Champaran Satyagraha | बिहार से निकला वो आंदोलन जिसने मोहनदास को महात्मा बनाया | Matrubhoomi

By अभिनय आकाश | Sep 25, 2025

साल 1917 को भारत की आजादी की लड़ाई में एक नया मोड़ आया। अफ्रीका में लड़ाई लड़ने के बाद एक दुबला, पतला सा शख्स अंग्रेजों से भिड़ गया। इस साल उसने एक ऐसा आंदोलन खड़ा किया, जिसने अंग्रेजो को समझा दिया कि उनके लिए आगे की राह मुश्किल होने वाली है। हम बात महात्मा गांधी और भारत में उनके पहले आंदोलन चंपारण सत्याग्रह की कर रहे हैं। बिहार के चंपारण में किसानों के खिलाफ होने वाले अत्याचार के खिलाफ ये आंदोलन हुआ था। आज आपको इसी आंदोलन की कहानी सुनाएंगे। नील की खेती ने बिहार सहित देश के कई किसानों को किस तरह से हाशिये पर धकेल दिया था। किसानों पर इस कदर जुल्म बढ़ गया था कि गरीबी और भुखमरी उनकी जिंदगी का हिस्सा बन गई थी। ऐसे में महात्मा गांधी एक किसान के आग्रह पर बिहार आते हैं और वहां उन्होंने चंपारण में किसानों की मांग उठाने का काम किया। क्या थी तिनकठिया प्रथा जिसके विरोध में ये आंदोलन हुआ, कैसे इस आंदोलन से गांधी जी के महात्मा बनने का सफर शुरू हुआ। 

क्या थी तिनकठिया प्रथा

बिहार के चंपारण में अंग्रेज़ों द्वारा भारतीय किसानों पर लादी गई एक प्रथा थी, जिसके तहत उन्हें अपनी 3/20वें भूमि पर नील की खेती करना अनिवार्य था। यह प्रथा जबरन खेती से जुड़ी थी और किसानों के शोषण का प्रतीक थी। 

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चंपारण सत्याग्रह क्यों हमारे इतिहास का एक अहम पड़ाव है?

पहले मोहनिया फिर मोहन और इसके बाद मोहन दास और आखिर में महात्मा। जी हां, दक्षिण अफ्रीका में मोहन दास करमचंद गांधी तो वकालत करने गए थे। लेकिन 21 साल तक वहां रंग-भेद से लेकर हिंदुस्तानियों से होने वाली ज्यादतियों के खिलाफ एक ऐसी लड़ाई लड़ी की हिंदुस्तान लौटने से पहले ही वो पूरी दुनिया में हीरो हो चुके थे। जिसके बाद महात्मा गांधी 9 जनवरी 1915 में हिंदुस्तान लौटे और उनकी इसी वतन वापसी ने हिंदुस्तान का इतिहास बदल दिया। चंपारण भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का एक पड़ाव भर नहीं है। 107 साल पहले की ये घटना भारतीयों के नवजागरण, स्वराज और स्वाबलंबन की तरफ एक बड़ा कदम है। 

दो जरूरत आपस में मिली और गांधी चंपारण पहुंचे 

परेशान किसान, बेहला जनता और लोगों पर भारी टैक्स का बोझ के बीच 10 अप्रैल 1917 को जब महात्मा गांधी बिहार के मुजफ्फरपुर पहुंचे तो उनके एजेंडे में ये तीन मुद्दे प्रमुख थे। चंपारण के लोग उनका बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। बदहाल जनता को एक मसीहा की जरूरत थी जो उनके कष्ट हर ले। इधर गांधी अपने सत्याग्रह के अस्त्र को आजमाना चाहते थे। यानी चंपारण को गांधी की जरूरत थी और गांधी को चंपारण जैसे हालात की जहां से वो शोषण और हिंसा के खिलाफ अहिंसा का रण छेड़ सके। 15 अप्रैल 1917 को गांधी जी चंपारण पहुंचे। यहां उन्होंने पाया कि गांव में गंदगी की कोई सीमा न थी। गलियों में कचरा, कुंएं के आसपास कीचड़ और बदबू वहीं आंगन तो इतने गंदे की देखे न जा सके। 

चंपारण सत्याग्रह की जीत

चंपारण सत्याग्रह की पहली जीत तब हुई जब अंग्रेजी हुकूमत ने गांधी के आगे झुकते हुए मुकदमा वापस ले लिया और जांच में सहयोग करने का आदेश दिया। इसके बाद, प्रांतीय सरकार ने भी किसानों पर अत्याचार के खिलाफ जांच के लिए एक समिति बना दी। गांधी जी को समिति में जगह मिली और उन्होंने किसानों के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी।

चंपारण सत्याग्रह का महत्व

यह पहला किसान आंदोलन था जिसने देशव्यापी ध्यान आकर्षित किया और कई मायनों में भारत के जनसमूह को ब्रिटिश उपनिवेशवादियों के विरुद्ध मुक्ति संग्राम में शामिल होने के लिए प्रेरित किया। पारण के परिणाम ने राजनीतिक स्वतंत्रता की अवधारणा और उसके प्रति दृष्टिकोण को पुनर्परिभाषित किया, जिससे संपूर्ण ब्रिटिश-भारतीय समीकरण में एक जीवंत मोड़ आया। चंपारण सत्याग्रह वह आंदोलन था जिसने गांधीजी को भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन की अग्रिम पंक्ति में ला खड़ा किया और सत्याग्रह को नागरिक प्रतिरोध का एक शक्तिशाली साधन बनाया। इसे महात्मा गांधी के निष्क्रिय और अहिंसक प्रतिरोध के राजनीतिक प्रयोग के जन्म की दिशा में पहला महत्वपूर्ण कदम माना जाता है।

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