Rani Lakshmibai Birth Anniversary: काशी की मनु ने झांसी की रानी लक्ष्मीबाई बनकर अंग्रेजों के दांत किए खट्टे

By अनन्या मिश्रा | Nov 19, 2023

'खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी' ये कविता तो आप सभी ने पढ़ी होगी। यह कविता झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की वीरगाथा को बयां करती है। ऐसे दौर में जब देश के अन्य राजा एक-एक कर अंग्रेजों के सामने घुटने टेक रहे थे, तो वहीं रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों का डटकर मुकाबला किया। आज यानी की 19 नवंबर को रानी लक्ष्मीबाई का जन्म हुआ था। रानी लक्ष्मीबाई बचपन से युद्ध कला में निपुण थीं। उन्होंने अंग्रेजों को नाकों चने चबवा दिए थे। आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर रानी लक्ष्मीबाई के जीवन से जुड़े कुछ रोचक तथ्यों के बारे में...

उत्तर प्रदेश के काशी में महाराष्ट्रीयन कराड़े ब्राह्मण परिवार में 19 नवम्बर 1835 को रानी लक्ष्मीबाई का जन्म हुआ था। उनके बचपन का नाम 'मणिकर्णिका' था, लेकिन प्यार से लोग उन्हें 'मनु' कहकर पुकारते थे। लक्ष्मीबाई के पिता का नाम मोरोपन्त ताम्बे और माता का नाम भागीरथी बाई था। पिता मोरोपन्त ताम्बे मराठी थे और मराठी बाजीराव की सेवा किया करते थे। वहीं जब मनु महज 4 साल की थीं, तो उनके माता-पिता की मृत्यु हो गई थी। बचपन में मनु ने शस्त्र और शास्त्र दोनों की ही शिक्षा ली। वहीं उनको लोग प्यार से छबीली भी कहते थे। 

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विवाह

साल 1850 को मनु का विवाह झांसी के महाराजा गंगाधर राव के साथ हुआ और इस तरह से वह झांसी की रानी बन गईं। विवाह के बाद मनु का नाम लक्ष्मीबाई रखा गया। साल 1851 में लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया। लेकिन 4 महीने बाद उस पुत्र की मृत्यु हो गई। महाराजा गंगाधर को पुत्र वियोग का सदमा इस कदर लगा कि वह अस्वस्थ रहने लगे। वहीं 20 नवम्बर 1853 को उन्होंने एक पुत्र गोद लिया, जिसका नाम दामोदर राव रखा। इसके अगले दिन यानी की 21 नवंबर 1853 को राजा गंगाधर राव का निधन हो गया। 

अंग्रेजों ने झांसी पर की चढ़ाई

झांसी को शोक में डूबा देख अंग्रेजों ने चढ़ाई शुरू कर दी। तो वहीं रानी लक्ष्मीबाई ने भी ईंट का जवाब पत्थर से दिया। साल 1854 में रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों से साफ कह दिया कि वह अपनी झांसी अंग्रेजों को नहीं देंगी। जिसके बाद 5 जून 1857 को विद्रोहियों ने सदर बा़जार स्थित स्टार फोर्ट पर कब्जा कर लिया। इसके चलते झांसी में मौजूद सभी अंग्रेजों ने किले में शरण ली। यह संघर्ष 6 जून से 8 जून 1857 तक चला। इस दौरान लेफ्टिनेण्ट टेलर, कैप्टन डनलप और कैप्टन गॉर्डन मारे गये। वहीं कैप्टन स्कीन ने बचे हुए अंग्रे़ज सैनिकों सहित बागियों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। बागियों ने झोकनबाग में 61 अंग्रे़जों को मौत के घाट उतार दिया। 

लक्ष्मीबाई ने संभाली सत्ता

महारानी लक्ष्मीबाई ने 12 जून 1857 में एक बार फिर झांसी राज्य का प्रशासन संभाला। जोकि उनके पास 4 जून 1858 तक रहा। वहीं 21 मार्चत 1858 को जनरल ह्यूरो़ज झांसी पहुंचा और 21 मार्च से 3 अप्रैल तक लक्ष्मीबाई और अंग्रेजों के बीच भीषण युद्ध हुआ। इस दौरान युद्ध जब अपने चरम पर पहुंच गया, तो रानी ने दत्तक पुत्र दामोदर को अपनी पीठ पर बांधी और घोड़े की लगाम मुंह में दबाये किले के ऊपर से अंग्रेज सैनिकों के साथ निर्भीकता से युद्ध करने लगीं। 

वहीं सलाहकारों की सलाह से लक्ष्मीबाई 3 अप्रैल 1858 को आधी रात के समय 4-5 अन्य घुड़सवारों के साथ कालपी के लिए रवाना हुईं। हांलाकि अंग्रेज सैनिकों ने उनका पीछा किया, लेकिन वह हाथ नहीं आईं। वहीं 17 जून 1858 को रानी लक्ष्मीबाई ग्वालियर पहुंची, जहां पर अंग्रेज सैनिकों के साथ उनका फिर युद्ध शुरू हो गया। लेकिन रानी लक्ष्मीबाई के प्रहारों के सामने अंग्रेजी सेना को पीछे हटना पड़ा। 

वीरगति को प्राप्त हुई लक्ष्मीबाई

ह्यूरो़ज 18 जून 1858 को स्वयं युद्ध भूमि में आ डटा। वहीं लक्ष्मीबाई दामोदर को रामचंद्र देशमुख को सौंपकर अंग्रेजों से युद्ध करते हुए सोनरेखा नाले की तरफ बढ़ीं। लेकिन दुर्भाग्यवश लक्ष्मीबाई का घोड़ा नाले को पार नहीं कर सका। इसी बीच एक अंग्रेज सैनिक से लक्ष्मीबाई पर तलवार पर हमला कर दिया। जिसके कारण रानी बुरी तरह से घायल हो गईं। बाबा गंगादास की कुटिया में 18 जून 1858 को झांसी की रानी लक्ष्मीबाई महज 23 साल की आयु में वीरगति को प्राप्त हुईं।

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