Gyan Ganga: माता सीता ने हनुमानजी पर सदैव प्रभु कृपा बने रहने का आशीर्वाद दिया था

By सुखी भारती | Mar 19, 2022

"अजर अमर गुननिधि सुत होहू।

करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना।

निर्भर प्रेम मगन हनुमान।।"

विगत अंक में हमने देखा था, कि उपरोक्त चौपाईयों में माता सीता जी, श्रीहनुमान जी को अपने आशीर्वादों की अमृत वर्षा से नहला रही हैं। आज संसार में कौन मायावी जीव ऐसा नहीं, जो अजर व अमर नहीं होना चाहता। और इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु, उसके समस्त प्रयास निष्फल भी सिद्ध हो रहे हैं। कोई भी श्रेष्ठ से श्रेष्ठ ज्ञान-विज्ञान भी, ऐसे अनमोल वरदानों की थाह नहीं ले पा रहे हैं। इस शोध पर इतनी खोजें व अनुसंधान हो रहे हैं, कि इसका लेखा जोखा रखना भी संभव नहीं है। लेकिन श्रीहनुमान जी का सौभाग्य ऐसा है, कि माता सीता जी उन्हें सहज ही यह उपलब्धियां सुलभ करवा रही हैं। निश्चित ही ऐसे वरदानों की रत्ती भर भी उपलब्धि अगर मुझे स्वयं को हो जाती, तो मेरी तो बाँछे ही खिल जाती। मेरे पाँव धरती पर कहाँ लगने थे। लेकिन श्रीहनुमान जी को तो यह वरदान पूरे नख से सिर तक, छक कर प्राप्त हुए थे। लेकिन ऐसा किसी भी दृष्टिकोण से देखने को नहीं मिला, कि श्रीहनुमान जी के मन में, किसी प्रकार की कण भर भी चंचलता आई हो। वे तो बस चिर आनंद की अवस्था में ही विचरण कर रहे हैं। लेकिन चौपाई पढ़ें तो आप पायेंगे, कि श्रीहनुमान जी के हृदय में अति प्रसन्नता का उदय भी होता है-

इसे भी पढ़ें: Gyan Ganga: रावण भले भगवान शंकर का शिष्य था, पर हनुमानजी के रूप में शंकरजी ही तो सामने थे

"बार बार नाएसि पद सीसा।

बोला बचन जोरि कर कीसा।।

अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता।

आसिष तव अमोघ बिख्याता।।"

और यह उदय होता है, जब श्रीहनुमान जी की कर्ण इन्द्रियों में ‘प्रभु कृपा करें’ नामक शब्द पड़ते हैं। आज हमें यही चिंतन करना है, कि इन शब्दों में आखिर ऐसा क्या था, कि श्रीहनुमान जी परमानंद की अनुभूति का करने लगे। सज्जनों, वास्तव में आध्यात्म में साधक की संजीवनी बूटी ही वह है, जब साधक को उसके प्रभु की कृपा प्राप्त होती है। श्रीहनुमान जी उदाहरण के तौर पर कह भी तो रहे हैं, कि प्रभु की कृपा हो जाये तो, एक नन्हां सर्प भी गरुड़ को सहज ही निगल जाता है। ऐसा नहीं कि सर्प में इतनी शक्ति पहले से ही विद्यमान होती होगी। अपितु यह तो प्रभु कृपा का ही प्रताप है, कि सर्प ऐसा अविश्वसनीय कार्य कर पाता है। यह कृपा ही होती है, कि जिस सागर को लाँघने में बड़े-बड़े वानर योद्धाओं के पाँव पीछे हट गए। उसी सागर को श्रीहनुमान जी ने एक छलाँग में ही लाँघ दिया। श्रीहनुमान जी तो माना एक श्रेष्ठ व महान भक्त हैं। भगवान शंकर के अवतार भी हैं। वे समुद्र को एक छलाँग तो क्या, एक संकल्प मात्र में भी लाँघ सकते हैं। लेकिन प्रभु की कृपा अगर हो, तो श्रीहनुमान जी अथवा गरुड़ को भी छोडिए। एक नन्हां-सा कीट भी सागर को एक छलाँग में लाँघ सकता है। श्रीहनुमान जी को जब अजर व अमर होने का वरदान मिला, तो उन्होंने सोचा, कि माता सीता जी तो ममत्व का असीमित सागर हैं। साथ में वे संपूर्ण जगत की माता भी हैं। और माता के ममत्व का क्या है। आज मेरी झोली वरदानों से भर दी, कल अपनी किसी दूसरी प्रिय संताान की झोली भर देंगी। जब माता मुझ जैसे अपात्र को भरा पूरा कर सकती हैं, तो संसार में मुझे छोड़ कर तो सभी एक से एक पात्र हैं। उन्हें तो माता ने वरदानों से साज सज्जा करनी ही है। और यह भी निश्चित है, कि मुझे प्राप्त वरदान तो अवश्य ही, औरों को मिलने वाले वरदानों से सदैव निम्न ही रहेंगे। ऐसे में यह कहाँ निश्चित रह जायेगा, कि मैं सदा श्रेष्ठ को ही प्राप्त करुँगा। लेकिन हाँ! अगर मुझे प्रभु की कृपा प्राप्त हो, तो फिर तो मैं, शत प्रतिशत की बजाय, अनंत प्रतिशत आश्वस्त हो जाऊँगा, कि मैं निश्चित ही अपने निर्धारित लक्ष्य पर पहुँच पाऊँगा।

इसे भी पढ़ें: Gyan Ganga: हनुमानजी ने माता सीता के समक्ष अपना छोटा रूप ही क्यों धारण किया था?

श्रीहनुमान जी इसलिए भी माता सीता जी को बार-बार प्रणाम करते हैं कि प्रभु कृपा हो न हो, यह कोई निश्चित भी नहीं है। लेकिन जब साक्षात आदि शक्ति ने ही यह घोषणा कर दी, कि हे हनुमान! बाकी वरदान तो चलो ठीक हैं, तुम तो स्वाभाविक ही इन वरदानों के पात्र थे ही। लेकिन सबसे बड़ा वरदान तो यह है, कि प्रभु तुम पर सदैव अपनी कृपा बनाई रखें। तो अब तो यह निश्चित से भी निश्चित हो गया, कि मुझ पर प्रभ कृपा करेंगे ही। जिसका सीधा व सरल अर्थ हुआ, कि अब हर रण में विजय। मैं अपने नेत्र मूँद कर भी चलूँगा, तो मेरा मार्ग व लक्ष्य, स्वयं मेरे चरणों में आकर नत्मस्तक होंगे। वह कौन-सी दिशा होगी, जो मेरे अनुकूल नहीं होगी। कण-कण मेरा सहायक सिद्ध होगा। कारण कि प्रभु कृपा सागर में तैरती लकड़ी है, और मैं एक लोहे की तीखी कील। लोहे की कील की क्या बिसात कि वह सागर में तैर भी पाये। उसका स्वभाव तो डूबना है। लेकिन जब वही कील स्वयं को उस लकड़ी में जड़ा हुआ पाती है, तो लकड़ी के साथ, वह कील भी तैरने की कला सीख जाती है। बस हम वही कील हैं। जो कि अब कभी नहीं डूबेंगे और तैरते ही रहेंगे। क्योंकि माता सीता ने हमारे लिए, प्रभु कृपा का वरदान जो निर्धारित कर दिया है।

श्रीहनुमान जी ने देखा, कि मईया तो हम पर प्रसन्न हैं ही। तो क्यों न एक और आज्ञा का निवेदन कर लिया जाये। सज्जनों, श्रीहनुमान जी माता सीता जी को क्या निवेदन करते हैं। जानेंगे अगले अंक में---(क्रमशः)---जय श्रीराम।

- सुखी भारती

प्रमुख खबरें

Crude Oil सस्ता, फिर भी Petrol क्यों महंगा? मंत्री Hardeep Puri ने समझाया कीमतों का पूरा खेल

Thailand Tragedy: 11 साल के बच्चे ने 8 बौद्ध भिक्षुओं को रौंदा, तीर्थयात्रा पर थे सभी

Amazon Prime Day 2026: 4 जुलाई से शुरू होगी Amazon की सबसे बड़ी सेल, 500+ नए प्रोडक्ट्स और AI फीचर्स बनाएंगे शॉपिंग आसान

India Japan Forum: PM Modi की मौजूदगी में Sanae Takaichi ने 2 Trillion Yen के Mega Investment का किया ऐलान