विवाह संस्था की रक्षा वैवाहिक बलात्कार को अपवाद मानने का आधार नहीं हो सकता: न्यायमित्र

By प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क | Jan 19, 2022

नयी दिल्ली| दिल्ली उच्च न्यायालय से न्यायमित्र ने मंगलवार को कहा कि विवाह संस्था की रक्षा और दुरुपयोग की आशंका वैवाहिक बलात्कार को भारतीय दंड संहिता के तहत अपवाद मानने का आधार नहीं हो सकते।

इस मामले में आगे की सुनवाई 19 जनवरी को भी जारी रहेगी। न्यायमूर्ति राजीव शकधर और न्यायमूर्ति सी हरि शंकर की पीठ से राव ने कहा, ‘‘अदालत मूक दर्शक नहीं बनी रह सकती और इस दलील को स्वीकार नहीं किया जा सकता कि संसद ही वैवाहिक बलात्कार अपवाद के मामले का ‘ख्याल रखेगी’ क्योंकि इसने ही कानून पास किया है।’’ वरिष्ठ अधिवक्ता ने जोर देकर कहा कि अदालत को यह आकलन करना है कि क्या अपवाद संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता) और 21 (जीवन का अधिकार) की कसौटी पर खरा उतरता है, विशेष रूप से पति द्वारा जबरदस्ती संबंध बनाने के मामले में नाबालिग पत्नियों की रक्षा करने वाले कानून को देखते हुए।

राव ने कहा, ‘‘अगर दुरुपयोग की संभावना है, तो भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (बलात्कार) और धारा 498ए (क्रूरता) का दुरुपयोग किया जा सकता है।’’ न्याय मित्र ने यह भी कहा कि भारतीय दंड संहिता के तहत बलात्कार के अपराध में ‘एक महिला की सहमति’ को मान्यता दी गई है और पूरे अधिनियम को ‘एक महिला के दृष्टिकोण से’ देखा जाता है, जिसे निजता और शारीरिक अखंडता का अधिकार है। शीर्ष अदालत ने महिला के ‘‘ना’’ कहने के अधिकार को मान्यता दी है, लेकिन इस कानून का प्रभाव यह है कि पत्नी की सहमति को अप्रासंगिक बना दिया गया है। न्यायमित्र ने कहा, ‘‘समय आ गया है कि कानून पत्नी को बताए कि ‘मर्जी है आपकी, आखिर वर है आपका’।

अदालत ने 17 जनवरी को केंद्र से वैवाहिक बलात्कार के अपराधीकरण के मुद्दे पर अपनी सैद्धांतिक स्थिति स्पष्ट करने के लिए कहा था।

उच्च न्यायालय की पीठ गैर सरकारी संगठन आरआईटी फाउंडेशन, ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक विमेन्स एसोसिएशन, एक पुरुष और एक महिला द्वारा दायर जनहित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। इसमें भारतीय बलात्कार कानून के तहत पतियों को दिए गए अपवाद को खत्म करने की मांग की गई है।

न्याय मित्र ने इसके पहले कहा था कि एक विवाहित महिला को अपने पति पर मुकदमा चलाने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है, अगर उसे लगता है कि उसके साथ बलात्कार किया गया था। केंद्र सरकार ने इस मामले में दायर अपने पहले हलफनामे में कहा है कि वैवाहिक बलात्कार को एक आपराधिक उल्लंघन नहीं बनाया जा सकता क्योंकि यह एक ऐसी घटना बन सकती है जो विवाह की संस्था को अस्थिर कर सकती है और पतियों को परेशान करने का सरल औजार बन सकती है।

दिल्ली सरकार ने अदालत को बताया है कि वैवाहिक बलात्कार को पहले से ही भारतीय दंड संहिता के तहत ‘क्रूरता के अपराध’ के रूप में शामिल किया गया है।

याचिकाकर्ताओं ने भारतीय दंड संहिता की धारा 375 (बलात्कार) के तहत वैवाहिक बलात्कार अपवाद की संवैधानिकता को इस आधार पर चुनौती दी है कि यह उन विवाहित महिलाओं के साथ भेदभाव करती है जिनका उनके पतियों द्वारा यौन उत्पीड़न किया जाता है।

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