By नीरज कुमार दुबे | Oct 27, 2026
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीति का प्रभाव आज भारत के उन देशों के साथ बढ़ते रिश्तों में भी दिखाई दे रहा है, जो भौगोलिक आकार में छोटे, लेकिन आर्थिक सामर्थ्य, तकनीकी दक्षता और वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं। लिकटेंस्टाइन के वंशानुगत राजकुमार और कार्यवाहक राष्ट्राध्यक्ष प्रिंस एलोइस की 25 से 28 अक्टूबर तक की भारत यात्रा इसी बदलते कूटनीतिक परिदृश्य का महत्वपूर्ण उदाहरण है। लिकटेंस्टाइन की भारत की पहली राजकीय यात्रा के रूप में चिह्नित इस दौरे का संदेश स्पष्ट है कि भारत केवल बड़े देशों के लिए ही नहीं, बल्कि यूरोप की उन्नत अर्थव्यवस्थाओं के लिए भी दीर्घकालिक आर्थिक और तकनीकी साझेदारी का प्रमुख केंद्र बन चुका है।
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इस यात्रा की सबसे महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि भारत और यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ (EFTA) के बीच हुआ व्यापार एवं आर्थिक साझेदारी समझौता यानी TEPA है। मार्च 2024 में लगभग 16 वर्षों की वार्ता के बाद हस्ताक्षरित यह समझौता अक्टूबर 2025 में लागू हुआ। EFTA में स्विट्जरलैंड, नॉर्वे, आइसलैंड और लिकटेंस्टाइन शामिल हैं। इस समझौते के तहत इन देशों ने अगले 15 वर्षों में भारत में 100 अरब डॉलर के निवेश का लक्ष्य रखा है।
देखा जाये तो यहां मोदी सरकार की कूटनीति की सफलता केवल व्यापारिक रियायतों तक सीमित नहीं है। भारत ने एक ओर अपने विशाल बाजार और कुशल मानव संसाधन को वैश्विक निवेश के अवसर में बदला है, वहीं दूसरी ओर यूरोप की पूंजी, विशेषज्ञता और उन्नत तकनीक के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था में संभावनाओं का विस्तार किया है। हालांकि, निवेश का लक्ष्य वास्तविक उपलब्धि में बदलना प्रभावी क्रियान्वयन और निजी क्षेत्र की भागीदारी पर निर्भर करेगा।
देखा जाये तो लगभग 160 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाला लिकटेंस्टाइन आकार में भले छोटा हो, लेकिन इसकी औद्योगिक विशेषज्ञता, उच्च गुणवत्ता वाले विनिर्माण, वित्तीय सेवाओं और तकनीकी नवाचार की क्षमता इसे भारत के लिए उपयोगी साझेदार बनाती है। भारत और लिकटेंस्टाइन के बीच सहयोग उन्नत विनिर्माण, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, शिक्षा, वित्तीय सेवाओं और नवाचार के क्षेत्रों में नए अवसर खोल सकता है।
रणनीतिक दृष्टि से भी इस रिश्ते का महत्व कम नहीं है। भारत के लिए यूरोप के साथ व्यापक आर्थिक जुड़ाव, निवेश स्रोतों का विविधीकरण और उन्नत औद्योगिक तकनीकों तक पहुंच उसकी दीर्घकालिक आर्थिक सुरक्षा तथा सामरिक स्वायत्तता को मजबूत कर सकती है। वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में विविधता और भरोसेमंद साझेदारियों का विस्तार भारत की विनिर्माण क्षमता तथा निर्यात प्रतिस्पर्धा के लिए भी महत्वपूर्ण है।
हम आपको बता दें कि भारत और लिकटेंस्टाइन ने 1993 में राजनयिक संबंध स्थापित किए थे और 2023 में दोनों देशों ने संबंधों के 30 वर्ष पूरे किए। प्रिंस एलोइस की फरवरी 2026 में AI इम्पैक्ट समिट में भागीदारी और अब राजकीय यात्रा इस संवाद को निरंतरता देती है। राजघाट पर महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि देकर उन्होंने शांति और अहिंसा की विरासत के प्रति सम्मान भी व्यक्त किया।
बहरहाल, प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति की उल्लेखनीय विशेषता यह है कि वह भारत के वैश्विक संबंधों को केवल पारंपरिक महाशक्तियों तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उन देशों के साथ भी सहयोग बढ़ाती है जिनके पास विशिष्ट आर्थिक और तकनीकी क्षमताएं हैं। लिकटेंस्टाइन की यात्रा इसी व्यापक दृष्टिकोण को रेखांकित करती है। अब असली कसौटी यह होगी कि उच्चस्तरीय वार्ताओं और TEPA से पैदा हुए अवसरों को कितनी तेजी से निवेश, तकनीकी हस्तांतरण, रोजगार और ठोस कारोबारी परिणामों में बदला जाता है।