Gyan Ganga: शिव-पार्वती विवाह में डाली माता मैना ने अड़चन

By सुखी भारती | Jun 05, 2025

भगवान शिव को वर के रूप में प्राप्त करने के लिए माता पार्वती ने कठिन से भी कठिन तप किया।यह उनके द्वारा किए गए तप का ही प्रताप था, कि स्वयं नीलकंठ भगवान् उन्हें वर्ण करने के लिए, उनके द्वार पर आ पहुँचे थे। किंतु हिम ग्रह में आकर भी वे देवी पार्वती से मिल तक नहीं पाए। क्यों? क्योंकि देवी पार्वती की माता मैना उनके मार्ग में अवरोध बनकर खड़ी हो गई।मैना ने देवी पार्वती को अपनी गोदी में बिठाया,और ऊँचे स्वर में विलाप कर रहीं हैं-

जो फलु चहिअ सुरतरुहिं सो बरबस बबूरहिं लागई॥

तुम्ह सहित गिरि तें गिरौं पावक जरौं जलनिधि महुँ परौं।

घरु जाउ अपजसु होउ जग जीवत बिबाहु न हौं करौं॥

मैना बोली कि जिस विधाता ने तुमको इतनी सुंदरता दी,उसने तुम्हारे भाग्य में बावला वर कैसे लिख दिया? जो फल कल्प वृक्ष में लगना चाहिए था, वह जबर्दस्ती बबूल में लग रहा है। मैं तुम्हें लेकर पहाड़ से गिर पडूंगी, आग में जल जाऊँगी या समुद्र में कूद पडूंगी। चाहे घर उज़ड जाए और संसार भर में अपकीर्ति फैल जाए,पर जीते जी मैं तेरा ब्याह उस बांवरे से न करुंगी। 

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मैना बडे़-बड़े दावे कर रही है। दावे कहा तो क्या कहा,वह तो मानो भीष्म प्रतिज्ञायें ले रही है, कि दुनिया चाहे इधर से उधर हो जाए पर मैना का संकल्प था, कि वह अपनी पुत्री पार्वती का विवाह उस बावले के साथ किसी भी कीमत पर नहीं होने देना चाहती थी। 

पाठक गण ध्यान देंगे तो जानेंगे कि देवी पार्वती को उनकी माता मैना मोहवश व माया के अधीन होकर ही पहचान नहीं पा रहीं हैं। मैना को पता ही नहीं, कि जिन्हें उसने अपनी पुत्री समझ रखा है व उसे अपनी गोद में बिठा रखा है, वे कोई उसकी पुत्री नहीं हैं अपितु संपूर्ण संसार की जननी होने के साथ-साथ मैना की भी माता हैं। कायदे से देवी पार्वती को मैना की गोद में नहीं अपितु मैना को माता पार्वती की गोद में होना चाहिए।

जीव के दुर्भाग्य की यही विडंबना है। वह माया के पाश में बंधकर व ज्ञान नेत्रें के अभाव में वह निर्णय ही नहीं ले पाता, कि वह ईश्वरीय पथ पर कैसे आगे बढ़े? इसे तो बस इतना ही पता होना चाहिए, कि ईश्वर मेरे द्वार पर आ खड़े हैं। फिर देखो वह पूरे जोश व उमंग के साथ उसके विरोध में खड़ा हो जाता है। वह स्वयं में तो कोई त्रुटि व खोट नहीं देखता उल्टे विधाता में ही खोट निकालने लगता है। उसे विधि के विधान में महान त्रुटियां व अभाव प्रतीत होने लगते हैं। वह कुछ न कुछ बोलने लगता है, घोषणाएं करने लगता है, कि भले ही मैं पहाड़ से कूद जाऊं अथवा समुद्र में डूब जाऊं किंतु विधाता के बने विधान अनुसार स्वयं को उपस्थित नहीं करुंगा।

समझ लीजिए कि जीव की अज्ञानता, पुण्य के अभाव व संतों में उसकी अरुचि ही वह कारण है, जिसके चलते वह ईश्वर के विरूद्ध भी खड़ा हो जाता है। मैना तो उस जीव का केवल प्रतिबिंब है। मैना इतने पर भी शांत नहीं होती। जब वह विधाता को खूब खरी खोटी सुना कर थक जाती है, तो अपने क्रोध का कांटा मुनि नारद जी के प्रति घुमा देती है-

नारद कर मैं काह बिगारा। भवनु मोर जिन्ह बसत उजारा॥

अस उपदेसु उमहि जिन्ह दीन्हा। बौरे बरहि लागि तपु कीन्हा॥

मैना बोली कि मैंने नारद का क्या बिगाड़ा था, जिन्होंने मेरा बसता हुआ घर उजाड़ दिया। नारद जी ने मेरी बेटी को ऐसा उपदेश दिया, जिससे उसने बावले वर को पाने के लिए तप किया। नारद जी का सच मैं क्या कहूं। उनको न किसी का मोह है न माया,न उनके धन है, न घर है और न स्त्री ही है। वो सबसे उदासीन है। यही वह कारण कि नारद जी दूसरों का घर उजाड़ने वाले हैं। उन्हें न किसी की लाज है।भला बांझ स्त्री प्रसव पीड़ा क्या जाने?

मैना की स्थिति भयंकर डांवाडोल है। वह उन्हीं संत की निंदा में खड़ी हो गई, जिन संतों का उसने अपने घर पर,कितनी बार सम्मान किया था। भक्ति मार्ग के दो ही तो स्तंभ हैं, पहला संत व दूसरा ईश्वर। किंतु मैना की मति की जड़ता है ही इतनी कि वह दोंनो से ही घृणा कर रही है। एक छोर पर संत हैं और दूसरे पर स्वयं भगवान्। नदी के उस पार पहुंचना है, तो दोनों छोर का बने रहना अति आवश्यक है। अन्यथा नदी के उस पार जाना मुश्किल ही नहीं असंभव है। 

मैना है कि भक्ति के इन दोनों आधारों से ही रहित होने पर अड़ी है। भगवान् की आरती तो उसने की ही नहीं,आरती का थाल तक गिरा दिया। अब कह रही है कि संत नारद भी ठीक नहीं हैं। उन्होंने ही ऐसा उपदेश दिया कि मेरी भोली भाली कन्या का दिमाग खराब हो गया। उसने व्यर्थ में ही इतना कठिन तप कर डाला। मेरी प्यारी कोमल कन्या को कांटों की डगर पर चलना पड़ा। नारद का भला क्या गया? उसका अपना घर कहीं बसा होता तो पता चलता कि अपनों का कष्ट क्या होता है। 

मैना को इस प्रकार महान रुदन करते देख, देवी पार्वती ने अपनी माता को समझाने की ठानी। देवी पार्वती मैना को क्या उपदेश देती हैं, जानेंगे अगले अंक में---(क्रमशः---)

- सुखी भारती

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