By अभिनय आकाश | Sep 11, 2026
लगातार बदलते हुए वैश्विक हालातों में जहां पल-पल अनिश्चितता और अराजकता के बादल मंडरा रहे हैं। ऐसे में हाल ही में जहां किर्गिस्तान की राजधानी बिकेक पे एससीओ का समिट खत्म हुआ। जहां दुनिया की तीन बड़ी महाशक्तियों जिनमें चीन, रूस और भारत शामिल है जो कि तीनों एशिया में हैं। उनके बड़े नेता वहां पर मौजूद रहे। चाहे चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग हो, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन हो या भारत के प्रधानमंत्री मोदी हो। ऐसे में अब बारी है एक और समिट की जो कि दिल्ली में चल रही है। 18वां ब्रिक्स सम्मेलन जिसमें शामिल होने के लिए रूस के राष्ट्रपति शी जिनपिंग दिल्ली पहुंच चुके हैं। वहीं चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भी भारत आने की तैयारियां जोर शोर से चल रही है। बैक चैनल से भी, डिप्लोमेटिक चैनल से भी। अगर ऐसा होता है तो फिर यह ऐतिहासिक होगा। क्योंकि अगर जिनपिंग भी भारत आते हैं तो यह करीब 7 साल के बाद उनकी भारत की पहली यात्रा होगी।
ब्रिक्स दुनिया की प्रमुख उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं और विकासशील देशों का एक प्रभावशाली अंतर सरकारी संगठन है। इसके सदस्य शुरुआत में तो ब्राजील, रूस, भारत और चीन रहे यानी कि ब्रिक। लेकिन बाद में एक साल के बाद ही 2010 में दक्षिण अफ्रीका भी शामिल हुआ और इसे ब्रिक्स कहा जाने लगा। इसके बाद हाल ही के वर्षों में कई अन्य देश भी इसके साथ जुड़े। जिसमें इसकी कुल संख्या 10 प्रमुख देशों की हो चुकी है। नए सदस्य देशों में मिस्र, इथियोपिया, ईरान और यूएई शामिल है। इसका मकसद वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद यानी कि जीडीपी और व्यापार में अपनी हिस्सेदारी को मजबूत करना है। न्यू डेवलपमेंट बैंक यानी कि एनडीबी के माध्यम से बुनियादी ढांचा और विकास परियोजनाओं को बढ़ावा देना है। और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों जैसे कि विश्व बैंक यानी कि वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ जैसे तमाम जो संगठन है संस्थान हैं वहां पर विकासशील देशों की बेहतर आवाज और सुधार सुनिश्चित करना है।
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का स्थान लगातार बढ़ रहा है। वजह साफ है। जब भी दुनिया पर संकट आया हमेशा भारत ने मदद का हाथ बढ़ाया। खास बात यह भी है कि भारत सिर्फ अपने लिए आवाज नहीं उठाता बल्कि भारत तो विकासशील देशों यानी कि ग्लोबल साउथ की मजबूत आवाज भी बन गया है। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे देश भारत को अपने हितों के पैरोकार के तौर पर देखते हैं क्योंकि भारत एक ही समय में अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ यानी कि जैसे क्वाड जैसे संगठन है जिसमें जापान, ऑस्ट्रेलिया भी शामिल है या फिर G7 में भी आमंत्रित देशों के तौर पर सही। लेकिन लगभग हर बार शामिल होता आ रहा है। वहां पर यूरोप के देश भी मौजूद रहते हैं। फ्रांस, जर्मनी, इटली जबकि ब्रिक्स और एससीओ जैसे मंचों पर रूस और चीन के साथ संबंध निभा रहा है भारत। यह संतुलित कूटनीति ही साबित करती है कि भारत स्वतंत्र विदेश नीति का पालन करता है। साथ ही भारत वैश्विक व्यापार और वित्तीय सुधारों में भी अपनी डिजिटल ताकत का लोहा मनवा रहा है। भारत का यूपीआई डिजिटल भुगतान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लेनदेन को आसान बनाने में बड़ी अहम भूमिका निभा रहा है।
भारत और चीन दोनों के बीच सीमा विवाद आज का नहीं है बल्कि दशकों पुराना है। दोनों के बीच एक बार जंग भी हो चुकी है 1962 में और दोनों के सैनिकों के बीच कई बार झड़पें भी हुई। डोकलाम गलवान इसका ताजा उदाहरण है। फिर भी चीन के साथ हमारा व्यापार बढ़ता जा रहा है। लेकिन इसमें ज्यादा फायदा चीन को है। भारत को नुकसान है। ऐसे में अगर राष्ट्रपति शनिपिंग भारत आते हैं तो उसमें एलएसी पर शांति और सीमा विवाद सबसे मुख्य मुद्दा हो सकता है। दोनों देश सीमा पर ऐसी व्यवस्था बनाने पर बात कर रहे हैं जिससे किसी सैन्य घटना या तनाव का असर द्विपक्षीय रिश्तों पर ना पड़े। जिनपिंग की संभावित यात्रा से पहले एनएसए अजीत डोभाल सीमा मुद्दे पर 25वें दौर की विशेष प्रतिनिधि वार्ता के लिए बीजिंग जा चुके हैं। वहां पर उनकी चीन के विदेश मंत्री वांग ही से मुलाकात भी हुई और चीन के उपराष्ट्रपति से भी मुलाकात हुई। दोनों देश वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी कि एलएसी पर चीन निर्धारण की प्रक्रिया में जो सीमा का निर्धारण है उसमें तेजी लाने और ठोस नतीजे पाने के लिए सहमत हुए हैं। साथ ही सीमा पर किसी भी तनाव को बढ़ने से रोकने के लिए नए सैन्य संपर्क चैनल और हॉट लाइन स्थापित करने का भी फैसला लिया गया है। हालांकि वर्ष 2020 की गलवान घाटी की घटनाओं के बाद से रिश्तों में खटास आई है। अविश्वास पैदा हुआ है। उसे पूरी तरीके से खत्म करने में भी समय लगेगा।
ब्रिक (BRIC) की शुरुआत 2009 में ब्राज़ील, रूस, भारत और चीन के एक अनौपचारिक समूह के तौर पर हुई थी। यह समूह वित्तीय व्यवस्था में सुधार के मकसद से बना था, जिसे ज़्यादातर लोग पश्चिमी देशों के पक्ष में झुका हुआ मानते थे।
2010 में दक्षिण अफ़्रीका इस समूह में शामिल हुआ, जिसके बाद इसका नाम बदलकर ब्रिक्स (BRICS) कर दिया गया। शुरुआती सालों में, यह समूह मुख्य रूप से मैक्रो-इकोनॉमिक और डेवलपमेंट फ़ाइनेंस से जुड़े मुद्दों पर तालमेल बिठाने वाले मंच के तौर पर काम करता था। इस दिशा में इसकी सबसे ठोस उपलब्धि 2014 में 'न्यू डेवलपमेंट बैंक' की स्थापना थी। 2024 में, ब्रिक्स ने चार नए पूर्ण सदस्य देशों — मिस्र, इथियोपिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) — को शामिल किया और 2025 में इंडोनेशिया इसका पूर्ण सदस्य बना। ब्रिक्स के सहयोगी देशों में बेलारूस, बोलीविया, क्यूबा, कजाकिस्तान, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड, युगांडा, उज्बेकिस्तान और वियतनाम शामिल हैं। सऊदी अरब को इस समूह का पूर्ण सदस्य माना जाता है; हालाँकि, देश ने अभी तक इसमें शामिल होने के अपने इरादे की औपचारिक घोषणा नहीं की है, जिससे उसकी स्थिति स्पष्ट नहीं है। अफ्रीका, दक्षिण एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया, पश्चिम एशिया, मध्य एशिया और लैटिन अमेरिका तक फैले इस समूह में दुनिया की 49.5 प्रतिशत आबादी रहती है, और यह वैश्विक जीडीपी का 40 प्रतिशत तथा वैश्विक व्यापार का 26 प्रतिशत हिस्सा है। अगले कुछ सालों में, जैसे-जैसे ब्रिक्स का विस्तार हुआ, इसका एजेंडा भी बढ़ा। इसमें आतंकवाद-रोधी सहयोग, टेलीकम्युनिकेशन, कृषि, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा, श्रम, और बहुपक्षीय संगठनों व वित्तीय प्रणालियों में सुधार जैसे मुद्दे शामिल किए गए। रूस की अध्यक्षता में हुए 2024 कज़ान शिखर सम्मेलन में 'क्रिटिकल मिनरल्स' (महत्वपूर्ण खनिज) औपचारिक रूप से ब्रिक्स के एजेंडे का हिस्सा बने। कज़ान शिखर सम्मेलन में जियोलॉजिकल प्लेटफॉर्म बनाने को भी मंज़ूरी दी गई, हालाँकि इसे अभी तक पूरी तरह से लागू नहीं किया गया है।
ब्रिक्स सदस्य देशों के पास 'क्रिटिकल मिनरल वैल्यू चेन' में खास खूबियां हैं। इनमें एनर्जी ट्रांज़िशन, डिफेंस अपग्रेडेशन, आर्थिक प्रतिस्पर्धा और डिजिटलाइज़ेशन के लिए ज़रूरी अनछुए भंडार से लेकर मिडस्ट्रीम प्रोसेसिंग, कैपिटल एक्सपेंडिचर और बड़े कंज्यूमर मार्केट तक शामिल हैं। अगर इन खूबियों को एक साथ लाया जाए, तो यह ब्लॉक वैल्यू चेन को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है। अभी यह चेन बिखरी हुई है; जिन देशों के पास अनछुए भंडार हैं, उनके पास प्रोसेसिंग की क्षमता नहीं है, जबकि जिन देशों में कंज्यूमर डिमांड और कैपिटल है, उनके पास रिसोर्स की कमी है। ब्रिक्स सदस्य देशों के पास रेयर अर्थ एलिमेंट्स (REE) के बड़े भंडार हैं। इनमें चीन के पास सबसे बड़ा और ब्राज़ील के पास दूसरा सबसे बड़ा भंडार है। साथ ही, इनके पास ग्रेफाइट के भी बड़े भंडार हैं। ब्राज़ील के पास लिथियम और कॉपर के भी काफी भंडार हैं। अकेले इंडोनेशिया दुनिया के निकेल उत्पादन का आधे से ज़्यादा हिस्सा पैदा करता है और कोबाल्ट का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। भारत में REE और ग्रेफाइट का काफ़ी भंडार है। रूस और दक्षिण अफ़्रीका प्लेटिनम ग्रुप की धातुओं के मुख्य उत्पादक हैं। रूस के पास निकेल और तांबे का भी बड़ा भंडार है। ब्रिक्स (BRICS) के सहयोगी देशों के पास भी खनिजों का बड़ा भंडार है। बोलीविया 'लिथियम ट्राएंगल' का हिस्सा है, जिसके पास दुनिया का आधे से ज़्यादा लिथियम भंडार है। साथ ही, कजाकिस्तान में यूरेनियम का सबसे बड़ा भंडार है और वह यूरेनियम का प्रमुख उत्पादक है; इसके अलावा, वह तांबे का भी एक महत्वपूर्ण उत्पादक है। वियतनाम में भी REE और ग्रेफाइट का काफ़ी भंडार है।
एक भरोसेमंद पार्टनर के तौर पर भारत की पहचान कोई नई बात नहीं है। गुटनिरपेक्ष रहने की परंपरा, 'ग्लोबल साउथ' की आवाज़ बनने का लंबा इतिहास और चीन के उलट, छोटे या गरीब देशों के खिलाफ़ संसाधनों पर निर्भरता का इस्तेमाल कूटनीतिक हथियार के तौर पर न करने का रिकॉर्ड — इन सब वजहों से नई दिल्ली को सिर्फ़ संसाधन निकालने वाली ताकत के बजाय एक डेवलपमेंट पार्टनर के तौर पर देखा जाता है।भारत विकासशील और विकसित दुनिया के बीच एक ईमानदार बातचीत करने वाले देश के तौर पर उभरा है, और यह भूमिका भरोसे पर टिकी है। भारत ने अपनी इस स्थिति का इस्तेमाल जयपुर में ब्रिक्स 2026 ट्रेड मिनिस्टर्स की मीटिंग और नई दिल्ली में ब्रिक्स एनवायरनमेंट मिनिस्टर्स की 12वीं मीटिंग में ज़रूरी मिनरल्स को सहयोग का ज़रिया बनाने के लिए किया है। मंत्रियों की मीटिंग से आगे बढ़कर, भारत लंबे समय से ज़रूरी मिनरल्स को सहयोग का ज़रिया बनाने की वकालत करता रहा है। उसने जियोलॉजिकल प्लेटफ़ॉर्म को पूरी तरह से चालू करने की भी पैरवी की है, जिसके ज़रिए ब्रिक्स देशों के बीच डेटा-शेयरिंग, निकालने की टेक्नोलॉजी और जियोलॉजिकल रिसर्च में सहयोग हो सके।