By नीरज कुमार दुबे | Aug 22, 2026
नेपाल के पोखरा में गोरखा पूर्व सैनिकों और युवाओं का हालिया प्रदर्शन भारत-नेपाल के 200 साल से भी पुराने सैन्य रिश्ते पर नए सवाल खड़े करता है। भारतीय सेना प्रमुख जनरल धीरज सेठ की नेपाल यात्रा से पहले सैकड़ों लोग सड़कों पर उतरे और मांग की कि नेपाली युवाओं की भारतीय सेना में भर्ती फिर शुरू की जाए। उनका कहना है कि 2022 में अग्निपथ योजना लागू होने के बाद भर्ती बंद होने से हजारों युवाओं के सामने रोजगार का संकट पैदा हो गया है। इस प्रदर्शन से सवाल उठा कि क्या काठमांडू की सियासी जिद अपने ही युवाओं से रोजगार का एक बड़ा अवसर छीन रही है? क्या भारत और नेपाल के बीच सदियों पुराने गोरखा सैन्य संबंध अब अग्निपथ की नई व्यवस्था की भेंट चढ़ रहे हैं? सवाल यह भी उठा कि जब नेपाल सरकार भारतीय सेना में भर्ती पर रोक लगाए हुए है, तब ऐसे में अपने युवाओं को रोजगार देने का उसके पास दूसरा विकल्प क्या है?
पूर्व सैनिक संगठन के अध्यक्ष सेवानिवृत्त कर्नल कृष्ण बहादुर खत्री ने चेतावनी दी कि सुगौली संधि के दौर से जुड़ी 200 वर्ष से अधिक पुरानी भर्ती परंपरा अब संकट में है। उनका कहना है कि लगभग 207 वर्षों से नेपाली युवाओं का भारतीय सेना से जुड़ाव सिर्फ रोजगार का साधन नहीं रहा, बल्कि दोनों देशों के बीच भरोसे, रिश्तों और सैन्य सहयोग का एक मजबूत आधार भी रहा है।
लेकिन 2022 में भारत द्वारा शुरू की गई अग्निपथ योजना ने इस पुराने ढांचे को बदल दिया। नई व्यवस्था के तहत सैनिकों, वायुसैनिकों और नौसैनिकों की भर्ती चार वर्षों के लिए की जाती है। इसके बाद अधिकतम 25 प्रतिशत अग्निवीरों को योग्यता और संगठनात्मक जरूरत के आधार पर नियमित सेवा में शामिल किया जा सकता है, जबकि बाकी को सेवा निधि के साथ सेना से बाहर होना पड़ता है। योजना का उद्देश्य सेना को अधिक युवा, तकनीकी रूप से सक्षम और आधुनिक बनाना, साथ ही वेतन और पेंशन के बढ़ते बोझ को कम करना बताया गया।
यहीं से नेपाल की आपत्ति शुरू हुई। काठमांडू ने तर्क दिया कि चार साल की संविदा आधारित भर्ती 1947 के भारत-नेपाल-ब्रिटेन त्रिपक्षीय समझौते की मूल भावना से अलग है, जिसमें नेपाली मूल के गोरखा सैनिकों की सेवा शर्तों, सेवानिवृत्ति लाभ और पेंशन का प्रावधान था। नेपाल का कहना था कि भर्ती व्यवस्था में इतना बड़ा बदलाव करने से पहले उससे व्यापक चर्चा होनी चाहिए थी। परिणाम यह हुआ कि 2022 से नेपाल-निवासी गोरखाओं की भारतीय सेना में नई भर्ती लगभग ठप हो गई।
मगर अब इस फैसले के खिलाफ नेपाल के भीतर ही आवाज तेज हो रही है। प्रदर्शनकारी पूछ रहे हैं कि यदि सरकार भारतीय सेना में भर्ती की अनुमति नहीं देती, तो वह इन युवाओं को देश के भीतर रोजगार कब और कैसे देगी? पूर्व सैनिकों का तर्क है कि चार साल की अग्निवीर सेवा भी खाड़ी देशों में कम वेतन और कठिन परिस्थितियों में मजदूरी करने से कहीं बेहतर विकल्प है। उनके मुताबिक, चार वर्षों में एक अग्निवीर वेतन और सुविधाओं सहित लगभग 45 से 50 लाख नेपाली रुपये तक प्राप्त कर सकता है।
यही नहीं, भर्ती पर रोक का आर्थिक असर भी नेपाल के लिए मामूली नहीं है। भारतीय सेना में कार्यरत गोरखा सैनिकों द्वारा नेपाल भेजी जाने वाली रकम कभी सालाना लगभग 1,000 करोड़ रुपये तक बताई गई है। शोधों में भी विदेशी सेनाओं में कार्यरत गोरखाओं से मिलने वाले धन को नेपाल के दूरदराज के इलाकों में सामाजिक बदलाव, उद्यमिता और क्षेत्रीय विकास का महत्वपूर्ण स्रोत माना गया है।
देखा जाये तो यह विवाद केवल नौकरी या पेंशन का नहीं, बल्कि भारत-नेपाल के ऐतिहासिक संबंधों का भी है। भारतीय सेना की गोरखा रेजिमेंटों में नेपाल-निवासी गोरखाओं की भूमिका लंबे समय से महत्वपूर्ण रही है। रिपोर्टों के अनुसार, 2021 के बाद हजारों नेपाली गोरखा सैनिक सेवानिवृत्त हो चुके हैं, लेकिन 2022 से नई भर्ती न होने के कारण उनकी जगह नई पीढ़ी नहीं आ सकी।
विडंबना यह है कि नेपाल सरकार जिस अग्निपथ मॉडल को अपने युवाओं के भविष्य के लिए असुरक्षित मानती है, उसी रोजगार संकट के कारण कुछ नेपाली युवा रूस जाकर यूक्रेन युद्ध में रूसी सेना के साथ जुड़ने तक पहुंच गए। सवाल यह है कि क्या काठमांडू के पास युवाओं को रोकने के लिए कोई ठोस रोजगार नीति है, या फिर भारतीय सेना में भर्ती रोककर उन्हें खाड़ी देशों और दूसरे संघर्षग्रस्त रास्तों की ओर धकेला जा रहा है?
हम आपको बता दें कि भारतीय सेना प्रमुख की हालिया नेपाल यात्रा के दौरान रक्षा सहयोग और सैन्य संबंधों की चर्चा तो हुई, लेकिन अग्निपथ भर्ती का मुद्दा सार्वजनिक बयानों में प्रमुखता से नहीं आया। हालांकि नेपाल की ओर से बातचीत के लिए कुछ नरमी के संकेत जरूर मिले हैं। अब असली परीक्षा यह है कि क्या दोनों देश इस 207 साल पुराने सैन्य रिश्ते को नई परिस्थितियों के अनुरूप समाधान देंगे।
देखा जाये तो नेपाल सरकार अग्निपथ योजना पर आपत्ति कर सकती है, लेकिन क्या वह हजारों युवाओं के लिए उससे बेहतर विकल्प देने को तैयार है? और क्या भारत भी इस ऐतिहासिक गोरखा संबंध को केवल एक प्रशासनिक भर्ती विवाद बनकर कमजोर पड़ने देगा? पोखरा की सड़कों पर उठी आवाज अब सिर्फ पूर्व सैनिकों का विरोध नहीं है। यह नेपाल की रोजगार नीति, भारत-नेपाल के भरोसे और गोरखा परंपरा के भविष्य पर उठता एक बड़ा सवाल है, जिसका जवाब अब ज्यादा दिनों तक टाला नहीं जा सकता।