपनी कलम से 'मुंगेरी लाल के हसीन सपने', 'कक्का जी कहिन', 'हमराही', 'जमीन आसमान' और 'गाथा' जैसे अन्य धारावाहिक भी दिए जिन्होंने दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया। नागपाल कहते हैं, ''उन्होंने जिस धारावाहिक की पटकथा लिखी, उसमें अपने आप को पूरी तरह समर्पित कर दिया। कहीं कटाक्ष करना हो या कहीं भावनाओं को झकझोरना हो, जोशी जी ने अपनी कलम का उपयोग करने में कहीं कोई कसर नहीं छोड़ी।'' 9 अगस्त 1933 को राजस्थान के अजमेर में जन्मे जोशी लंबे समय तक पत्रकारिता से जुड़े रहे। उन्होंने 'पापा कहते हैं', 'हे राम' और 'अप्पू राजा' जैसी फिल्मों की पटकथा भी लिखी। उनके सहयोगियों के अनुसार, उनका रचना संसार इतना व्यापक और गहन है कि पुरस्कार उसके आगे बेहद बौने नजर आते थे। शब्दों से भावनाओं, यथार्थ और मनोरंजन को नयी दशा दिशा देने वाले जोशी ने 30 मार्च 2006 को 72 साल की उम्र में दिल्ली में अंतिम श्वांस ली।

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