2019 के लोकसभा चुनावों को इस तरह आकार दे रहे हैं मोबाइल एप्स

By प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क | May 06, 2019

दिल्ली। पिछले कुछ वर्षों में टेक्नोलॉजी भारतीय चुनावों का एक बड़ा और महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। 2014 के चुनावों ने भारतीय चुनाव के डिजिटल बाप्टिज्म को चिह्नित करने के लिए भाजपा ने सोशल मीडिया, डिजिटल कैम्पेन और यहां तक कि 3डी होलोग्राम का लाभ लिया था। अत्याधुनिक तकनीक के इस कॉम्बिनेशन ने उन्हें देश भर के मतदाताओं तक पहुंचने में मदद की, जिससे भाजपा ने शानदार जीत दर्ज की। इसने 2019 के चुनावों के लिए भी टोन सेट की है, जहां मोबाइल और डिजिटल एंगेजमेंट के प्रायमरी ड्राइवर बन गए हैं।

अब तक 2019 चुनावों के लिए अकेले चुनाव से जुड़े 50 ऐप लॉन्च किए गए हैं। यह संख्या चुनावों के करीब आने तक और बढ़ सकती है। सोशल मीडिया, व्हाट्सएप, ब्लॉग, माइक्रो-वीडियो जैसे कम्युनिकेशन प्लेटफार्म सीजन के फ्लेवर बन चुके हैं, जो मतदाताओं के व्यवहार को काफी हद तक प्रभावित कर रहे हैं। नीचे, हम देखेंगे कि भारतीय चुनाव तेजी से मोबाइल केंद्रित क्यों हो रहे हैं -

चुनाव के समय स्मार्टफोन के उपयोग और ऐप्स में वृद्धि

भारत में स्मार्टफोन पेनिट्रेशन रेट सबसे तेज और सबसे ज्यादा है और 2022 तक यह संख्या बढ़कर 500 मिलियन से अधिक यूजर्स तक पहुंचने का अनुमान है। काउंटरपॉइंट रिसर्च की एक रिपोर्ट के अनुसार, आज भारत में 450 मिलियन स्मार्टफोन उपयोगकर्ता हैं, जो 2014 के चुनावों के समय तकरीबन 155 मिलियन थे। मोबाइल फोन ने लगभग हर घर में अपनी पैठ बना ली है, जिससे वोटर के लिए कुछ क्लिक्स के साथ प्रासंगिक जानकारी ढूंढने और शेयर करना आसान हो गया है।

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विशेषज्ञ रिपोर्ट्स का कहना है कि जैसे ही 2019 के चुनावों की तारीखों की घोषणा हुई, चुनाव-आधारित ऐप्स के प्रति लोगों का ध्यान बढ़ता गया। चुनाव-आधारित और राजनीतिक पार्टी के एप्स की डाउनलोड संख्या में अचानक वृद्धि हुई। राजनीतिक दलों के अलावा चुनाव आयोग ने भी मतदाताओं तक पहुंचने के लिए एप लॉन्च किए हैं। इनमें से अधिकांश एप नागरिकों को उम्मीदवारों को रेट करने और रिव्यू करने की क्षमता देते हैं। साथ ही उन्हें मतदान की तारीखों, स्थान और प्रक्रियाओं आदि के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं। सभी एप्स में से नमो एप, चार्म्स ऐप और सीविजिल एप्स इस चुनावी सीजन में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले एप रहे हैं।

प्रमुख पार्टियां कम्युनिकेशन स्ट्रेटजी कैसे विकसित कर रही हैं?

2019 की चुनावी स्ट्रेटजी के तौर पर भारतीय राजनीतिक दल मतदाताओं का ध्यान खींचने और समर्थन हासिल करने के लिए पहले से कहीं अधिक प्रौद्योगिकी का लाभ उठा रहे हैं। लगभग हर पार्टी अपनी जीत की संभावनाएं बढ़ाने कई एप्स का इस्तेमाल कर रही है। विशेष रूप से दोनों प्रमुख दल इस स्ट्रेटजी को बहुत आक्रामक तरीके से आगे बढ़ा रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने नमो एप के साथ इस ट्रेंड की शुरुआत की, और कांग्रेस भी इसके बाद इस अभियान में शामिल हो गई।

भाजपा अपने नमो एप का उपयोग बड़े पैमाने पर सर्वेक्षण करने और नागरिकों और समर्थकों के साथ एंगेजमेंट बढ़ाने के लिए कर रही है। यह एप 13 भाषाओं को सपोर्ट करता है। इसमें एक्सक्लूसिव मर्चेंडाइज़ है जिसकी कीमत 5 रुपए से शुरू होती है। यूजर्स का प्रधानमंत्री की तस्वीर के साथ स्वागत किया जाता है, उनसे साइन अप करने और राष्ट्र निर्माण के लिए स्वयंसेवक के तौर पर मिशन में शामिल होने का आग्रह किया जाता है। कांग्रेस ह्यूमन रिसोर्सेस मैनेजमेंट सिस्टम (चार्म्स) कांग्रेस पार्टी का आधिकारिक एप है। पार्टी ने एआई-आधारित कम्युनिकेशन प्रोग्राम का उपयोग करके चीजों को एक पायदान पर ले लिया है, जिसमें पार्टी के 8,000 के करीब नेता शामिल हैं। पार्टी की योजना बूथ स्तर के अतिरिक्त नेताओं को जोड़ने की है। इसके साथ कार्यक्रम का उद्देश्य अधिकतम सदस्यों की संख्या तक प्रभावी ढंग से पहुंचना है।

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हालांकि, वे बल्क एसएमएस और इंटरेक्टिव वॉयस रिस्पांस (आईवीआरएस) जैसे स्टैंडर्ड चैनल्स का उपयोग कर रहे हैं। अब व्हाट्सएप भी इस सूची में जुड़ गया है। पार्टियां अपने मैसेज प्रचारित और प्रसारित करने के लिए इनका बड़े पैमाने पर उपयोग कर रही हैं। भाजपा और कांग्रेस दोनों ने समर्थन हासिल करने के लिए व्हाट्सएप पर ‘सेल फोन प्रमुख’ और ‘डिजिटल साथी’ जैसे कैम्पेन शुरू किए हैं। हाल की रिपोर्टों के अनुसार भाजपा के पास 200,000-300,000 व्हाट्सएप ग्रुप हैं, जबकि कांग्रेस लगभग 80,000 से 100,000 ग्रुप्स के साथ अपने फॉलोअर्स के बीच राजनीतिक संदेश फैला रही है।

पार्टियों की गतिविधियों पर निगरानी के लिए चुनाव आयोग के एप्स

हालांकि, ऐसा लग सकता है कि इस नए "एप वर्ल्ड" में राजनीतिक सामग्री पर कोई उचित नियंत्रण नहीं है, लेकिन चुनाव आयोग ने अलग से अपना एक एप भी विकसित किया है। नागरिकों द्वारा आदर्श आचार संहिता के किसी भी उल्लंघन की रिपोर्ट करने के लिए चुनाव आयोग ने ‘सिटीजंस विजिल’ या ‘सीविजिल’ एप लॉन्च किया गया है। इस तरह चुनाव आयोग यह सुनिश्चित कर रहा है कि मतदाताओं के हाथों में ताकत हो और वे भी चुनावों का सक्रिय हिस्सा बने रहे। एप के माध्यम से मतदाता अपने चारों ओर हो रहे आचार संहिता उल्लंघनों की रिपोर्ट करने के लिए तस्वीर या वीडियो ले सकते हैं। एप के लोकेशन सर्विस फीचर के जरिये उस लोकेशन को रिकॉर्ड किया जा सकता है ताकि उचित कार्रवाई की जा सके। चुनाव आयोग ने अन्य एप भी लॉन्च किए हैं, जैसे मतदाता हेल्पलाइन एप, ऑब्जर्वर ऐप और दिव्यांगों के लिए पीडब्ल्यूडी ऐप।

इस चुनावी मौसम में अन्य गैर-पार्टी एप्स

इस चुनावी मौसम में निजी कंपनियों ने भी कई एप लॉन्च किए हैं। ‘नेता एप’ एक नया एप है जिसने लोगों का ध्यान खींचा है। यह मतदाताओं को विधायकों और सांसदों के लिए रेटिंग्स, रैंकिंग और समीक्षाओं का आकलन और पोस्ट करने के विकल्प देता है। एप पर यूजर अपने निर्वाचन क्षेत्र के सांसद और विधायक उम्मीदवारों को देख सकते हैं और अपनी पसंद के उम्मीदवार के लिए वोट कर सकते हैं। यदि वे अपने मन को बदलना चाहते हैं तो यह एप उन्हें अपना वोट फिर से करने की अनुमति देता है। यूजर स्वयं के साथ ही अन्य राज्यों के परिणाम देख सकते हैं।

एक अन्य एप जो इस सीज़न में शीर्ष पर उभरा है, वह है 'ग्रुपटॉक'। यह हैदराबाद स्थित कंपनी टेलिबु द्वारा विकसित एक ऑडियो-कॉन्फ्रेंसिंग एप है। इस एप ने राजनीतिक दलों के लिए बड़े पैमाने पर जानकारी साझा करना आसान बना दिया है, क्योंकि वे इस एप के जरिये एक कॉल पर 5000+ पार्टी कार्यकर्ताओं से जुड़ सकते हैं।

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चूंकि, इन सभी एप और कम्युनिकेशन चैनल्स का उपयोग ज्यादातर मोबाइल फोन पर किया जा रहा है, इसलिए यह स्पष्ट है कि मोबाइल फोन की भूमिका 2019 के चुनावों और भविष्य के चुनावों में महत्वपूर्ण रहेगी। नई टेक्नोलॉजी आने से कम्युनिकेशन चैनल भी अगले स्तर पर पहुंच गए हैं। इन्होंने राजनीतिक दलों के लिए मतदाताओं से संवाद के तरीकों को बदल दिया है। टेक्नोलॉजी यह सुनिश्चित करती है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र ने अब डिजिटल करवट ली है। 

लेखकः कावेरी रेड्डी, वीपी, बिजनेस डेवलपमेंट एंड ऑपरेशंस, टेलिबु

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