By नीरज कुमार दुबे | Mar 03, 2026
मध्य पूर्व में जारी संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा बाजारों में अस्थिरता बढ़ा दी है। अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने कच्चे तेल की आपूर्ति को प्रभावित किया है, जिसका सीधा असर तेल आयात पर निर्भर देशों पर पड़ रहा है। इस बीच, दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा आयातकों में शामिल भारत ने संभावित आर्थिक झटके से निपटने के लिए तैयारी तेज कर दी है। हम आपको बता दें कि विशेष चिंता का विषय Strait of Hormuz है, जो वैश्विक तेल आपूर्ति का एक प्रमुख समुद्री मार्ग है। खाड़ी क्षेत्र से निकलने वाला बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता है। यदि यह मार्ग बाधित होता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आ सकता है। इसका असर भारत की आयात लागत, चालू खाता घाटे और महंगाई दर पर पड़ सकता है।
सरकारी सूत्रों के अनुसार, भारत ने एहतियातन कई कदमों पर विचार शुरू कर दिया है। पेट्रोल और डीज़ल के निर्यात को सीमित करने की रणनीति तैयार की जा रही है ताकि घरेलू बाजार में ईंधन की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके। तेल विपणन कंपनियों को पर्याप्त भंडार बनाए रखने और जरूरत पड़ने पर आपूर्ति प्राथमिकता से घरेलू उपभोक्ताओं को देने के निर्देश दिए गए हैं।
भारत के पास वर्तमान में सीमित रणनीतिक भंडार है। अनुमान है कि कच्चे तेल का भंडार लगभग 17–18 दिनों की जरूरत पूरी कर सकता है, जबकि पेट्रोल और डीज़ल का स्टॉक करीब तीन सप्ताह तक चल सकता है। यदि संकट लंबा खिंचता है, तो सरकार को वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों पर अधिक निर्भर होना पड़ सकता है।
इसी दिशा में भारत ने रूस सहित अन्य देशों से अतिरिक्त कच्चा तेल आयात बढ़ाने के विकल्पों पर विचार किया है। बीते वर्षों में रूस से रियायती दरों पर तेल खरीद भारत के लिए लाभदायक साबित हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि आपूर्ति स्रोतों का विविधीकरण इस संकट के समय महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इसके साथ ही LPG और LNG आपूर्ति भी चिंता का विषय है, क्योंकि भारत अपनी खपत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। यदि समुद्री परिवहन में व्यवधान आता है, तो घरेलू गैस वितरण पर दबाव बढ़ सकता है। इस स्थिति से निपटने के लिए सरकार घरेलू उत्पादन बढ़ाने और वैकल्पिक आपूर्ति शृंखलाओं को सक्रिय करने पर जोर दे रही है।
आर्थिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो इसका असर महंगाई, परिवहन लागत और औद्योगिक उत्पादन पर पड़ेगा। इससे विकास दर पर भी दबाव आ सकता है। हालांकि सरकार का दावा है कि वह बाजार की स्थिति पर लगातार नजर रखे हुए है और जरूरत पड़ने पर त्वरित हस्तक्षेप करेगी।
निर्यात क्षेत्र को भी संभावित जोखिमों के बारे में सतर्क किया गया है। परिवहन लागत में वृद्धि और आपूर्ति श्रृंखला में बाधा से व्यापार प्रभावित हो सकता है। सरकार ने निर्यातकों को आश्वासन दिया है कि आवश्यक वित्तीय और नीतिगत समर्थन उपलब्ध कराया जाएगा।
कुल मिलाकर, मध्य पूर्व का यह संघर्ष केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक आर्थिक चुनौती बनता जा रहा है। भारत ने समय रहते रणनीतिक कदम उठाने शुरू कर दिए हैं, ताकि ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता को बनाए रखा जा सके। आने वाले दिनों में अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम यह तय करेंगे कि संकट कितना गहरा होता है और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसका कितना व्यापक असर पड़ता है।