Nepal Floods Update | 'ग्लोबल वार्मिंग का जिम्मेदार नेपाल नहीं, विकसित देश दें मुआवजा', पूर्व पीएम केपी शर्मा ओली का बड़ा बयान

By रेनू तिवारी | Sep 05, 2026

नेपाल में अचानक आई विनाशकारी बाढ़ से 32,000 से अधिक लोग प्रभावित हुए हैं। बाढ़ से सड़कों, पुलों, स्कूलों और स्वास्थ्य सुविधाओं को भी नुकसान पहुंचा है। शुक्रवार को जारी सरकार की प्रारंभिक रिपोर्ट से यह जानकारी प्राप्त हुई। राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीआरआरएमए) ने एक संवाददाता सम्मेलन में यह रिपोर्ट पेश की। अचानक आई बाढ़ में मरने वालों की संख्या शुक्रवार को बढ़कर 1,295 हो गई। प्रभावित इलाकों से और शव बरामद किए जाने के बाद मृतकों की संख्या में यह बढ़ोतरी हुई। नेपाल-तिब्बत सीमा के पास 26 अगस्त को बर्फ और चट्टानों के हिमस्खलन से अचानक आई बाढ़ ने उत्तर और मध्य नेपाल के कस्बों और गांवों में भारी तबाही मचाई और व्यापक स्तर पर नुकसान हुआ।

उन्होंने कहा, "असल में बहुत कम लोग लापता हैं। जो लोग बह गए, उन्हें ढूंढना बहुत मुश्किल है। बड़ी संख्या में लोग बह गए हैं। उनके शव चितवन, भारत और अन्य जगहों पर मिल रहे हैं।" उन्होंने कहा कि ग्लेशियर का जो हिस्सा टूटा और अचानक बाढ़ का कारण बना, वह छोटा था। बचा हुआ ग्लेशियर कभी भी टूट सकता है और ऐसी ही घटनाएं हो सकती हैं। उन्होंने कहा, "इस नदी और उस ग्लेशियर का केवल एक छोटा सा हिस्सा टूटा है। एक बहुत बड़ा हिस्सा अभी भी बचा हुआ है। यह कभी भी टूट सकता है। सभी को अधिक जागरूक होना चाहिए और अधिक ध्यान देना चाहिए।" उन्होंने कहा कि अगर ग्लेशियर टूटते रहे, तो समुद्र का जलस्तर बढ़ेगा।

उन्होंने चेतावनी दी, "पहाड़ अन्य देशों में भी हैं। इसका मतलब है कि उन पर भी असर पड़ेगा। जलवायु पहाड़ों और समुद्रों से शुरू होती है। और पारिस्थितिकी तंत्र भी पहाड़ों और समुद्रों के बीच घूमता है। हमें बहुत तेजी से काम करना होगा। हमें गंभीरता से काम करना होगा। अगर हम पहाड़ों को सुरक्षित नहीं रख पाए, तो समुद्र सुरक्षित नहीं रहेंगे। इसका मतलब है कि समुद्र का जलस्तर भी बढ़ेगा। इसका मतलब है कि द्वीप देश, जो समुद्र के बहुत निचले स्तर पर हैं, डूब जाएंगे।"

उन्होंने कहा कि नेपाल ने पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने में कोई योगदान नहीं दिया है। यह विकसित देशों का योगदान है। मुझे लगता है कि मैंने संयुक्त राष्ट्र और पर्यावरण सम्मेलनों में यह मुद्दा उठाया है। इसके लिए मुआवजा कौन देगा? हमने पर्यावरण को खराब नहीं किया। हमने ग्लेशियर पिघलने की स्थिति पैदा नहीं की।

उन्होंने नेपाल सरकार पर भी निशाना साधा और दावा किया कि वह बाढ़ से प्रभावी ढंग से नहीं निपट रही है। उन्होंने कहा, "10 दिनों के बाद मौजूदा स्थिति क्या है? स्थिति बहुत दर्दनाक है। बहुत डर है। लोगों की उम्मीदें पूरी नहीं हुई हैं।"

जलवायु परिवर्तन पर चेतावनी और मुआवजे की मांग

ऑली ने इस आपदा के लिए वैश्विक तापमान (ग्लोबल वार्मिंग) को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि नेपाल का पर्यावरण नुकसान में कोई योगदान नहीं है। उन्होंने प्रमुख बिंदुओं पर ध्यान आकर्षित किया:

अत्यधिक औद्योगिक देशों पर जिम्मेदारी: पर्यावरण को नुकसान बड़े विकसित देशों ने पहुंचाया है, इसलिए उन्हें इस तबाही का मुआवजा देना चाहिए।

समुद्री देशों पर खतरा: यदि ग्लेशियर लगातार पिघलते रहे, तो समुद्र का जलस्तर बढ़ने से निचले हिस्से में बसे द्वीप और तटीय देश पूरी तरह डूब जाएंगे।

त्वरित कार्रवाई की जरूरत: जलवायु संतुलन के लिए पहाड़ों और समुद्रों की सुरक्षा बेहद जरूरी है। इसके लिए वैश्विक स्तर पर तुरंत और गंभीर कदम उठाने होंगे।

फिलहाल आपदा प्रभावित इलाकों में स्थिति बेहद दर्दनाक है और राहत कार्यों के बीच लोगों में एक बार फिर से हिमस्खलन होने का डर बना हुआ है। 

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