By नीरज कुमार दुबे | Jul 16, 2026
भगवान श्रीकृष्ण को लेकर मौलाना जरजिस अंसारी का एक विवादित और भड़काऊ बयान सामने आने के बाद देश भर में आक्रोश फैल गया है। झारखंड में 23 जून को दिए गए उसके भाषण का वीडियो अब सोशल मीडिया पर तेजी से फैल रहा है। यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब श्रीकृष्ण जन्मभूमि का मामला पहले से ही चर्चा में है। कई हिन्दू संगठनों ने इस बयान को करोड़ों लोगों की आस्था पर सीधा प्रहार बताते हुए मौलाना की तत्काल गिरफ्तारी की मांग की है।
हालांकि मौलाना का यह दावा पूरी तरह निराधार और भ्रामक है। जिस श्लोक का उसने उल्लेख किया, उसका वास्तविक अर्थ योगी के एकांत में रहकर मन और इंद्रियों को वश में रखते हुए निरंतर ध्यान करने से जुड़ा है। इस श्लोक में न तो नमाज का कोई उल्लेख है, न इस्लाम का और न ही दिन में पांच बार प्रार्थना करने की कोई बात कही गई है। धार्मिक ग्रंथों की मनमानी व्याख्या कर लोगों की भावनाओं को भड़काने का यह प्रयास न केवल गैर जिम्मेदाराना है, बल्कि सामाजिक सौहार्द के लिए भी गंभीर खतरा है।
वैसे यह पहला अवसर नहीं है जब मौलाना जरजिस अंसारी अपने जहरीले और विवादित बयानों के कारण चर्चा में आया हो। इससे पहले भी उसका एक वीडियो सामने आया था, जिसमें वह मुस्लिम महिलाओं के बारे में बेहद आपत्तिजनक और अमानवीय बातें कहता दिखाई दिया था। उसने दावा किया था कि किसी भी परिस्थिति में पत्नी को अपने पति की यौन इच्छा से इंकार नहीं करना चाहिए, यहां तक कि प्रसव के समय भी नहीं। ऐसे बयान समाज में महिलाओं की गरिमा और अधिकारों के प्रति बेहद असंवेदनशील सोच को उजागर करते हैं।
इतना ही नहीं, मौलाना का नाम एक गंभीर आपराधिक मामले में भी सामने आ चुका है। वर्ष 2002 में वाराणसी की एक त्वरित अदालत ने वर्ष 2016 के दुष्कर्म मामले में उसे दस वर्ष के कारावास की सजा सुनाई थी। अदालत ने उस पर दस हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया। अभियोजन के अनुसार, पीड़िता ने आरोप लगाया था कि विवाह का झांसा देकर उसके साथ कई बार दुष्कर्म किया गया, अश्लील वीडियो बनाकर उसे धमकाया गया और लगातार ब्लैकमेल किया गया। इसी शिकायत के आधार पर उसके खिलाफ मामला दर्ज हुआ था।
देखा जाये तो बार बार भड़काऊ भाषण देना, धार्मिक ग्रंथों की मनमानी व्याख्या करना, महिलाओं के प्रति अपमानजनक सोच फैलाना और गंभीर आपराधिक मामलों में दोषी ठहराया जाना यह सब किसी भी जिम्मेदार धार्मिक व्यक्ति की पहचान नहीं हो सकती। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर समाज में जहर घोलने, आस्था का उपहास बनाने और लोगों को बांटने की छूट किसी को नहीं दी जा सकती। ऐसे मामलों में कानून का कठोर और निष्पक्ष पालन ही समाज में विश्वास और सौहार्द बनाए रखने का सबसे प्रभावी उपाय है।