By रेनू तिवारी | Nov 04, 2026
निर्देशक राहुल शंखल्या के निर्देशन में बनी फिल्म 'नखरेवाली' समाज के कुछ बेहद अहम और गंभीर मुद्दों को हल्के-फुल्के अंदाज में पर्दे पर उतारने की कोशिश करती है। उत्तर प्रदेश के छोटे शहर से निकलकर दिल्ली यूनिवर्सिटी की पृष्ठभूमि पर आधारित यह फिल्म एक ऐसी कहानी है, जिसके इरादे तो बेहद नेक और प्रगतिशील हैं, लेकिन कमजोर पटकथा और पुराने पड़ चुके फिल्मी फॉर्मूलों के चलते यह अपनी पूरी क्षमता के साथ दर्शकों पर प्रभाव छोड़ने में थोड़ी चूक जाती है। 30 अक्टूबर, 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज हुई यह फिल्म हंसी-मजाक के बीच महिलाओं के प्रति समाज की दबी हुई सोच और पितृसत्तात्मक नजरिए पर सवाल खड़े करती है।
फिल्म की कहानी सुमित मिश्रा (अंश दुग्गल) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपने भरोसेमंद दोस्त झाड़ी (आकाश मखीजा) के साथ उत्तर प्रदेश के हरदोई से निकलकर दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के लिए आता है। एक बिल्कुल नए और आधुनिक सांस्कृतिक माहौल में कदम रखने के बाद, सुमित खुद को दो अलग-अलग दुनियाओं के बीच फंसा हुआ पाता है। अपनी डीयू की बैचमेट मिहिका (आयुषी वर्मा) के बुलावे पर वह अंग्रेजी बोलने वाले एक हाई-क्लास ग्रुप का हिस्सा बन जाता है और उनकी आलीशान जीवनशैली से प्रभावित होने लगता है। इसी दौरान, वह परिधि (प्रगति श्रीवास्तव) के घर में किराएदार के रूप में रहने लगता है।
कहानी में असली मोड़ तब आता है जब एक सामान्य बातचीत के दौरान परिधि सहजता से अंतरंगता (intimacy) की पहल करती है, और यहीं सुमित के भीतर छिपी दबी हुई पितृसत्तात्मक सोच खुलकर सामने आ जाती है। वह परिधि को उसकी यौन इच्छाओं को खुलकर जाहिर करने के लिए जज करता है, जिससे नाराज होकर परिधि उससे सारे रिश्ते तोड़ लेती है। परिधि को खोने के बाद सुमित को अपनी गलती का अहसास होता है और वह उसे शादी के लिए प्रपोज करता है।
लेकिन, परिधि के माता-पिता उसके सामने एक कड़ी शर्त रख देते हैं: उसे एक महीने के भीतर एक सरकारी नौकरी हासिल करनी होगी। असफलताओं और समय की कमी के बीच, सुमित महिलाओं के लिए आरक्षित एक सरकारी नौकरी पाने के लिए 'सुमिता मिश्रा' का रूप धर लेता है, और यहीं से शुरू होती है गलतफहमियों पर आधारित एक क्लासिक 'कॉमेडी-ऑफ-एरर्स'।
प्रगतिशील सोच और अच्छे इरादे, लेकिन कमजोर निष्पादन
लेखक दिव्य निधि शर्मा और सत्य व्यास, तथा निर्देशक राहुल शंखल्या ने 'नखरेवाली' को बहुत ही नेक और सामाजिक रूप से जागरूक इरादों के साथ गढ़ा है। फिल्म उन तमाम गंभीर मुद्दों पर चोट करती है जो आज भी हमारे समाज में गहराई तक बैठे हुए हैं:
पितृसत्तात्मक सोच और मिसोजनी: महिलाओं के प्रति रूढ़िवादी सोच और उनकी स्वतंत्रता को दबाने वाले नजरिए पर सवाल उठाए गए हैं।
सहमति (Consent) का महत्व: महिलाओं की आधुनिक जीवनशैली या पुरुषों के साथ उनकी सहज दोस्ती को 'खुला निमंत्रण' समझ लेने वाली गलत और खतरनाक मानसिकता को फिल्म में उजागर किया गया है।
रोजमर्रा का उत्पीड़न: सुमित के 'सुमिता' बनने के सफर के जरिए उन तमाम छोटी-बड़ी धमकियों, उत्पीड़न और महिलाओं को महज एक 'वस्तु' (object) समझने की घटनाओं को सामने लाया गया है, जिनका सामना महिलाओं को आए दिन करना पड़ता है।
हालांकि, इतने अच्छे और प्रासंगिक विषयों को चुनने के बावजूद, यह फिल्म घिसे-पिटे फिल्मी फॉर्मूलों का शिकार हो जाती है। 'क्रॉस-ड्रेसिंग' (पुरुष का महिला का भेष धरने) वाला यह कॉन्सेप्ट हिंदी सिनेमा में नया नहीं है—इसे पहले 'चाची 420', 'आंटी नंबर 1' और 'ड्रीम गर्ल' जैसी फिल्मों में बेहद शानदार तरीके से देखा जा चुका है। आज के दौर में इस फॉर्मूले को प्रासंगिक बनाने के लिए बेहद धारदार और नएपन से भरे लेखन की जरूरत होती है। इसके विपरीत, फिल्म में अफरा-तफरी और जबरदस्ती के स्लैपस्टिक गैग्स (शोर-शराबे वाले कॉमेडी सीन्स) का बहुत ज्यादा सहारा लिया गया है।
अभिनय और कलाकारों के प्रयास
फिल्म के कलाकारों ने अपनी तरफ से स्क्रिप्ट की सीमाओं के बावजूद पूरी ईमानदारी से काम करने की कोशिश की है:
मुख्य जोड़ी: अंश दुग्गल और प्रगती श्रीवास्तव ने एक साधारण सी प्रेम कहानी और उसके उतार-चढ़ाव को संभालने का पूरा प्रयास किया है। प्रगती ने परिधि के किरदार में स्वाभिमान और सहजता को अच्छे से निभाया है।
सहायक कलाकार: आकाश मखीजा ने 'झाड़ी' के किरदार में बेहतरीन कॉमिक टाइमिंग दिखाई है, जो परदे पर आते ही एक अच्छी ऊर्जा ले आते हैं।
दिग्गज कलाकारों का जादू: अनुभवी अभिनेता कुमुद मिश्रा और बृजेंद्र काला ने अपने छोटे से स्क्रीन टाइम में भी अपनी मंझी हुई अभिनय कला और कॉमिक टाइमिंग से फिल्म में एक ठहराव और कसावट पैदा की है। परिधि के पिता 'बतुक' के रूप में गोपाल दत्त छाए रहे; उनके किरदार को भले ही बहुत विस्तार नहीं मिला था, लेकिन उन्होंने अपनी सहज अदाकारी से दृश्यों को काफी मजेदार बना दिया। आयुषी वर्मा ने भी अपने हिस्से के काम को पूरी निष्ठा से निभाया है।
तकनीकी पक्ष और संगीत
तकनीकी मोर्चे पर 'नखरेवाली' बहुत अधिक प्रभावित नहीं करती है। छोटे शहरों के युवाओं का दिल्ली के शहरी परिवेश में ढलना एक बेहद दिलचस्प और गहरी कहानी बन सकती थी, लेकिन निर्देशक इसे केवल एक सतही और बनावटी चित्रण के रूप में ही पेश कर पाए।
फिल्म का संगीत काफी कमजोर है। इसके गाने न तो कहानी को आगे बढ़ाने में कोई मदद करते हैं और न ही दर्शकों के जेहन में लंबे समय तक टिक पाते हैं। बैकग्राउंड स्कोर में भी कई जगह जरूरत से ज्यादा शोर महसूस होता है, जो कॉमेडी दृश्यों को और अधिक प्रभावी बनाने के बजाय कभी-कभी अखरने लगता है।
निष्कर्ष
'नखरेवाली' एक ऐसी फिल्म है जिसके दिल में अच्छे विचार और समाज को सुधारने की अच्छी नीयत है। यह 'सहमति' (consent) और समाज के दोहरे मानदंडों जैसे जरूरी मुद्दों पर बात करना चाहती है। लेकिन, अत्यधिक निर्भरता घिसे-पिटे किरदारों, फीकी कॉमेडी और बार-बार दोहराई जाने वाली स्थितियों पर होने के कारण, यह फिल्म दर्शकों के दिलों पर कोई बहुत गहरी या स्थायी छाप छोड़ने में नाकामयाब साबित होती है। यदि आप बिना किसी बड़ी उम्मीद के एक बार देखने लायक हल्की-फुल्की कॉमेडी तलाश रहे हैं, तो यह फिल्म आपका मनोरंजन कर सकती है।