आर्थिक मंदी से निपटने की बजाय सरकार को कैब, एनआरसी की चिंता है

By डॉ. वेदप्रताप वैदिक | Dec 16, 2019

संसद ने किसी कानून को स्पष्ट बहुमत से पारित किया हो और उसके खिलाफ इतना जबर्दस्त आंदोलन चल पड़ा हो, ऐसा स्वतंत्र भारत के इतिहास में कम ही हुआ है। ये तो नरेंद्र मोदी की किस्मत है कि इस समय देश में कोई अखिल भारतीय नेता नहीं है, वरना इस सरकार को लेने के देने पड़ जाते। इस नए नागरिकता कानून को पिछले हफ्ते तक सिर्फ मुस्लिम-विरोधी बताया जा रहा था लेकिन अब मालूम पड़ रहा है कि बंगाल और पूर्वोत्तर के सभी प्रांतों के हिंदू लोग लट्ठ लेकर इसके पीछे पड़ गए हैं।

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सरकार ने इस फर्जी मुद्दे को तूल देकर अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश को तो एक मंच पर ला ही दिया है, वह भारत के सभी विरोधी दलों को भी एकजुट होने का बहाना दे रही है। सर्वोच्च न्यायालय में इस नागरिकता कानून को रद्द करवाने के लिए दर्जनों याचिकाएं रोज़ लग रही हैं। यह तो स्पष्ट है कि इस सरकार के पास न तो इतना विवेक है और न ही आत्म-विश्वास कि वह इस कानून को वापस ले ले। इस सरकार की इज्जत बचाने का काम अब सिर्फ न्यायपालिका के जिम्मे है। उसी के हाथ में है कि दल-दल में फंसी भाजपा सरकार को वह किसी तरह से बाहर निकाले। यह कानून ऐसा है, जो भाजपा के माथे पर सांप्रदायिकता का काला टीका तो जड़ ही देता है, भारत को भी बदनाम करता है। यह कानून सिर्फ मुस्लिम-विरोधी होता तो पूर्वोत्तर भारत के हिंदू इसका विरोध क्यों कर रहे हैं ? यह वास्तव में इंसानियत-विरोधी है। कोई भी इंसान किसी भी जाति, धर्म, वंश या रंग का हो और यदि वह पीड़ित है तो उसे शरण देना किसी भी सभ्य देश का कर्तव्य है। लेकिन हर गैर-मुस्लिम को पीड़ित मान लेना कहां की बुद्धिमानी है ?

-डॉ. वेदप्रताप वैदिक

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