By अरुण अर्णव खरे | Jan 17, 2022
चुनाव के समय पहले एक पार्टी से दूसरी पार्टी में जाने वालों की भगदड़ मचती थी। आयाराम गयाराम की नृत्यनाटिका शुरु हो जाती थी। किसी का अपनी पार्टी के सिद्धांतों से मोहभंग होता था तो किसी के दिल में दूसरी पार्टी के प्रति रातोंरात निष्ठा जाग्रत हो जाती थी। इसे राजनीति की चलताऊ भाषा में पाला बदलना कहा जाता था और पाला बदलने वालों के कृत्य को हृदय परिवर्तन। कोरोना काल में बहुत चीजें बदल गई सो अब राजनीति में पाला बदलने के लिए भगदड़ नहीं मचती। अब राजनीति में म्युटेशन होता है। नेताओं के नए-नए वैरियेंट सामने आने लगते हैं। इनके रूप और चोला बदलने की प्रकृति हर प्रतिरोधक तंत्र को छकाने की क्षमता रखती है।
दूसरी लहर में अलग तरह का खेला हुआ। कुछ नए वैरियेंट्स सामने आए। इन वैरियेंट्स का बहुत शोर शराबा मचा। खूब भगदड मची। खूब सेंधमारी हुई। गयारामों ने बंद आँखों से अच्छे दिनों के सपने देख लिए। लहर ठंडी पडी तो वैरियेंट ने भी अपना रूप बदल लिया और गयाराम आयाराम होने लगे। स्वयं को इम्युनिटी बूस्टर के रूप में प्रस्तुत करने लगे।
इस समय तीसरी लहर का प्रकोप जारी है। कोरोना के नए वैरियेंट्स ने सबके माथे पर चिन्ता की गहरी लकीरें खींच दी हैं। राजनीति में भी नए वैरियेंट्स दलों की चिन्ताएँ बढ़ा रहे हैं। उनकी संक्रमण-दर से सब आश्चर्यचकित हैं। जिस त्वरा से उनका म्युटेशन हो रहा है और नए नए वैरियेंट सामने आ रहे हैं उससे हर पार्टी के श्वसन तंत्र के संक्रमित होने का खतरा बढ़ता जा रहा है। विधायकी और मंत्रीपद का बूस्टर डोज भी उनपर बेअसर सिद्ध हो रहा है। छापों और वारंट का पूर्व परीक्षित वैक्सीन भी असर नहीं कर रहा है। धमकियों का सैनिटाइजर पहले ही अर्थहीन हो चुका है। अब देखना है कि तीसरी लहर का वैरियेंट्स ज्यादा घातक है या राजनीति में आते जा रहे नए-नए वैरियेंट्स। दूसरी लहर में किसी की आक्सीजन की कमी से मौत नहीं हुई थी लेकिन इस लहर में कुछ पार्टियों के श्वसनतंत्र में जबर्दस्त संक्रमण होने की संभावना व्यक्त की जा रही है। उन्हें समय पर आक्सीजन मिल सकेगी कि नहीं यह देखना भी दिलचस्प होगा।
- अरुण अर्णव खरे
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