Prabhasakshi NewsRoom: 1962 की हार पर नेहरू की जिम्मेदारी बनती है, पर उन्हें हर बात के लिए दोष देना गलतः Shashi Tharoor

By नीरज कुमार दुबे | Jan 09, 2026

कांग्रेस सांसद शशि थरूर के एक ताजा बयान ने सियासी रूप से नई हलचल मचा दी है। पिछले कुछ समय से कांग्रेस के आधिकारिक रुख के विपरीत रुख अख्तियार कर रहे शशि थरूर ने कहा है कि वह देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु के प्रशसंक हैं लेकिन उनकी सभी बातों का समर्थन करना संभव नहीं है। केरल में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए शशि थरूर ने देश की राजनीति में इतिहास को लेकर जारी घमासान के बीच सत्तारुढ़ भाजपा की रणनीति पर भी तीखा प्रहार किया। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि वह देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु के प्रशंसक हैं, लेकिन अंधभक्त नहीं हैं। शशि थरूर ने कहा कि नेहरु के योगदान को नकारा नहीं जा सकता, पर यह भी सच है कि उनके हर विचार और हर निर्णय का समर्थन करना न तो जरूरी है और न ही बौद्धिक रूप से यह ईमानदारी होगा।

थरूर ने कहा कि नेहरु ने आजाद भारत की लोकतांत्रिक नींव रखी, संस्थानों को आकार दिया और भारत को विश्व पटल पर पहचान दिलाई। इसके बावजूद उनके कुछ निर्णय ऐसे रहे जिन पर सवाल उठना स्वाभाविक है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि 1962 के चीन युद्ध से जुड़े कुछ फैसलों पर नेहरु की जिम्मेदारी बनती है, लेकिन यह कहना कि देश की आज की हर समस्या की जड़ नेहरु ही हैं, इतिहास के साथ अन्याय है।

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उन्होंने भारतीय जनता पार्टी पर आरोप लगाया कि वह नेहरु को एक सुविधाजनक बलि का बकरा बना चुकी है। हर नाकामी, हर विफलता और हर असहज सवाल से बचने के लिए भाजपा बार बार नेहरु का नाम उछालती है। थरूर ने कहा कि यह रवैया न तो राष्ट्र निर्माण में मदद करता है और न ही जनता को सच्चाई से रूबरू कराता है। हम आपको बता दें कि केरल में एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान दिए गए इस बयान के बाद राजनीतिक हलकों में बहस तेज हो गई है। कांग्रेस के भीतर इसे एक संतुलित और बौद्धिक वक्तव्य माना जा रहा है, जबकि भाजपा समर्थक इसे नेहरु विरोधी बयान करार दे रहे हैं।

वैसे देखा जाये तो शशि थरूर ने न तो नेहरु की खुलकर प्रशंसा की और न ही उन्हें खलनायक बनाया। उन्होंने वह बात कही जो आज की राजनीति में कहना सबसे कठिन हो गया है। यानि इतिहास को समझा जाना चाहिए, इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। थरूर ने सही कहा कि नेहरु आलोचना से परे नहीं हैं। लेकिन सवाल यह है कि आलोचना ईमानदार है या सियासी। अगर आलोचना का मकसद सीखना है, तो इतिहास से सबक लेकर आज की नीतियों को बेहतर बनाया जाये। शशि थरूर का यह कहना कि वह नेहरु के अनक्रिटिकल फैन हैं, दरअसल भारतीय राजनीति के लिए एक आईना है। इसका अर्थ यह है कि सम्मान और विवेक साथ साथ चल सकते हैं। किसी नेता का आदर करना यह नहीं है कि उसकी हर भूल पर आंख मूंद ली जाए। और किसी नेता की आलोचना का मतलब यह नहीं कि उसे हर समस्या की जड़ घोषित कर दिया जाए।

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