By नीरज कुमार दुबे | Feb 21, 2026
नई दिल्ली के हैदराबाद हाउस में आज वह तस्वीर दिखी जिसने वैश्विक शक्ति संतुलन की दिशा में नया संकेत दे दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा की मौजूदगी में भारत और ब्राजील ने क्रिटिकल मिनरल्स और रेयर अर्थ पर समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए। साथ ही इस्पात आपूर्ति शृंखला को मजबूत करने के लिए भी महत्वपूर्ण समझौता हुआ। यह आपूर्ति शृंखला की मजबूती, सामरिक स्वावलंबन और आर्थिक शक्ति के नए युग की घोषणा है।
प्रधानमंत्री मोदी ने साफ शब्दों में कहा कि क्रिटिकल मिनरल्स पर हुआ समझौता मजबूत और लचीली आपूर्ति शृंखला बनाने की दिशा में बड़ा कदम है। रक्षा क्षेत्र में बढ़ता सहयोग दोनों देशों के बीच भरोसे और रणनीतिक तालमेल का प्रमाण है। उन्होंने अगले दस वर्षों में द्विपक्षीय व्यापार को बीस अरब डॉलर से आगे ले जाने का लक्ष्य दोहराया। ब्राजील पहले ही लैटिन अमेरिका में भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, अब यह संबंध नई ऊंचाई छूने को तैयार है।
राष्ट्रपति लूला ने भी भारत की प्रौद्योगिकी क्षमता की खुलकर सराहना की। सूचना प्रौद्योगिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जैव प्रौद्योगिकी और अंतरिक्ष अनुसंधान जैसे क्षेत्रों में भारत की प्रगति को उन्होंने भविष्य की साझेदारी का आधार बताया। उनके साथ आए मंत्रियों और उद्योग जगत के प्रतिनिधियों का बड़ा दल यह संकेत देता है कि यह मित्रता केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक और औद्योगिक धरातल पर भी मजबूत हो रही है।
हम आपको बता दें कि ब्राजील लौह अयस्क, मैंगनीज, निकल और नियोबियम जैसे खनिजों का विश्व के प्रमुख उत्पादकों में है। भारत की इस्पात उत्पादन क्षमता 218 मिलियन टन तक पहुंच चुकी है और आधारभूत ढांचे के विस्तार के साथ इसकी मांग लगातार बढ़ रही है। ऐसे समय में ब्राजील के साथ खनन, प्रसंस्करण, पुनर्चक्रण और उन्नत तकनीक पर सहयोग भारत को कच्चे माल की स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित करेगा।
वहीं, क्रिटिकल मिनरल्स समझौता केवल उद्योग की जरूरत नहीं, बल्कि सामरिक आवश्यकता है। विश्व में रेयर अर्थ उत्पादन पर चीन का लगभग एकाधिकार रहा है। भारत लंबे समय से निर्भरता कम करने की रणनीति पर काम कर रहा है। ब्राजील के साथ यह साझेदारी उस रणनीति को ठोस आधार देती है। इससे भारत की रक्षा, ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहनों, अंतरिक्ष और उच्च तकनीक उद्योगों को स्थायी आपूर्ति मिलेगी।
देखा जाये तो भारत और ब्राजील की यह साझेदारी केवल द्विपक्षीय नहीं है। यह ग्लोबल साउथ की सामूहिक आवाज को मजबूती देती है। जब दो बड़े लोकतंत्र खनिज, ऊर्जा, कृषि, स्वास्थ्य और तकनीक में हाथ मिलाते हैं तो वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं का समीकरण बदलता है। पश्चिमी शक्तियों और चीन के बीच चल रही प्रतिस्पर्धा के दौर में यह समझौता तीसरे ध्रुव की संभावना को मजबूत करता है।
ऊर्जा क्षेत्र में जैव ईंधन, नवीकरणीय ऊर्जा और सतत उड्डयन ईंधन पर सहयोग हरित भविष्य की दिशा में कदम है। आपदा प्रतिरोधी अवसंरचना और जलवायु अनुकूल कृषि में साझा पहल विकासशील देशों के लिए उदाहरण बन सकती है। स्वास्थ्य और औषधि क्षेत्र में सस्ती और गुणवत्तापूर्ण दवाओं की आपूर्ति ब्राजील के लिए लाभकारी होगी, वहीं भारतीय औषधि उद्योग को विशाल बाजार मिलेगा।
वहीं रक्षा क्षेत्र में बढ़ता तालमेल हिंद महासागर और दक्षिण अटलांटिक क्षेत्र में सामरिक संतुलन को प्रभावित करेगा। समुद्री सुरक्षा, संसाधन संरक्षण और तकनीकी साझेदारी से दोनों देश अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार कर सकते हैं।
देखा जाये तो भारत की विदेश नीति पिछले कुछ वर्षों में आत्मविश्वास और स्पष्टता के साथ आगे बढ़ी है। प्रधानमंत्री मोदी ने यह सिद्ध किया है कि मित्रता केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि दीर्घकालिक रणनीतिक निवेश होती है। ब्राजील के साथ बढ़ती निकटता इसी सोच का परिणाम है। मोदी की नीति बहु ध्रुवीय विश्व व्यवस्था में संतुलित और स्वायत्त भूमिका की है। एक ओर पश्चिमी देशों से गहरे संबंध, दूसरी ओर रूस से सामरिक तालमेल और साथ ही वैश्विक दक्षिण के देशों के साथ सघन सहयोग। ब्राजील के साथ क्रिटिकल मिनरल्स और इस्पात समझौता इसी व्यापक दृष्टि का हिस्सा है। यह संदेश स्पष्ट है कि भारत अपने औद्योगिक और सामरिक भविष्य को किसी एक स्रोत पर निर्भर नहीं छोड़ेगा।
इस साझेदारी से भारत को कच्चे माल की सुरक्षा, नई तकनीक, निवेश और बाजार मिलेगा। ब्राजील को भारत की तकनीकी दक्षता, औषधि आपूर्ति, डिजिटल ढांचा और विशाल उपभोक्ता बाजार का लाभ मिलेगा। दोनों देश मिलकर वैश्विक मंचों पर संस्थागत सुधार, आतंकवाद के विरोध और विकासशील देशों की आवाज को मजबूती देंगे।
यह समझौता एक रणनीतिक घोषणा है कि भारत अपने पक्के दोस्तों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा है। आने वाले वर्षों में यदि यह सहयोग योजनाओं से निकलकर जमीन पर उतरता है तो यह एशिया और लैटिन अमेरिका के बीच नए शक्ति सेतु का निर्माण करेगा। यही वह दिशा है जिसमें भारत आत्मनिर्भर, प्रभावशाली और निर्णायक वैश्विक शक्ति के रूप में उभर सकता है।
-नीरज कुमार दुबे