मोबाइल-ए-मोहब्बत (व्यंग्य)

By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ | Feb 21, 2025

गाँव में दीनानाथ की चर्चा हर जगह थी, और इसका कारण था उनका एक अनोखा प्यार—मोबाइल फोन! उनकी पत्नी, ममता, अब इस मोहब्बत से तंग आ चुकी थी। एक दिन उसने ठान लिया, "बस करो, दीनानाथ! यह मोबाइल तुम्हें क्या दे रहा है? क्या तुम्हें मेरी बातों में कोई दिलचस्पी नहीं?" ममता ने दीनानाथ से विदुषी की तरह कहा, जैसे वो कोई महान विचारक हों।

ममता ने सोचा, "वाह, मेरे पति तो ज्ञान के समुंदर में तैर रहे हैं। शायद यह समझाने का सही समय है!" उसने कहा, “क्या तुम्हें याद है, जब हम गाँव के मेले में घूमते थे? उस समय तुम मुझसे बातें करते थे, हँसते थे। अब तुम तो बस अपने फोन में ही खोए रहते हो।"

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दीनानाथ की समझ में नहीं आ रहा था, “क्या मेरी पत्नी मुझसे ज़्यादा स्मार्ट है? ये तो अकल्पनीय है!” इसलिए उन्होंने जवाब दिया, “लेकिन मोबाइल फोन ने मुझे असीमित ज्ञान और मनोरंजन दिया है। तुम अपनी पुरानी बातों में उलझी हुई हो।”

अब दीनानाथ का गुस्सा भड़क गया। उन्होंने मोबाइल को ज़ोर से फेंका, जैसे वो किसी दुश्मन को मारने के लिए तैयार हों। “तुमने मेरा मोबाइल छुआ! यह मेरा अस्तित्व है!” उन्होंने गुस्से में चिल्लाते हुए कहा।

जैसे ही मोबाइल हवा में उड़ा, दीनानाथ ने सोचा, "अब ममता का मन बदल जाएगा।" लेकिन ममता ने तो मोबाइल को पकड़ लिया और कहा, “अब यह तुम्हारा नहीं रहा! तुमने इसे मुझसे छीनने की कोशिश की, तो अब मैं इसे अपने पास रखूँगी!”

दीनानाथ की आँखें आश्चर्य से फैल गईं। “क्या मेरी पत्नी ने इतनी हिम्मत की?” लेकिन गाँव में उस रात एक अजीब घटना हुई। ममता ने मोबाइल उठाया और देखा उसमें एक संदेश आया: “आपका पति दीनानाथ अब मोक्ष की ओर बढ़ चुके हैं।” यह पढ़कर ममता के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। “क्या? वह क्या कर रहे हैं?”

ममता ने गाँव वालों को बुलाया, और सबने पूछा, “क्या हुआ, ममता?” ममता ने कहा, “दीनानाथ तो मोबाइल से लड़ रहे हैं!” आँसू उनकी आँखों में थे।

गाँव के मुखिया ने कहा, “हमारे बीच एक मोबाइल की लड़ाई हो रही है, और यह निंदनीय है!” सभी ने सहमति जताई, “हमें इसे समाप्त करना होगा!” और अगले दिन गाँव के सभी लोग एकत्र हुए।

दीनानाथ ने यह सब सुना और सोचा, “क्या मैं सच में इतना बड़ा मूर्ख हूँ? क्या यह मोबाइल मुझसे ज़िंदगी की मिठास छीन रहा है?” तभी गाँव के बुजुर्ग, हरिशंकर बाबा, ने दीनानाथ को बुलाया। “बेटा, क्या तुम समझते हो कि यह मोबाइल तुम्हारे लिए क्या है?”

दीनानाथ ने कहा, “यह मेरी ज़िंदगी है, बाबा!” हरिशंकर बाबा ने कहा, “और क्या तुम जानते हो, बेटा, कि जीवन का असली सुख क्या है?” दीनानाथ चुप रहे।

“जीवन का असली सुख तो परिवार में है, मित्रता में है, और प्यार में है। यह मोबाइल केवल तुम्हें दिखाता है, लेकिन यह तुम्हें महसूस नहीं कराता। क्या तुम्हें याद है, जब तुमने ममता को शादी के समय एक फूल दिया था?” दीनानाथ की आँखों में आँसू आ गए।

“हाँ, बाबा, मुझे याद है।”

हरिशंकर बाबा ने फिर कहा, “तो बेटा, क्या तुम अब भी अपने मोबाइल की बजाय उस प्यार को चुनोगे?” गाँव में सभी की आँखों में आँसू थे।

दीनानाथ ने फैसला किया कि वह मोबाइल को छोड़ देगा। लेकिन उसे यह नहीं पता था कि ममता ने उसे छोड़ने का फैसला कर लिया था। दीनानाथ ने अपने पुराने प्यार को वापस पाने का फैसला किया, लेकिन अब ममता ने कहा, “मुझे लगता है, तुम्हारी भक्ति का समय खत्म हो गया है। मैं अब तुम्हें नहीं चाहती।”

यह सुनकर दीनानाथ का दिल टूट गया। गाँव में सबके सामने उनकी इस स्थिति ने सभी को हँसने के बजाय रुला दिया। अब यह किस्सा एक मजेदार कहानी बन गया—कैसे दीनानाथ अपने मोबाइल के लिए अपनी पत्नी को खो बैठे।

इस प्रकार, योगेंद्र गिरी की मठिया में एक नई कहानी गूंजने लगी। यह कहानी केवल एक मोबाइल फोन के लिए संघर्ष की नहीं थी, बल्कि यह एक जीवन के मूल्य को समझने की थी। 

अब जब लोग गाँव में मिलते हैं, तो दीनानाथ की कहानी सुनाते हैं, और हर बार सुनाते समय उनकी आँखों में आँसू आ जाते हैं। इसलिए, प्रिय पाठकों, जब आप अगली बार अपने मोबाइल के साथ वक्त बिताने का मन बनाते हैं, तो याद रखिए, जीवन का असली सुख उस प्रेम और रिश्तों में है जो आपके आसपास हैं। क्योंकि मोबाइल को छोड़कर भी, आप अपने जीवन को पूरी तरह से जी सकते हैं।

- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’,

(हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

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