By अनन्या मिश्रा | Oct 13, 2026
बिहार के कैमूर जिले के पवरा पहाड़ी पर मां मुंडेश्वरी मंदिर है। जोकि अद्भुत शक्तिपीठ होने के अलावा भारत का सबसे पुराना जीवित मंदिर है। इस मंदिर का निर्माण करीब 108 ईस्वी में किया गया था। स्थापत्य और आस्था दोनों के नजरिए से यह मंदिर बेहद खास है। मंदिर में मां मुंडेश्वरी की अष्टभुजा वाली प्रतिमा स्थापित है। सुरक्षा और सिद्धि प्राप्ति के लिए मां मुंडेश्वरी की पूजा-अर्चना की जाती है। वहीं मंदिर में एक शिवलिंग भी स्थापित है, जिस वजह से यह शैव और शक्त दोनों संप्रदायों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।
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मां मुंडेश्वरी मंदिर अपनी प्राचीनता के अलावा बलि देने के अनोखे तरीके के लिए भी जाना जाता है। यहां पर खासतौर पर बिना खून बहाए बकरे की सात्विक बलि भी दी जाती है।
इसके बाद बकरे को जीवित छोड़ दिया जाता है। वहीं इस मंदिर में स्थित पंचमुखी शिवलिंग को लेकर भी यह मान्यता है कि इसका रंग हमेशा बदलता रहता है। वहीं यह दुनिया के पुराने चालू मंदिरों में से एक है।
मंदिर तक पैदल जाने के लिए सीढ़ियों की भी व्यवस्था है। वहीं मंदिर तक पहुंचने के लिए करीब 500-600 सीढ़ियां चढ़नी होती हैं। वहीं मंदिर पहाड़ी पर स्थित है जोकि करीब 608 फीट ऊपर है।
सीढ़ियों के अलावा ऊपर जाने के लिए वाहन और सड़क मार्ग की भी व्यवस्था है। मां मुंडेश्वरी का वाहन महिष है, क्योंकि मां मुंडेश्वरी को वाराही देवी के रूप में पूजा जाता है।
हिंदू धर्म के पवित्र देवी ग्रंथ दुर्गा सप्तशती में कथा आती है कि चंड-मुंड के नाश के बाद देवी मां उग्र हो गई थीं। तो चंड को मारने के बाद मुंड देवी से युद्ध करते हुए इसी पहाड़ी के पीछे जा छिपा और यहां पर देवी ने उसका वध किया था।
इस कारण देवी मां उनको मुंडेश्वरी के नाम से पूजते हैं। यहां पर पूजा की परंपरा आज से नहीं बल्कि 1900 सालों से लगातार चली आ रही है।