सुन लो दुनिया के हुक्मरान ! ना बदला था, ना बदला है और ना बदलेगा तालिबान

By अशोक मधुप | Oct 29, 2021

अफगानिस्तान के कब्जे के दो माह बाद भी तालिबान का रवैया वही है, जो बीस साल पहले था। खस्ता हाल और भूखे देश को चलाने के लिए उसे मदद चाहिए, वह भी अपनी शर्तों पर। अफगानिस्तान के हालात को लेकर दुनिया भर के देश चिंतित हैं। सब चाहते हैं कि अफगानिस्तान में विकास हो। बाकी जनता की समस्याएं हल हों। हालात सामान्य हों। लोगों को भरण-पोषण की चीजें उपलब्ध हों। पर अफगानिस्तान पर काबिज तालिबान अपने एजेंडे से पीछे हटने को तैयार नहीं है। उसका क्रूरता का चेहरा वैसा ही है जैसा बीस साल पहले था। उसने उस पर कोई मुखौटा नहीं लगाया। कोई आवरण नहीं ओढ़ा। उनको दुनिया से अपने लिए मदद चाहिए, वह भी अपनी शर्तों पर। उन्हें न मानवता से कुछ लेना है, न मानव समाज से।

अफगानिस्तान की आर्थिक हालात ठीक नहीं है। वहां भोजन का संकट है। पेट भरने के लिए लोग अपनी बेटियां तक बेच रहे हैं। वहां न जरूरत का सामान है, न ठंड से बचने के लिए कपड़े। इस हालात से दुनिया अफगानिस्तान की जनता के बारे में सोच रही है। चिंता कर रही है। किंतु अफगानिस्तान पर काबिज तालिबान का रवैया कुछ और ही कहता है। उनके आचरण से लगता है कि पिछले 20 साल में उन्होंने अपने में कोई बदलाव नहीं किया। उनका एजेंडा वही है। वे कट्टर इस्लामवाद से पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। सत्ता पर कब्जा करने के बाद तालिबान ने मान्यता पाने के लिए सभी धर्मों को साथ लेकर चलने का दावा किया था। लेकिन अब अल्पसंख्यकों के लिए वहां सुरक्षा हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। तालिबान ने वहां रहने वाले सिखों को फरमान जारी करते हुए कहा है कि या तो इस्लाम कुबूल कर लो या फिर देश छोड़ दो। इतना ही नहीं इस्लाम कबूल न करने पर जान से मारने की धमकी दी जा रही है। तालिबान ने सत्ता संभालते ही जेल में बंद सभी कैदियों को रिहा कर दिया। अब ये रिहा कैदी उन्हें सजा देने वाले न्यायधीश को खोज रहे हैं। न्यायधीश अपनी जान बचाते घूम रहे हैं। अफगानिस्तान से भागी 26 महिला जज ग्रीस में शरण लिए हैं।

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अफगानिस्तान में तालिबान के सत्ता में आने के बाद लगा था कि चीन, पाकिस्तान और रूस तथा आसपास के कुछ इस्लामिक देश उसे तुरंत मान्यता दे देंगे। पाकिस्तान तो इस अभियान के लिए सक्रिय भी हुआ। इतना सब होने के दो माह बाद भी अब तक एक भी देश तालिबान सरकार को मान्यता नहीं दे सका। इसका सबसे बड़ा कारण यह रहा कि अमेरिका से वार्ता में उसने वायदा किया था कि वह देश में मौजूद सभी संगठनों को साथ लेकर सरकार बनाएगा। अफगानिस्तान से सटे देश चाहते हैं कि अफगानिस्तान में शांति रहे। वहां की जनता को जरूरत की चीज आराम से मिलती रहे, किंतु यह सब आपके, मेरे चाहने और सोचने से होने वाला नहीं है। उसके लिए तो तालिबान को ही अपने रवैये में परिवर्तन करना होगा। उसे ही अपने को इस योग्य बनाना होगा कि दुनिया स्वयं सहायता के लिए आगे आए।

-अशोक मधुप

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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