By प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क | Apr 23, 2018
नयी दिल्ली। राज्यसभा के सभापति एम वेंकैया नायडू ने देश के प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग की कर्रवाई शुरू करने की मांग करने वाले कांग्रेस एवं अन्य दलों के नोटिस को खारिज करने का फैसला लेने में शीर्ष न्यायविदों की सार्वजनिक प्रतिक्रिया को भी आधार बनाया है। नायडू ने विपक्षी दलों के राज्यसभा के 64 सदस्यों के हस्ताक्षर वाले नोटिस में न्यायमूर्ति मिश्रा के खिलाफ लगाये गये आरोपों को संविधान के अनुच्छेद 124 (4) के दायरे से बाहर बताते हुये आज नामंजूर कर दिया। अपने दस पृष्ठ के विस्तृत आदेश में नायडू ने न्यायमूर्ति मिश्रा के खिलाफ महाभियोग की कार्रवाई के लिए दिये गये नोटिस में वर्णित आरोपों और प्रक्रिया संबंधी प्रावधानों के सभी पहलुओं की विवेचना के आधार पर इस प्रस्ताव को नामंजूर करने की बात कही है। इतना ही नहीं महाभियोग नोटिस पर नायडू ने कानूनविदों से परामर्श करने के अलावा पिछले तीन दिन में पूर्व न्यायाधीशों और शीर्ष न्यायविदों की सार्वजनिक तौर पर व्यक्त की गयी प्रतिक्रयाओं को भी अपने फैसले का आधार बनाया है।
हाल ही में उच्चतम न्यायालय में व्यवस्था संबंधी खामियों के लिये प्रधान न्यायाधीश मिश्रा पर आरोप लगाने वाले न्यायमूर्ति चेलमेश्वर ने अपनी प्रतिक्रिया में विपक्षी दलों की इस पहल को गैरजरूरी बताते हुये कहा था कि पद से हटाना सभी समस्याओं का समाधान नहीं है।इसके अलावा कांग्रेस नेता और पूर्व कानून मंत्री अश्विनी कुमार ने भी इस प्रस्ताव से बचने की जरूरत पर बल देते हुये कहा था कि देश के प्रधान न्यायाधीश को पद से हटाने का प्रावधान अंतिम विकल्प है जिसका इस्तेमाल ‘विकटतम परिस्थितियों’ में ही किया जाना चाहिये। नायडू ने इस मामले में विमर्श के दौरान नरीमन और कश्यप के अलावा पूर्व मुख्य न्यायाधीश टी एस ठाकुर, पूर्व न्यायाधीश बी सुदर्शन रेड्डी, आर एस सोढी, एस एन धींगरा और वरिष्ठ वकील विकास सिंह की प्रतिक्रयाओं को भी संज्ञान में लिया।