राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बहुत जरूरी है संचार उपकरणों पर निगरानी

By राजेश कश्यप | Dec 24, 2018

भाजपा की नरेन्द्र मोदी सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए देश में किसी भी व्यक्ति या संस्था कम्प्यूटरों, व अन्य संचार उपकरणों मोबाईल, मैसेज, ईमेल आदि की निगरानी करने का अधिकार देश की दस प्रमुख सुरक्षा एवं खुफिया एजेंसियों को देने का निर्णय ले लिया है। केन्द्र सरकार के इस निर्णय पर सियासी बवाल मचना ही था। अब सत्ता पक्ष एवं विपक्ष में आरोप−प्रत्यारोप का नया दौर शुरू हो चुका है। कौन सही है और कौन गलत, इसकी समीक्षा पूरी गम्भीरता और ईमानदारी से होनी चाहिए। इसके लिए, सियासी फायदे या नुकसान को किनारे रखकर राष्ट्रहित में चिंतन करने की आवश्यकता है।

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केन्द्र सरकार ने सूचना प्रोद्यौगिकी अधिनियम (आईटी एक्ट) की धारा 69 के तहत देश की अधिकृत दस प्रमुख सुरक्षा एवं खुफिया एजेंसियों को किसी भी संस्थान या व्यक्ति पर देश विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का शक होने पर उनके कम्प्यूटर संसाधन से उत्पन्न, प्रेषित, प्राप्त अथवा संग्रहित किसी भी जानकारी को जांचने, रोकने, निगरानी व डीकोड करने का अधिकार दिया है। इन दस अधिकृत एजेंसियों में खुफिया ब्यूरो (आईबी), नारकोटिग्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी), प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी), राजस्व खुफिया निदेशालय (डीआरआई), केन्द्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई), राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए), रिसर्च एण्ड एनालिसिस विंग (रॉ), सिग्नल खुफिया निदेशालय (जम्मू-कश्मीर, पूर्वोत्तर व असम राज्य में सक्रिय) और दिल्ली पुलिस शामिल हैं। देश की इन दस जिम्मेदार सुरक्षा एवं खुफिया एजेंसियों को संदिग्ध व्यक्ति अथवा संस्था पर किसी तरह का कोई शक होता है तो इस आईटी एक्ट की धारा 69 के तहत आवश्यक कानूनी कार्यवाही करने का भी अधिकार दिया गया है। उल्लेखनीय है कि इस प्रक्रिया को अमल में लाने के लिए गृह सचिव की अनुमति लेनी आवश्यक होगी और जांच रिपोर्ट कैबिनेट सचिव की अगुवाई वाली समिति को प्रस्तुत करनी होगी। इस समिति की हर दो महीने में बैठक होगी। गृह मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि जांच एजेंसियों को दिए गए अधिकारों के दुरूपयोग को रोकने के ठोस उपाय किए गए हैं।

केन्द्र सरकार के इस निर्णय पर विपक्षी पार्टियां ताव खा चुकी हैं। विपक्षी नेताओं ने तीखी प्रतिक्रिया दी हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने इसे अघोषित आपातकाल की संज्ञा दी है तो माकपा महासचिव सीताराम येचुरी ने इसे असंवैधानिक कदम बताया है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर सीधा हमला बोलते हुए उन्हें 'असुरक्षित तानाशाह' की संज्ञा दे डाली है। इसके साथ ही कांग्रेस पार्टी ने इस मुद्दे का विरोध सड़क से लेकर संसद तक करने का ऐलान कर दिया है। कांग्रेस के इस ऐलान की हवा वित्तमंत्री अरूण जेटली ने यह खुलासा करके निकाल दी है कि यह कानून एवं नियम वर्ष 2009 में यूपीए सरकार ने ही बनाया था और तय किया था कि इसके लिए किन−किन एजेंसियों को अधिकृत किया जाए। भला इसमें नया क्या है? पहले भी राष्ट्रीय सुरक्षा व अखण्डता को खतरा पैदा करने वाले संदिग्ध मामलों में जांच करने एवं आवश्यक कार्यवाही करने के अधिकार देश की सुरक्षा एजेंसियों को प्राप्त थे।

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दोनों पक्ष स्पष्ट हो चुके हैं। केन्द्र सरकार के दावों में दम है या विपक्ष के दावे सही हैं, यह गौर करने का विषय है। इसमें दो राय नहीं है कि देश की सुरक्षा के मामले में किसी तरह का कोई समझौता नहीं होना चाहिए। राष्ट्रीय सुरक्षा को चुनौती देने वाले संभावित खतरों से निपटने के लिए ठोस कदम उठाना सरकार का प्रथम कर्त्तव्य होना चाहिए। इसे भी नकारा नहीं जा सकता है कि समय के साथ सुरक्षा चुनौतियां बदलती रहती हैं। बदलते दौर के साथ बदलती चुनौतियों का जवाब देश की सरकार के पास होना ही चाहिए। सर्वविदित है कि आज कम्प्यूटर व इंटरनेट का जमाना है। सोशल मीडिया का प्रभुत्व स्थापित हो चुका है। इससे सूचना क्रांति को जितना बढ़ावा मिला है, उतना ही नुकसान भी झेलना पड़ा है। देशद्रोही व असामाजिक लोग एवं संगठन अनेक तरह की राजनीतिक, धार्मिक, जातिगत अफवाहों वाले सन्देश घर बैठे फैलाकर देश में साम्प्रदायिक दंगे करवाने व कानून व्यवस्था को चौपट करवाने का गंदा खेल खेलने लगे हैं।

आपराधिक प्रवृति के लोग कानून व्यवस्था के लिए चुनौती बन जाते हैं। उनके कम्प्यूटरों एवं मोबाईलों के माध्यम से राष्ट्र विरोधी एवं गैर−कानूनी और भ्रामक सामग्रियां एक संचार उपकरण से दूसरे संचार उपकरण के माध्यम से सहज साझा हो रही हैं। देखते ही देखते देश में लोगों की भावनाओं को भड़का कर आग भड़काई जाने लगी है। सामाजिक सौहार्द और कानून व्यवस्था को सरेआम तार−तार कर दिया जाता है। प्रधानमंत्री तक को निशाने पर लेने के लिए साजिशें रची जाती हैं। ऐसे में यदि संदिग्ध लोगों व संस्थाओं की काली करतूतों को समय रहते रोकने व दोषियों को सलाखों के पीछे भेजने के लिए संवैधानिक व्यवस्था स्थापित की जाती है तो उसमें गलत क्या है? यदि केन्द्र सरकार ऐसी व्यवस्था स्थापित करने में नाकाम रहती है और राष्ट्रीय सुरक्षा पर कोई आघात हो जाता है तो फिर उसका सीधा दोष केन्द्र सरकार पर मंढना लाजिमी है। यदि केन्द्र सरकार अपनी जिम्मेदारियों के प्रति सचेत है और समय रहते राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति ठोस कदम उठा रही है तो उसका विरोध करने की बजाय सराहना होनी चाहिए।

देश की सुरक्षा के सन्दर्भ में केन्द्र सरकार द्वारा उठाये गए कदमों में यदि कोई असंवैधानिक कदम शामिल है तो उसे विपक्ष को उजागर करना चाहिए और देशहित में अपने सकारात्मक सुझाव स्पष्ट रूप से रखने चाहिए। सिर्फ सियासत के नजरिए से राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता करने का दबाव एकदम निन्दनीय दिखाई देता है। देश के किसी भी नागरिक को नहीं भूलना चाहिए कि राष्ट्रीय सुरक्षा व अखण्डता बनाए रखने के लिए हर स्तर पर सहयोग करना उनका प्रथम कर्त्तव्य है। देश के 125 करोड़ लोगों के मोबाईलों/कम्प्यूटरों की नियमित तांकझांक करना, असंभव कार्य है। सिर्फ राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में संलिप्त संदिग्ध संस्थाओं व लोगों के काले कारनामों पर संवैधानिक तरीके से नकेल डालने के प्रयास असंवैधानिक कैसे हो सकते हैं? 

अब समय आ गया है कि संकीर्ण सियासत को रोका जाए और राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी जाए। जब तक हर व्यक्ति अपने देश के राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा के प्रति सजग नहीं होगा और अपना यथोचित योगदान सुनिश्चित नहीं करेगा, तब तक देश से संकीर्ण सियासत समाप्त होनी असंभव है। राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में केन्द्र सरकार का यह कदम देश विरोधी ताकतों के दिलों में डर पैदा करेगा। वे राष्ट्र विरोधी गतिविधियों को संचालित करने से पहले सौ बार सोचेंगे। उनकी काली करतूतें बनने से पहले ही दम तोड़ने लगेंगी तो निश्चित तौर पर उनके हौसले पस्त होंगे और राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूती मिलेगी। 

-राजेश कश्यप

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं समीक्षक हैं।) 

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