लोकसभा चुनावों में जीत से ज्यादा अपने अस्तित्व को बचाने के लिए मैदान में उतर रहे हैं कांग्रेस समेत कई राजनीतिक दल

By नीरज कुमार दुबे | Mar 18, 2024

देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों के लिए इस बार का आम चुनाव खास इसलिए है क्योंकि इसके परिणाम इन दलों के अस्तित्व के बचे रहने या खत्म होने का भी निर्धारण करने वाले हैं। जहां तक कांग्रेस की बात है तो भले वहां गांधी परिवार से अलग अध्यक्ष आ गया हो लेकिन पार्टी अब भी पूरी तरह गांधी परिवार के प्रभाव में काम कर रही है इसलिए तमाम प्रयास करने के बावजूद आगे नहीं बढ़ पा रही है। 2014 से कांग्रेस की हार का और नेताओं के पार्टी छोड़ने का जो सिलसिला शुरू हुआ है वह अनवरत जारी है।

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देखा जाये तो केंद्र में नरेंद्र मोदी के रहते पिछला दशक 138 साल पुरानी पार्टी के लिए बहुत मुश्किल भरा रहा। वह लोकसभा में विपक्ष के नेता के पद के लिए आवश्यक सीटें भी हासिल करने में विफल रही। कांग्रेस नेता पार्टी की गौरवशाली विरासत पर भरोसा करते हुए पतन के रुकने और फिर से खड़े होने की उम्मीद कर रहे हैं, हालांकि कई चुनौतियां उनके सामने खड़ी हैं। कांग्रेस पार्टी ने पिछले चुनाव में लड़ी गई 421 सीटों में से केवल 52 सीटें हासिल कीं, जिससे 2014 की तुलना में उसकी संख्या में थोड़ा सुधार हुआ जब उसने लड़ी गई 464 सीटों में से 44 सीटें हासिल की थीं। 2014 में 178 के मुकाबले 2019 में 148 कांग्रेस उम्मीदवारों ने अपनी जमानत गंवा दी।

हम आपको बता दें कि वर्ष 1984 में कांग्रेस के लिए शिखर तब आया जब उसने रिकॉर्ड 404 सीटें जीतीं। हालांकि उस जीत में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या से उपजी सहानुभूति की लहर एक बड़ा कारक रही थी। इसके बाद 1989 के आम चुनाव में कांग्रेस को 197 सीट, 1991 में 232, 1996 में 140, 1998 में 141, 1999 में 114, 2004 में 145 और 2009 में 206 सीटें मिलीं थीं। इसके बाद 2014 में कांग्रेस को 44 और 2019 के चुनाव में 52 सीटें मिलीं। वर्ष 2019 और 2014 के लोकसभा चुनावों में पार्टी के लिए हल्की उम्मीद की किरण यह थी कि उसने अपना मत प्रतिशत लगभग 19 प्रतिशत पर बनाए रखा, जिसे अब वह आगे बढ़ाने की उम्मीद कर रही है। 2009 में, जब मनमोहन सिंह सत्ता में लौटे थे, तो पार्टी को 28.55 प्रतिशत मत मिले थे।

कांग्रेस में बिखराव का ऐसा सिलसिला शुरू हुआ है जो थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। खास बात यह है कि इस बिखराव को रोकने के प्रयास भी नहीं किये जा रहे हैं। राहुल गांधी ने अपनी भारत जोड़ो न्याय यात्रा जिस दिन शुरू की थी उस दिन से कांग्रेस छोड़ने वाले नेताओं की संख्या में निरंतर वृद्धि होती रही जोकि यात्रा के समापन के बाद भी जारी है। शायद कांग्रेस इस बात को समझ चुकी है कि परिणाम क्या रहने वाले हैं इसलिए चुनाव प्रचार की औपचारिक शुरुआत से पहले ही ईवीएम पर निशाना साधना शुरू कर दिया है।

वहीं विपक्ष के अन्य दलों की बात करें तो दिल्ली और पंजाब में सत्तारुढ़ ‘आप’ ने करीब एक दशक में राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल कर लिया है। वह आगामी लोकसभा चुनावों में अपने राजनीतिक पदचिह्न का विस्तार करने की कोशिश करेगी। हम आपको बता दें कि आम आदमी पार्टी भी ‘इंडिया’ गठबंधन की एक प्रमुख घटक है। पार्टी बड़ी परीक्षा के लिए तैयार है और उसे अपने नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों और आबकारी नीति घोटाला मामले में अपने प्रमुख अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी के खतरे जैसी चुनौतियों से भी निपटना है। आप पंजाब (13 सीटें), दिल्ली (4), असम (2), गुजरात (2) और हरियाणा (एक सीट) में लोकसभा सीट पर चुनाव लड़ रही है। 17वीं लोकसभा में केवल पांच सांसदों तक सीमित रही आप विपक्षी ‘इंडिया’ गठबंधन का हिस्सा है। 2019 के चुनावों में अब तक की सबसे कम संख्या हासिल करने के बाद इस आम चुनाव में उनके लिए करो या मरो की स्थिति है।

दूसरी ओर, वामपंथी दलों के लिए भी यह लोकसभा चुनाव अस्तित्व बचाने की चुनौती वाला है। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन, रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी और ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक ने पिछले कुछ चुनावों में अपने प्रदर्शन में लगातार गिरावट देखी है। वामपंथी दलों में भाकपा अपना राष्ट्रीय दर्जा खो चुकी है और माकपा राष्ट्रीय दल है, लेकिन उसका आधार भी सिकुड़ता जा रहा है। देखा जाये यह लोकसभा चुनाव वाम दलों के भविष्य के लिए भी निर्णायक रहने वाला है।

वहीं राष्ट्रीय जनता दल, भारत राष्ट्र समिति, एआईयूडीएफ, वाईएसआर कांग्रेस, तेलुगू देशम पार्टी, इंडियन नेशनल लोकदल, जननायक जनता पार्टी, पीडीपी, नेशनल कांफ्रेंस, झारखंड मुक्ति मोर्चा, शिवसेना और एनसीपी के दोनों गुट, एमएनएफ, जेडपीएम, शिरोमणि अकाली दल, अन्नाद्रमुक, बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस के लिए भी यह चुनाव करो या मरो जैसी स्थिति वाले हैं। देखना होगा कि लोकसभा चुनावों में इन क्षेत्रीय दलों के हाथ कितनी सफलता लगती है।

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