By एकता | Nov 08, 2026
ईरान के नेताओं और कट्टरपंथी गुटों ने अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी की भारी हार के बाद वॉशिंगटन पर दबाव बढ़ा दिया है। तेहरान का कहना है कि यह सियासी झटका साफ दिखाता है कि अमेरिका पिछले 8 महीने से जारी युद्ध में अपने मकसद हासिल करने में पूरी तरह नाकाम रहा है।
सबसे तीखा हमला ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सेक्रेटरी मोहसिन रजाई ने बोला। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर ट्रंप प्रशासन का मजाक उड़ाते हुए लिखा, "आप युद्ध भी हार गए और चुनाव भी। वेंस ने हार मान ली है, रुबियो बाहर होने वाले हैं, हेगसेथ को हटाया जाने वाला है और सेंटकॉम कमांडर अब पॉडकास्टर बन गए हैं! तो फिर, वॉशिंगटन में हमें असल में अपना संदेश किसे देना चाहिए?" तेहरान का मानना है कि ट्रंप अब अपने ही देश में घिर चुके हैं और युद्ध रोकने के लिए उन्हें भारी कीमत चुकानी होगी।
अमेरिकी चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी की शिकस्त ने ईरानी कट्टरपंथियों को एक बड़ा मौका दे दिया है। उनका दावा है कि इस जंग में ईरान पहले ही जीत हासिल कर चुका है। ईरान के रूढ़िवादी नेता और मीडिया संस्थान सरकार पर दबाव बना रहे हैं कि वह वॉशिंगटन के सामने बिल्कुल न झुके और ऐसा समझौता करे जिससे पूरे मिडिल ईस्ट में पावर बैलेंस बदल जाए।
सुप्रीम लीडर मुजतबा खामेनेई ने भी चुनावी नतीजों के बाद अपने रुख को कड़ा करते हुए बातचीत में शामिल ईरानी प्रतिनिधियों को "सरेंडर की तरफ जरा सा भी झुकाव न रखने" की हिदायत दी है। वहीं कट्टरपंथी मीडिया आउटलेट 'राजा न्यूज' ने लिखा, "ईरानी लोगों की उपलब्धियों को अमेरिका को आसान एग्जिट देकर कमजोर नहीं किया जाना चाहिए। युद्ध टालने का इकलौता तरीका अपनी ताकत बढ़ाना, अमेरिका और एनर्जी मार्केट पर दबाव बनाना और दुश्मन को पछताने पर मजबूर करना है।"
तेहरान की यह आक्रामकता तब सामने आई है जब खुद डोनल्ड ट्रंप और उनके वाइस प्रेसिडेंट जे.डी. वेंस ने मध्यावधि चुनावों में हार का ठीकरा इस जंग पर फोड़ा। फॉक्स न्यूज से बातचीत में ट्रंप ने माना कि पार्टी की हार में इस युद्ध की बड़ी भूमिका रही है। वहीं जे.डी. वेंस ने 'एक्स' पर दो टूक लिखा, "हमारी हार का सबसे बड़ा कारण यह युद्ध है।"
ईरान के रूढ़िवादी खेमे ने इन बयानों को हाथों-हाथ लिया है। उनका तर्क है कि जंग ने न केवल वॉशिंगटन को कोई सैन्य बढ़त नहीं दिलाई, बल्कि खुद अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए अपने देश में बड़ा संकट खड़ा कर दिया है।
आठ महीने बीत जाने के बाद भी यह संघर्ष किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सका है। सैन्य मोर्चे पर जंग सुस्त पड़ चुकी है और राजनयिक कोशिशों में भी कोई बड़ा ब्रेकथ्रू नहीं मिला है। ईरानी वार्ताकार कतर की मध्यस्थता में तेहरान और दोहा के बीच लगातार चक्कर काट रहे हैं, ताकि ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम और सीजफायर पर बात बन सके।
इस बीच, अमेरिकी सेना ने ईरान के केशम आइलैंड पर हमले किए हैं, जिसमें गुरुवार रात की एयरस्ट्राइक भी शामिल है। हालांकि दोनों पक्षों ने बातचीत को पटरी पर रखने के लिए इन हमलों को ज्यादा तूल नहीं दिया। इसके बावजूद ट्रंप ने आगे और सैन्य कार्रवाई के संकेत देते हुए पत्रकारों से कहा, "हम तय कर रहे हैं कि आगे बढ़ना है या नहीं। अगर मुमकिन हुआ तो मैं बाकी देश को तबाह नहीं करना चाहूंगा, लेकिन शायद मुझे ऐसा करना पड़े। आपको जल्द ही पता चल जाएगा।"
चुनावी नतीजों के बाद खाड़ी देशों में डिप्लोमैटिक हलचल काफी तेज हो गई है। कतर के मुताबिक, ट्रंप ने अमीर शेख तमीम बिन हमद अल थानी से फोन पर तनाव कम करने को लेकर चर्चा की है। वहीं, ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने सऊदी अरब, यूएई, कतर, ओमान और तुर्की समेत कई देशों के विदेश मंत्रियों से संपर्क साधा है।
तेहरान ने 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' को दोबारा खोलने के लिए 7 सख्त शर्तें रख दी हैं। इनमें सभी मोर्चों पर तुरंत युद्ध रोकना, जंग के नुकसान का हर्जाना देना, अमेरिकी फौजों की पूरी वापसी और सभी आर्थिक प्रतिबंधों को हटाना शामिल है। हालांकि, वॉशिंगटन इनमें से किसी भी शर्त को मानने के मूड में है या नहीं, यह अभी साफ नहीं है।