By अंकित सिंह | Dec 01, 2023
मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर नतीजा 3 दिसंबर को घोषित किए जाएंगे। लेकिन तेलंगाना में विधानसभा चुनाव संपन्न होते ही पांच राज्यों के एग्जिट पोल आ गए। हालांकि, सबसे ज्यादा चर्चा राजस्थान और मध्य प्रदेश को लेकर है। मध्य प्रदेश में भाजपा बीच के 18 महीना को छोड़ दें तो लगभग 20 सालों से सत्ता में है। बड़ा सवाल यही है कि मध्य प्रदेश में एक बार फिर से भाजपा को शासन का मौका मिलेगा या फिर कांग्रेस का दांव चल जाएगा। एग्जिट पोल को देखें तो कहीं ना कहीं ज्यादातर में भाजपा को बढ़त मिलती हुई दिखाई दे रही है तो वहीं कुछ एग्जिट पोल में कांटे की टक्कर का अनुमान है।
मध्य प्रदेश में अगर एग्जिट पोल ही एग्जैक्ट पोल में तब्दील होते हैं तो बड़ा सवाल यही रहेगा कि इतने लंबे शासन के बाद भी ऐसा क्या रहा जो भाजपा के पक्ष में चला गया? ऐसे में राजनीतिक विश्लेषक अभी से ही दो चीजों का जिक्र करना नहीं भूल रहे हैं। पहला है लाडली बहना योजना। भाजपा के लिए यह गेम चेंजर साबित हुई है तो वहीं मुख्यमंत्री के तौर पर शिवराज सिंह चौहान का चेहरा कमलनाथ पर भारी पड़ गया है। विश्लेषकों का दावा है कि महिला वोटर्स इस बार मध्य प्रदेश में पूरी तरीके से भाजपा के साथ खड़ी थीं। पुरुषों के मुकाबले इस बार चुनाव में महिलाओं ने ज्यादा मतदान किया है। लाडली बहना योजना के तहत एक करोड़ 31 लाख महिलाओं के खाते में शिवराज सरकार 1250 रुपए की दो किस्त दे चुकी है। इसके साथ ही राजनीतिक विश्लेशको का यह भी दावा है कि भले ही शिवराज सिंह चौहान को भाजपा ने मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित नहीं किया था लेकिन जनता यह मनाती है कि राज्य में अगर भाजपा जीतती है तो मामा ही मुख्यमंत्री बनेंगे।
मध्य प्रदेश को लेकर पहले से ही दावा किया जा रहा था कि राज्य में भाजपा बैक फुट पर है। हालांकि भाजपा ने उन सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा काफी पहले कर दी जहां पार्टी कमजोर है। इसके साथ ही पार्टी ने तीन केंद्रीय मंत्री और सात सांसदों को भी चुनावी मैदान में उतार दिया। इसके साथ ही राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय को भी मुश्किल सीट से मैदान में उतरा गया। पार्टी ने खुलकर हिंदुत्व की पिच पर बैटिंग की। अमित शाह लगातार एमपी के दौरे पर जाते रहे और कहीं ना कहीं बंद कमरे में पार्टी पदाधिकारी के साथ बैठक करते रहे। साथ ही साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चेहरा भी एमपी में काम करता दिखाई दे रहा है। मोदी ने सियासी फिजा को बदलने में अपनी पूरी ताकत लगाई और राज्य में ताबड़तोड़ 14 रैलियें को संबोधित किया। भाजपा ने राज्य में माइक्रो मैनेजमेंट पर जोर दिया। इसके अलावा पार्टी की ओर से दलित, आदिवासी, ओबीसी, सामान्य व अन्य जातियों का भी ध्यान रखा गया और पूरी तरीके से सोशल इंजीनियरिंग करने के बाद ही उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में उतर गया।