महंगाई को काबू करने में पूरी तरह विफल नजर आ रही है मोदी सरकार

By रमेश सर्राफ धमोरा | Mar 28, 2022

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के दौरान ही लोगों को आशंका होने लगी थी कि जैसे ही चुनावी नतीजे आएंगे उसके बाद देश के आम जनता को एक बार फिर महंगाई की मार झेलनी पड़ेगी। चुनाव के नतीजे आते ही लोगों की आशंका सही साबित हुई और केंद्र सरकार ने पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में बढ़ोतरी करनी शुरू कर दी। चुनावी नतीजों के बाद से अब तक पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कई बार बढ़ोतरी की जा चुकी है। वहीं घरेलू गैस सिलेंडरों की कीमतों में भी 50 रुपये प्रति सिलेंडर की बढ़ोतरी हो चुकी है।

चुनाव के दौरान वोट लेने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी चुनावी सभाओं में जनता के लिए बड़ी-बड़ी लुभावनी घोषणाएं करते हैं। मगर जैसे ही चुनावी प्रक्रिया समाप्त हो जाती है। उसके बाद देश की आम जनता को महंगाई के डबल डोज का सामना करना पड़ता है। ऐसी दोमुंही बातों से देश के आम आदमी का जीना ही मुहाल हो गया है। देश में खाद्य पदार्थों की कीमतें पहले ही आसमान छू रही हैं। प्रतिदिन काम में आने वाली वस्तुओं की कीमतों में हर दिन बढ़ोत्तरी हो रही है। आटे, दाल, चावल, फल, सब्जियों की कीमत अचानक ही बहुत बढ़ गई है। वहीं खाने का तेल भी लोगों की पहुंच से दूर होता जा रहा है। मौजूदा परिस्थितियों में देश के गरीब व मध्यम वर्ग का गुजर बसर करना मुश्किल हो गया है।

अनाज, दाल, तेल, और ईंधन के बाद अब देश में दवाएं भी महंगी हो सकती हैं। अप्रैल से अधिसूचित दवाओं के करीब 10 फीसदी तक दाम बढ़ सकते हैं। राष्ट्रीय दवा मूल्य नियामक थोक मूल्य सूचकांक में हुए बदलाव से अधिसूचित दवाओं की कीमतें बढ़ाने की इजाजत दे सकता है। अधिसूचित दवाएं आवश्यक दवाओं की राष्ट्रीय सूची में आती हैं। इसमें एंटीबायोटिक, विटामिन, मधुमेह, रक्तचाप नियंत्रक सहित अन्य दवाएं आती हैं।

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देश में एक तरफ जहां लगातार महंगाई बढ़ती जा रही है वहीं रोजगार के अवसर कम होते जा रहे हैं। चुनाव के दौरान सरकार लाखों लोगों को नई नौकरियां देने की घोषणाएं करती है। मगर नई नौकरी की बात करना तो दूर जो लोग रिटायर हो रहे हैं सरकार उनके पदों को ही समाप्त कर नई नौकरियों के अवसर को समाप्त करती जा रही है। ऐसे में युवाओं के और अधिक बेरोजगार होने की संभावना में बढ़ोतरी होती जा रही है।

केंद्र सरकार का पूरा ध्यान निजीकरण की तरफ होने से पढ़े-लिखे शिक्षित बेरोजगारों में बेरोजगारी की आशंका व्याप्त हो रही है। शिक्षित युवाओं को लगने लगा है कि आने वाले समय में सरकार के भरोसे उन्हें रोजगार मिलने वाला नहीं है। सरकारी नौकरियों में खुलेआम बंदरबांट हो रही है। बड़ी पहुंच और पैसों के बल पर ही सरकारी नौकरियां मिल रही हैं। ऐसे में आम गरीब का बेटा नौकरी की आस ही छोड़ चुका है। महंगाई के साथ ही देश में भ्रष्टाचार चरम पर है। सरकारी कर्मचारियों पर कोई नियंत्रण नहीं है। इस कारण वे बेखौफ होकर आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं।

केंद्र में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनी थी तब देश की जनता को लगा था कि अब भ्रष्टाचार पर नियंत्रण हो जाएगा। मगर कुछ समय तक भ्रष्टाचार रोकने की बातें होती रही उसके बाद वही पुरानी व्यवस्थाएं चलने लगीं। आज कोई भी नेता भ्रष्टाचार रोकने की बातें नहीं करता है। सबको अपना भविष्य सुरक्षित बनाने की चिंता लगी हुई है। ऐसे में सब अपने को आर्थिक रूप से सुदृढ़ करने में लगे हुए हैं।

प्रारम्भ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भ्रष्टाचार रोकने के लिए बड़ी-बड़ी बातें किया करते थे। मगर अब लगता है कि वह भी पुराने ढर्रे में ढल गए हैं। उनको भी लगने लगा है कि इस देश में भ्रष्टाचार रोकना उनके बस की बात नहीं है। केंद्र के साथ ही भाजपा शासित राज्यों में आए दिन भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े स्कैंडल उजागर हो रहे हैं। मध्य प्रदेश में व्यापमं घोटाले का भूत अभी भी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह का पीछा नहीं छोड़ रहा है। भ्रष्टाचार के कारण राजस्थान में वसुंधरा राजे व छत्तीसगढ़ में डॉ. रमन सिंह को अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी थी। मगर उससे भी किसी ने सबक नहीं लिया लगता है।

खाद्य उत्पादों की कीमतों में तेजी की वजह से फरवरी में खुदरा मुद्रास्फीति बढ़कर 6.07 प्रतिशत पर पहुंच गई। यह आठ महीनों का सबसे ऊंचा स्तर है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय की तरफ से हाल ही में जारी आंकड़ों के मुताबिक फरवरी 2022 में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित खुदरा मुद्रास्फीति की दर 6.07 प्रतिशत रही। यह लगातार दूसरा महीना है जब खुदरा मुद्रास्फीति भारतीय रिजर्व बैंक के संतोषजनक स्तर से ऊपर बनी हुई है।

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इसके पहले जनवरी 2022 में भी खुदरा मुद्रास्फीति की दर 6.01 प्रतिशत रही थी। वहीं फरवरी 2021 में यह 5.03 प्रतिशत पर रही थी। इसके पहले फरवरी में थोक मूल्य पर आधारित मुद्रास्फीति के बढ़ने के आंकड़े भी आए। इन आंकड़ों के मुताबिक थोक मुद्रास्फीति बढ़कर 13.11 प्रतिशत पर पहुंच गई। आंकड़ों से पता चलता है कि फरवरी में खुदरा महंगाई बढ़ने की मुख्य वजह खाद्य उत्पादों की कीमतों में 5.89 प्रतिशत की बढ़ोतरी रही। जनवरी के महीने में यह 5.43 प्रतिशत बढ़ी थी। अनाज के दाम 3.95 प्रतिशत बढ़े और मांस एवं मछली 7.45 प्रतिशत तक महंगे हो गए। वहीं फरवरी में अंडों के दाम 4.15 प्रतिशत बढ़े हैं। सब्जियों के दामों में 6.13 प्रतिशत और मसालों में 6.09 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई थी। फलों की कीमतें जनवरी की तुलना में 2.26 प्रतिशत ही बढ़ीं थी।

रिजर्व बैंक को सरकार की तरफ से मुद्रास्फीति की दर को छह प्रतिशत के भीतर सीमित रखने का दायित्व मिला हुआ है। रिजर्व बैंक ने अगले वित्त वर्ष में खुदरा महंगाई को 4.5 प्रतिशत तक सीमित रखने का लक्ष्य तय किया है। वहीं चालू वित्त वर्ष के लिए यह अनुमान 5.3 प्रतिशत का है। मई 2020 से ही रिजर्व बैंक ने मुद्रास्फीति को काबू में रखने के लिए नीतिगत ब्याज दरों में कोई बढ़ोतरी नहीं की है। सरकार के पास महंगाई बढ़ने के हर तर्क मौजूद है, मगर उन्हें रोकने का एक भी उपाय नहीं है। महंगाई ने खासकर खाने-पीने की वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि ने गरीब व मध्यवर्ग के लोगों का जीना मुहाल कर दिया है। मगर सरकार कुछ भी नहीं कर पा रही है। यदि महंगाई इसी तरह से बढ़ती रही तो देश में गरीब आदमी के पास तो मरने के अलावा अन्य कोई रास्ता ही नहीं बचेगा। केन्द्र सरकार को समय रहते महंगाई को रोकने की दिशा में प्रभावी कदम उठाने चाहिये जिससे आम आदमी में सरकार के प्रति बढ़ते आक्रोश को रोका जा सकें। वरना यही आम आदमी यदि सरकार के खिलाफ उठ खड़ा हुआ तो उसे सत्ता से उखाड़ फेंकने में देर नहीं लगेगी।

-रमेश सर्राफ धमोरा

(लेखक राजस्थान सरकार से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं। इनके लेख देश के कई समाचार पत्रों में प्रकाशित होते रहते हैं)

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